श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१०-१५ किन्तु वे स्वयंरूपमें ब्रह्माके एक दिनमें (एक हजार चतुर्युगमें) एक बार ही अवतीर्ण होते हैं, प्रति युगमें नहीं। इसलिये गीताके इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण युगावतारके रूपमें प्रत्येक युगमें अवतीर्ण होते हैं, स्वयंरूपमें नहीं। दैत्यों आदिके अत्याचारोंसे दुःखित पृथ्वीकी प्रार्थनापर ब्रह्माजी क्षीरसमुद्रके तटपर गये और पृथ्वीके दुःखोंकी गाथा कही तथा उसके त्राणके लिये भगवान्से निवेदन किया। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर स्वयं भगवान् क्यों अवतीर्ण हुए? वे युगावतारको भेजकर पृथ्वीके कष्टोंका निवारण कर सकते थे। इसके उत्तरमें कहा जा सकता है—स्वयं भगवान् ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर जगत्में अवतीर्ण नहीं हुए। ब्रह्माजीके क्षीरसमुद्रके तटपर जानेसे पहले ही भगवान्ने अवतार लेनेका निर्णय ले लिया था। आकाशवाणीके द्वारा उन्होंने ब्रह्माजीको बतलाया कि वे पृथ्वीकी दुर्दशाके विषयमें पहलेसे ही जानते हैं और शीघ्र ही स्वयं भगवान् प्रपञ्चमें अवतीर्ण होंगे। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे उसी समय भूभार हरणके लिये युगावतारका भी समय आ गया। इसलिये श्रीकृष्णके अवतारकालमें भारहरणकाल भी मिल गया। स्वयं भगवान्में उनके सभी अवतार रहते हैं और अपने शरीरमें स्थित विष्णुके द्वारा श्रीकृष्णने असुरोंका संहार करवाया। स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने अवतरित होनेकी इच्छा स्वयं ही की, वे किसीकी प्रार्थनापर अवतीर्ण नहीं हुए, इसके अनेक प्रमाण हैं। जैसे भागवत (१०/२/३९) श्लोककी टीकाके प्रारम्भमें ही श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने लिखा है—“हमारी प्रार्थनासे आप हमारा पालन करनेके लिये जगत्में अवतरित हो रहे हैं—ऐसा विचार केवल हमारा अभिमानमात्र है, वास्तवमें आपका जन्म, कर्म और लीला आपकी स्वेच्छासे सिद्ध है।” कुन्तीदेवीने भी श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए कहा (भागवत १/८/२०)— “तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥ ” अर्थात् “मननशील, आसक्तिरहित, आत्म-अनात्म विवेकी जीवन्मुक्त परमहंस पुरुष भी आपकी महिमाके प्रभावके कारण आपका दर्शन नहीं कर पाते। इसलिये ऐसे पुरुषोंमें भी अपने प्रति भक्ति उत्पन्न करानेके उद्देश्यसे अवतीर्ण आपका मेरे जैसी मुग्ध स्त्रियाँ कैसे दर्शन कर सकती हैं अर्थात् किस प्रकार आपको जाननेमें समर्थ हो सकती हैं?” अक्रूरजी श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा ले जानेके लिये ब्रजमें आते हुए मनमें उनका चिन्तन करते हुए कह रहे हैं (विष्णुपुराण ५/१७/११)— “साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम्। कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तः स्वेच्छादेहधृगव्ययम् ॥” अर्थात् “इस समय उन अव्ययात्मा जगत्-स्वामी श्रीकृष्णने अपने हृदयमें स्थित कार्य करनेके उद्देश्यसे ही अब नरलीला प्रकट की है।” ॥ १०-१४॥ वैधी भक्तिके प्रचारके लिये विष्णुका अवतार, रागमार्गकी भक्तिके प्रचारके लिये श्रीकृष्णका अवतार :- प्रेमरस-निर्यास करिते आस्वादन। रागमार्ग भक्ति लोके करिते प्रचारण ॥ १५ ॥ १५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत