भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/७-१४ ] अवतारी श्रीकृष्णके अवतरणकालमें उनके साथ अवतार विष्णुका मिलन :- किन्तु कृष्णेर येइ हय अवतार-काल। भारहरण-काल ताते हइल मिशाल॥ ९॥ अनुवाद—शास्त्रोंमें यह वर्णन है कि पूर्वकाल अर्थात् द्वापरयुगमें श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये अवतीर्ण हुए थे। भू-भारहरण स्वयं-भगवान्‌का कार्य नहीं है, स्थितिकर्त्ता विष्णु ही असुरोंका संहारकर जगत्‌का पालन करते हैं। किन्तु जब श्रीकृष्णके अवतार ग्रहणका समय आया, तो उस समय पृथ्वीके भारहरणका काल भी उपस्थित हो गया॥७-९॥ पूर्ण भगवान् अवतरे येइ काले। आर सब अवतार ताँते आसि' मिले॥१०॥ नारायण, चतुर्व्यूह, मत्स्याद्यवतार। युग-मन्वन्तरावतार, यत आछे आर॥११॥ सबे आसि' कृष्ण-अङ्गे हय अवतीर्ण। ऐछे अवतरे कृष्ण भगवान् पूर्ण॥ १२॥ देहस्थित अंश-विष्णुके द्वारा जगत्का भारहरण और पालनलीला :- अतएव विष्णु तखन कृष्णेर शरीरे। विष्णुद्वारे कृष्ण करे असुर-संहारे॥१३॥ आनुषङ्ग-कर्म एइ असुर-मारण। ये लागि' अवतार, कहि से मूल कारण॥ १४॥ अनुवाद—पूर्ण भगवान् जिस समय अवतरित होते हैं, उस समय अन्य सभी अवतार भी उनमें समाहित हो जाते हैं। भगवान् नारायण, चतुर्व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध), मत्स्यादि अंशावतार, युगावतार, मन्वन्तरावतार और जितने भी अन्य अवतार हैं, वे सभी श्रीकृष्णके अङ्गोंमें समाहित होकर अवतीर्ण होते हैं। इस प्रकार पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णका अवतार होता है। इसलिये विष्णु उस समय श्रीकृष्णके शरीरमें रहते हैं और विष्णुके द्वारा ही श्रीकृष्ण असुर-संहार कराते हैं। असुरोंको मारना आदि आनुषङ्गिक कार्य हैं। किन्तु जिसके लिये उनका अवतार होता है, उस मूलकारणको अब कह रहा हूँ॥१०-१४॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा (गीता ४/७-८)— “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥” अर्थात् “हे भारत! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने नित्यसिद्ध देहको प्रकट करता हूँ। मैं अपने एकान्त भक्तोंके परित्राण, दुष्टोंके विनाश और धर्मकी संस्थापनाके लिए युग-युगमें आविर्भूत होता हूँ।” चौथा अध्याय | १४९