श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२५-२६ ] द्वारका-मथुरादिके सखाओंका सख्य भाव इस पयारका लक्ष्य नहीं है। कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके विश्वरूपका दर्शनकर अर्जुन भयभीत होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। सख्य-भावसे पहले उन्होंने श्रीकृष्णके साथ हास-परिहासमें जो उनका अनादर किया था, उसके लिये वे क्षमा प्रार्थना करने लगे। किन्तु श्रीकृष्णके द्वारा अनेक बार गोवर्धन-धारण, वैकुण्ठ दर्शनादि अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करनेपर भी सुबलादि सखाओंकी ऐसी अवस्था कभी नहीं हुई॥२५॥ प्रिया यदि मान करि' करये भर्त्सन। वेदस्तुति हैते हरे सेइ मोर मन॥२६॥ अनुवाद—यदि मेरी प्रियतमा मान करके मेरी भर्त्सना (निन्दा) करती है, तो वह भर्त्सना वेदस्तुतियोंसे भी अधिक मेरे मनको हरण कर लेती है॥२६॥ अनुभाष्य—शुद्ध-अनुरागवश अपना परम-आत्मनीय माननेसे आश्रय (भक्त) के विषय (श्रीकृष्ण) के प्रति ताड़ना-भर्त्सनारूपी दुर्वचन भी उनकी आत्यन्तिक और ऐकान्तिक प्रीतिका ही परिचय हैं। जहाँपर विषयके प्रति पूज्य और गुरुबुद्धि होती है, वहाँ स्वाभाविक प्रीतिकी शिथिलता न्यूनाधिक रूपमें अवश्य वर्तमान होती है। प्रीतिरहित अज्ञानी जनोंके लिये वेदशास्त्रोंमें जो विधि और निषेध निर्धारित हुए हैं, उस प्रकार विधिके अनुरूप गौरव वाक्योंके द्वारा की गयी स्तुति (वैधस्तुति) की यदि उपरोक्त प्रीतिमूलक वाक्यों (भर्त्सना)से तुलना की जाय, तो इनमें गौरव-पूजाका अभाव होनेपर भी इनका उत्कर्ष वैधस्तुतिकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे मुक्त शुद्धभक्तोंका भगवान्के साथ अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसे सम्बन्धज्ञानसे जो नित्यवृत्तिका उदय देखा जाता है, वह ऐश्वर्यप्रधान वैध गौरवकी अपेक्षा सब प्रकारसे उपादेय अर्थात् कल्याणप्रद है॥२६॥ अमृतानुकणिका—मान—उःनीः शृङ्गारभेद-प्रकरण (१५/७४)— “दाम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः। स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥” अर्थात् “परस्पर अनुरक्त और एकत्र अवस्थित रहनेपर भी नायक-नायिकामें अपने-अपने अभिलषित आलिङ्गन, दर्शन, चुम्बन, प्रियभाषणके प्रतिबन्धक भावको 'मान' कहते हैं।” श्रीकृष्ण-प्रेयसी व्रजसुन्दरियाँ मानवती होकर अनेक बार श्रीकृष्णका तिरस्कार करती हैं, किन्तु श्रीकृष्ण इससे रुष्ट नहीं होते अपितु उन्हें इतना आनन्द होता है, जितना उन्हें वेद-स्तुति सुनकर भी नहीं होता। गोपियोंके निर्मल प्रेमके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत होकर स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे उनके प्रेमके ऋणशोधनमें असमर्थ हैं (भाः १०/३२/२२—न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां ०)। श्रीराधिकाके मानभञ्जनके लिये श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् होकर भी उनके चरणोंमें अपने शीशको नत करते हैं (गीत-गोविन्दम्—'देहि पदपल्लवमुदारं')। साधारणतः नायकके किसी अपराधके कारण नायिका मान करती है। कभी-कभी नायिकाके प्रति भी नायकका कारणाभासजनित मानका उदय होता है। इस पयारमें 'यदि' शब्दका तात्पर्य यह है कि व्रजसुन्दरियोंका श्रीकृष्णके प्रति सदा मान नहीं होता, किसी-किसी समय होता है और तभी वे श्रीकृष्णका तिरस्कार करती हैं। जहाँ प्रणय विराजमान होता है, वहींपर मान चौथा अध्याय | १५७