श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/२३-२५ श्लोक-भावानुवाद—मेरे प्रति श्रवण-कीर्तनादि लक्षणोंवाली नवधाभक्तिके द्वारा प्राणी निःसन्देह अपने नित्यपार्षदस्वरूपको प्राप्त करनेके योग्य होते हैं। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, उससे तुम्हें मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है और वह मेरा सौभाग्य ही है॥२३॥ माता मोरे पुत्रभावे करेन बन्धन। अतिहीन-ज्ञाने करे लालन-पालन ॥ २४ ॥ अनुवाद—मेरी माता कभी-कभी अपने पुत्र-भावसे मुझे बाँध देती है। वह मुझे अत्यन्त असहाय समझकर मेरा लालन-पालन भी करती है॥ २४॥ अमृतानुकणिका—'माता'—वात्सल्य प्रेमकी परमाश्रय यशोदा माता। यशोदा माता श्रीकृष्णको अपना पुत्र मानकर उनका लालन-पालन और कभी शासन भी करती हैं। उनकी श्रीकृष्णमें ईश्वर बुद्धि नहीं है। उनका मानना है कि श्रीकृष्ण उनके गर्भजात पुत्र हैं, उनके दुग्धपोष्य शिशु, नितान्त निराश्रय और नितान्त दुर्बल हैं, अपने आप शरीरपर बैठी मक्खी भी नहीं उड़ा सकते, भूख लगनेपर उसे मुखसे कह भी नहीं पाते। उनको छोड़कर श्रीकृष्णका अन्य कोई सहारा नहीं है; वे खिलायेंगी, तो श्रीकृष्ण खायेंगे; वे रक्षा करेंगी, तो श्रीकृष्णकी रक्षा होगी। उनका मानना है कि श्रीकृष्णमें अपने अच्छे-बुरेका विचार करनेकी क्षमता नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णके मङ्गलके लिये ही उनपर शासन करती हैं, उन्हें डाँटती-फटकारती हैं और कभी रस्सीसे बाँध भी देती हैं—श्रीकृष्णके प्रति उनकी इतनी ममता बुद्धि है। श्रीकृष्ण उनके शुद्ध वात्सल्य-प्रेममें मुग्ध होकर उनके प्रेमकी वश्यताको स्वीकारकर यशोदा माताके लालन-पालन, ताड़न-भर्त्सन, सभीको अङ्गीकारकर अपरिमित आनन्दका अनुभव करते हैं। देवकीमें भी श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्य प्रेम है, किन्तु वह ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित होनेके कारण विशुद्ध नहीं है। मथुरामें जन्मके समय देवकीने उनका भगवत्-रूप देखा था, इसलिये श्रीकृष्णको निराश्रय मानकर उनके लालन-पालनका भाव उनमें उदित नहीं होता है और उनपर वे शासन भी नहीं कर सकतीं। इसलिये इस पयारमें 'माता' कहनेसे उन्हें लक्ष्य नहीं किया गया है॥२४॥ सखा शुद्धसख्ये करे स्कन्धे आरोहण। तुमि कोन् बड़ लोक,—तुमि आमि सम ॥ २५ ॥ अनुवाद—सखालोग शुद्ध-सख्यभावसे मेरे कन्धेके ऊपर चढ़ जाते हैं और कहते हैं कि तुम कौनसे बड़े आदमी (धनी व्यक्ति) हो, तुम और हम समान हैं॥ २५ ॥ अमृतानुकणिका—'सखा'—श्रीदाम, सुबल, मधुमङ्गलादि। व्रजके इन सखाओंमें श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध सख्यभाव है। श्रीकृष्णमें उनकी ईश्वर-बुद्धि नहीं हैं, वे श्रीकृष्णको अपनेसे बड़ा नहीं मानते अपितु समान बुद्धि रखते हैं। इसी समान भावसे वे श्रीकृष्णके साथ निःसङ्कोच होकर खेलते हैं; कभी खेलमें हारकर श्रीकृष्णको कन्धेपर बैठाते हैं और कभी श्रीकृष्णके हार जानेपर उनके कन्धेपर चढ़ जाते हैं। कभी वनमें कोई फल प्राप्त होनेपर उसे चखकर देखते हैं और यदि वह स्वादिष्ट होता है, तो श्रीकृष्णको खिलाये बिना स्वयं खानेकी इच्छा नहीं करते। तब वे अपना जूठा फल श्रीकृष्णके मुखमें देकर कहते हैं—'कान्हा! यह फल खाकर तो देखो, कितना स्वादिष्ट है।' इस पयारमें दिखलाया है कि श्रीकृष्ण अपने व्रजके सखाओंके प्रेमके द्वारा कितने वशीभूत हैं। १५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत