भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ ४/२-८ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर-भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ चतुर्थ श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। पञ्चम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥३॥ अनुवाद-इससे पूर्व अध्यायमें मङ्गलाचरणके चौथे श्लोकके अर्थको विस्तारसे कहा है। हे भक्तों! अब आप उसके पाँचवें श्लोकके अर्थको ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिये। मूल-श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश। अर्थ लगाइते आगे कहिये आभास॥४॥ अनुवाद-मूल श्लोकके अर्थको प्रकाश करनेसे पहले उसकी भूमिका प्रस्तुत कर रहा हूँ॥४॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमें चतुर्थ श्लोक-तात्पर्य— नाम-प्रेम-प्रचार श्रीगौरावतारका बाह्य कारण :— चतुर्थ श्लोकेर अर्थ एइ कैल सार। प्रेम-नाम प्रचारिते एइ अवतार॥५॥ अनुवाद-मैंने चौथे श्लोकका सारार्थ यह दिया है कि श्रीगौरसुन्दरका अवतार जगत्में नाम-सङ्कीर्तनके प्रचार और श्रीकृष्णप्रेमको प्रदान करनेके लिये हुआ है॥५॥ सत्य एइ हेतु, किन्तु एहो बहिरङ्ग। आर एक हेतु, शुन, आछे अन्तरङ्ग॥६॥ अनुवाद-यह बात सत्य है, किन्तु यह अवतार लेनेका बाह्य कारण है। उसका एक और कारण है; वह अन्तरङ्ग अर्थात् गूढ़ कारण है, उसे अब श्रवण करो॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तीसरे अध्यायमें चौथे श्लोकका सारार्थ इस प्रकार निरूपित किया गया है—प्रेम अर्थात् प्रेमभक्ति और श्रीकृष्णनाम प्रचार करने लिये गौराङ्ग महाप्रभुका अवतार हुआ है। उस सिद्धान्तका जिस कारणसे उल्लेख किया गया, वह सत्य होनेपर भी बहिरङ्ग अर्थात् बाह्य कारण है, गूढ़ कारण नहीं। इसका एक अन्तरङ्ग (गूढ़) कारण भी है, अब उसका वर्णन कर रहा हूँ॥४-६॥ श्रीगौरावतारके गुह्यकारण वर्णन करनेके लिये पहले श्रीकृष्ण और विष्णुलीलाके वैचित्र्यका वर्णन :— पूर्वे येन पृथिवीर भार हरिबारे। कृष्ण अवतीर्ण हैला शास्त्रेते प्रचारे॥७॥ विष्णुका कार्य—साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका नाश; स्वयं श्रीकृष्णका वह कार्य नहीं :— स्वयं भगवानेर कर्म नहे भारहरण। स्थितिकर्त्ता विष्णु करेन जगत्पालन॥८॥ १४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत