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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

४/३५ ] स्वरूपको प्रकट करनेमें विपुल सहायता होती है। पाँच प्रकारकी स्थायीभाव रतियोंमें सर्वश्रेष्ठ मधुर-रतिका सामग्रीसे योग जिस सर्वश्रेष्ठ रसको प्रकाश करता है, उसके प्रति जिसकी रुचि जाग्रत हुई है, वही उसका अधिकारी है। उस रुचिको जाग्रत करनेकी सुविधाके लिये भगवान् मत्स्य-कूर्म-वराहादि लीलाओंके विनिमयमें रामादि लीलाओंको इस प्रपञ्चमें प्रकट करते हैं। और भी, रामादि नरलीलाओंमें जिस रसकी चमत्कारिता प्रबल नहीं है, वह जीवकी जड़ बुद्धिसे परे होनेपर भी तथा अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी ऐश्वर्य एवं माधुर्य विचारके तारतम्यसे पारकीया मधुर रति अतुलनीय नवनवायमान चमत्कारिताको प्रकाशित करती है। प्राकृत बुद्धिवाले सहजिया लोग श्रीराधा-कृष्णकी अप्राकृत लीलाओंको ना समझनेके कारण उनका अनुकरण करके व्यभिचारमें प्रवृत्त होते हैं। ऐसे व्यभिचारके द्वारा विशुद्धसत्त्वमय गोलोकका वैचित्र्य उद्दिष्ट नहीं होता, अपितु वह उनके चित्तको मलिन करके इन्द्रिय-परायणतामें अधोपतित कराता है। अप्राकृत-लीलामें अधोक्षजकी सेवा वर्तमान है। प्राकृत सहजिया लोग यह बात नहीं समझकर श्रीकृष्णसेवाको भी भोगमय इन्द्रियतर्पण मानकर भ्रमित हो जाते हैं। प्रपञ्चागत भगवत्-लीला कुछ प्राकृत सहजियोंकी विचरण भूमि नहीं है अर्थात् उनका इसमें अधिकार नहीं है। श्रीकृष्णकी रासलीलादि योगमायाके द्वारा सम्पादित होती है और वह भौतिक विचारमें यथारूप परिलक्षित नहीं होती। सहजिया लोग श्रीकृष्णलीलाको नश्वर भोगोंके अन्तर्गत मानते हैं। वे “तत्परत्वेन निर्मलम्” और “तत्परो भवेत्” पदका विकृत अर्थ करके अप्राकृत-तत्त्वको प्राकृत-तत्त्व समझनेकी भूल करते हैं। वे “तादृशी क्रीड़ा” शब्दके अर्थभ्रमसे इन्द्रिय-तर्पणमें निमग्न होते हैं, किन्तु वास्तवमें अप्राकृत रति ही “तादृशी” शब्दका मुख्य अर्थ है। अविद्याग्रस्त हरिविमुख जीव अप्राकृत क्रीड़ाको नहीं समझकर अपनी प्राकृत बुद्धिके द्वारा जड़भोगमें उन्मत्त होकर इस श्लोकके अर्थका अनर्थ करते हैं। साधन और सिद्धिकी भूमिकामें विवर्त्त उपस्थित होनेपर ही अर्थात् साधनकी अवस्थामें स्वयंको सिद्ध समझनेपर ही जीव प्राकृत-सहजिया हो पड़ता है। विधिलिङ्का “भवेत्” शब्द देखकर किसीको केवल रुचिके द्वारा प्राप्य इस रागानुग पथको अधिकारका विचार किये बिना अनर्थयुक्त भोगियोंका ही वैधपथ नहीं समझना चाहिये। प्रपञ्चमें कर्त्तव्य (नैतिकता) और अकर्त्तव्य (अनैतिकता) का विचार होता है। गोलोक-वृन्दावनमें इस प्रकारका कोई नियम नहीं होता। वहाँ केवल लोभके वशीभूत होकर अनुरागके पथपर सभी आश्रित-तत्त्व श्रीकृष्ण-प्रीतिरूप रसका अनुसन्धान करते हैं। यदि कोई जीवात्माके नित्य और अवश्य सेव्य प्रपञ्चागत परमश्रेष्ठ मधुरभावके प्रति उदासीन होता है, तो वह निश्चितरूपसे ही भगवत्सेवाको छोड़कर नश्वर व्यभिचारमें अधःपतित होगा। मधुररतिमें तत्पर ना होनेपर जीवका मधुर-रतिके विपरीत जड़भोगवाद प्रबल हो जायेगा। इसी प्रकार वात्सल्यरतिसे श्रीकृष्णसेवासे विमुख होनेपर भोगप्रवृत्ति उसको नश्वर पुत्र-मोहमें अधोपतित करेगी। उसी प्रकार श्रीकृष्णको एकमात्र बन्धु ना माननेसे इन्द्रियपरायण नश्वर बन्धुगण आकर जीवको अधोपतित करेंगे। उस प्रकार भगवत्-विमुखता उपस्थित होनेपर जीव श्रीकृष्णसेवासे उदासीन होकर भोगपर इन्द्रियसेवी नश्वर देहकी सेवा करते-करते स्वरूप-विभ्रान्त चौथा अध्याय | १६३

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हो जायेगा। इसी प्रकार श्रीकृष्णमें निरपेक्ष बुद्धि ना होनेसे जीव श्रीकृष्णविमुख होकर जड़वस्तुसे निरपेक्ष अर्थात् ब्रह्ममें लीन एक पत्थरकी भाँति मोक्ष या निर्वाणका दास होकर निर्विशेषवादी हो जायेगा। श्रीकृष्णलीलामें प्रवेश करनेमें जिनकी उदासीनता होगी, उनकी ही इन्द्रिय-परायण भोगबुद्धि और उसके परिणामस्वरूप सत्कर्म और कुकर्ममें औपाधिक अस्मिता (देहमें 'मैं' और देह-सम्बन्धी वस्तुओंमें 'मेरा' का भाव) समृद्ध होकर परम कल्याणसे वञ्चित करेगी॥ ३५॥ अमृताणुकणिका - 'तत्परः' - भगवत्परायण अथवा लीलापरायण। परायण-पर (श्रेष्ठ) + अयन (गति या आश्रय); अर्थात् श्रेष्ठ गति अथवा आश्रय जिसका। इसलिये 'तत्परः' का अर्थ 'लीलाअनुष्ठानमें रत' नहीं है। जीव भगवत्-लीला-अनुष्ठानमें रत नहीं हो सकता, क्योंकि जीव भगवान् नहीं है। भगवान् स्वरूपशक्तिके सङ्गमें लीला करते हैं, किन्तु स्वरूपशक्तिके सङ्ग बद्धजीवकी क्रीड़ा सम्भव नहीं है। और 'तत्परः' शब्दका अर्थ 'भगवत्-लीलाके अनुकरणमें रत' भी नहीं है, क्योंकि भगवत्-लीलाका अनुकरण जीवके लिये निषिद्ध है। रासलीलाके प्रसङ्गमें श्रीशुकदेवने कहा (भाः १०/३३/३१)- “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौढ्याद्यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥” अर्थात् “श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा करता है, तो उसका विनाश अनिवार्य है। जैसे शिवके अतिरिक्त अन्य कोई हलाहल विषपान करे, तो उसका विनाश अवश्यम्भावी है।” यदि कहें उक्त रीतिसे परकीया प्रेम और औपपत्य रसका उत्कर्ष सिद्ध करनेसे तो सभी लोगोंका कल्याणके स्थानपर महान अकल्याण ही होगा। उनका इहलोक और परलोक, दोनों नष्ट हो जायेंगे। इस शङ्काके समाधान हेतु उत्तर देते हैं (उः नीः ३/२४)- “वर्तितव्यं शमिच्छद्भिर्भक्तवन्न तु कृष्णवत्। इत्येवं भक्तिशास्त्राणां तात्पर्यस्य विनिर्णयः॥” अर्थात् “अपना कल्याण चाहने वाले व्यक्तियोंको भक्तके समान आचरण करना चाहिये, श्रीकृष्णकी भाँति नहीं। यही समस्त भक्ति शास्त्रोंका निर्णयात्मक तात्पर्य है।” इस श्लोककी टीकामें श्रीजीव गोस्वामी लिखते हैं- “शृङ्गाररसकी बात तो दूर रहे, अन्य रसोंमें भी श्रीकृष्णके भाव अनुकरणीय नहीं हैं।” श्रीकृष्णवत् आचरण निषेध करके भक्तवत् आचरणकी विधि कही गयी है। अर्थात् वैष्णवजन जैसा आचरण करते हैं, उनके समान ही वैसा आचरण करना चाहिये। इसपर शङ्का हो सकती है कि भक्त दो प्रकारके होते हैं - सिद्ध और साधक, तो किन भक्तोंके आचरणका अनुसरण करें? इसके उत्तरमें कहते हैं-सिद्धोंका नहीं, साधकोंका अनुसरण करना चाहिये। लीलाविष्ट अवस्थामें प्रेमवैवश्य-वशतः अनेक बार सिद्ध कोटिके भक्तोंका आचरण प्रायः श्रीकृष्णके आचरण-तुल्य हो जाता है, जैसे रासस्थलीसे श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर गोपियाँ श्रीकृष्णके आचरणका अनुकरण करने लगीं। साधक कोटिके भक्तोंका आचरण भी सर्वथा अनुकरणीय नहीं है। साधकोंमें भी दुराचारी मिल जाते हैं, जैसे (गीता ९/३०) में भगवत्-वाक्य है 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।'

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अर्थात् अनन्य भावसे भजन करनेवाले साधक भक्तोंमें कभी-कभी परधन-अपहरण, परस्त्रीगमनादि सुदुराचार दिखलायी देता है; उनका यह निन्दनीय आचरण अनुकरणीय नहीं है। तो क्या सिद्ध और साधक भक्त, दोनों ही हमारे लिये अनुसरणीय नहीं हैं? नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिये। विचारपूर्वक आचार्योंने सिद्धान्त किया है कि जो सभी भक्त भक्ति-शास्त्रोंकी विधियोंका पालन करते हैं, उनका भक्ति-शास्त्रानुमोदित आचरण ही अनुसरणीय है। यहाँ एक और प्रश्न हो सकता है—गीतामें श्रीकृष्णने कहा—'श्रेष्ठ व्यक्ति जो-जो करते हैं, साधारण लोग उसका अनुसरण करते हैं; त्रिलोकमें मेरे लिये कोई भी कर्म नहीं है, किन्तु मैं यदि कोई कर्म नहीं करूँ, तो मेरा अनुसरण करके लोग भी कर्म नहीं करेंगे और समाजमें व्यभिचार फैलेगा। इसलिये लोगोंके मङ्गलके लिये अनासक्त भावसे कर्म करना उचित है।' इन सभी उक्तियोंसे यह समझा जाता हैं कि श्रीकृष्णका आचरण अनुकरणीय हैं। जब आदर्शकी स्थापनाके लिये वे कर्म करते हैं, तब उनका आचरण अनुकरणीय क्यों नहीं है? इसका उत्तर यह है कि श्रीकृष्ण किस प्रकारके कर्मकी बात कर रहे हैं, इसका विवेचन आवश्यक है। स्वजनोंके वधके भयसे अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे। गीताके द्वितीय अध्यायमें श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा कि तुम क्षत्रिय हो और युद्ध करना तुम्हारा स्वधर्म है तथा धर्मयुद्धमें स्वजनोंका वध पाप नहीं है। तृतीय अध्यायमें यही बात अन्य प्रकारसे कही है। यहाँपर भी स्वधर्म अथवा वर्णाश्रम-धर्मकी बात कही है। भागवतमें कहा गया है कि जब तक कर्मोंसे निर्वेद अवस्था नहीं आती, किम्वा भगवत्-कथादिमें श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, तब तक कर्म करना चाहिये। कर्मोंसे निर्वेद अवस्था उत्पन्न होनेपर लोग ज्ञानमार्गका साधन और तत्पश्चात् भगवत्-कथामें रुचि उत्पन्न होनेपर भक्तिमार्गके साधनका अवलम्बन करेंगे। इससे पूर्व कर्म करनेका विधान इसलिये किया गया है कि यथायथ भावसे कर्मानुष्ठानसे चित्त शुद्धिकी सम्भावना है, चित्तशुद्धि होनेपर किसी भाग्यसे भक्तिमार्गके अनुष्ठानमें रति उत्पन्न हो सकती है। गीता ३/१७में आगे कहा है— “यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥” अर्थात् “जो व्यक्ति आत्माराम हैं और आत्मामें ही तृप्त रहनेवाले हैं एवं आत्मामें ही सन्तुष्ट हैं, उनके लिये कोई कर्त्तव्य कर्म नहीं हैं।” किन्तु लोग उनकी आन्तरिक दशाको नहीं समझकर उनके बाह्य आचरणका अनुसरण करेंगे, इसलिये ऐसे आत्माराम पुरुष भी लोक कल्याणके लिये कर्मका आचरण करते हैं। श्रीकृष्णका जन्म और कर्म दिव्य हैं, वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, उनका जन्म किसी कर्मके फलसे नहीं है, वे स्वेच्छासे जन्म ग्रहण करते हैं। स्वरूपतः उनका कोई वर्णाश्रम भी नहीं है, इसलिये वर्णाश्रमोचित धर्म उनका नहीं है। वर्णाश्रमोचित कर्म बद्धजीवोंकी चित्तशुद्धि और समाजके मङ्गलके लिये हैं। ये श्रीकृष्णके लिये नहीं हैं, तो भी जब वे नरलीला करनेके लिये जगत्में अवतीर्ण होते हैं, वे क्षत्रियकुलमें आविर्भूत होकर गृहस्थाश्रमका अभिनय करते हैं। इसलिये वे वर्णाश्रमोचित जो-जो कर्म, जैसे द्वारकामें वे कहीं होम करते, कहीं पञ्चसूना-यज्ञ करते, सन्ध्या-वन्दनादि करते हुए दिखलायी देते हैं, वह केवल आदर्श-स्थापना

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और लोक-संग्रहके लिये है। इन्हीं कर्मोंका उन्होंने गीताके दूसरे और तीसरे अध्यायमें वर्णन किया है, भक्तोंके साथ उनकी आनन्दमयी क्रीड़ारूपी लीलाका नहीं। किन्तु 'अनुग्रहाय भक्तानामादि' श्लोकोंमें उनकी लीलाओंका वर्णन है। वे रसिकशेखर हैं, वे लीलाओंके द्वारा अपने प्रेमीभक्तोंके साथ रसास्वादन करके आनन्द अनुभव करते हैं और भक्तोंको भी आनन्द प्रदान करते हैं। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है, इसलिये दासोचित सेवाका भाव चित्तमें स्फुरित करानेके लिये श्रीकृष्णकी लीलाओंके श्रवण-कीर्तनादि साधनभक्तिका अनुष्ठान ही जीवका कर्तव्य है। इसके विपरीत कुछ भी करनेपर श्रीकृष्ण-दासत्व स्फुरित होनेकी कोई भी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णकी लीलाके अनुकरणसे केवलमात्र अपराध ही सञ्चित होंगे। विशेषतः लीलानुकरण साधनभक्तिका अङ्ग है, ऐसा किसी भी शास्त्रमें नहीं कहा गया है; इसलिये लीलानुकरणसे भक्तिदेवीकी कृपा प्राप्त करनेकी सम्भावना भी नहीं है, अपितु शास्त्रादेश-उल्लङ्घनजनित अपराध ही होंगे। श्रीमद्भागवत और अन्यान्य शास्त्रोंमें सर्वत्र ही श्रीकृष्ण कथा श्रवण करनेका महात्म्य ही वर्णित हुआ है, लीलानुकरणका कहीं भी उल्लेख नहीं है॥ ३५॥ रागमयी भक्तिके प्रचारकी इच्छा ही श्रीगौरावतारका मुख्य कारण :- एइ वाञ्छा यैछे कृष्णप्राकट्य-कारण। असुरसंहार-आनुषङ्ग प्रयोजन॥ ३६॥ धर्मकी स्थापनादि स्वयंरूप श्रीकृष्ण या श्रीगौरका मुख्य कार्य नहीं :- एइ मत चैतन्य-कृष्ण पूर्ण भगवान्। युगधर्मप्रवर्त्तन नहे ताँर काम॥ ३७॥ अनुवाद-जिस प्रकार प्रेमरस-निर्यायसका आस्वादन और रागमार्गकी भक्तिके प्रचारकी इच्छाएँ ही श्रीकृष्णके प्रकट होनेका मुख्य कारण है तथा असुरोंका संहार तो केवल आनुषङ्गिक प्रयोजन है, उसी प्रकार श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु स्वयं-भगवान् हैं, नामसङ्कीर्त्तनरूप युगधर्मकी स्थापना इनका कार्य नहीं है॥ ३६-३७॥ स्वांश युगावतारके साथ अवतारीका मिलन :- कोन कारणे यबे हैल अवतारे मन। युगधर्मकाल हैल से काले मिलन॥ ३८॥ अनुवाद-जिस-किसी कारणसे जब स्वयं-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अवतार लेनेकी इच्छा हुई, तब युगधर्म-काल उस कालमें मिल गया॥ ३८॥ गुह्य और बाह्य कारणसे अवतीर्ण होकर स्वयं आचार और प्रचार :- दुइ हेतु अवतरि' लञा भक्तगण। आपने आस्वादे प्रेम-नाम-सङ्कीर्त्तन॥ ३९॥ सेइ द्वारे आचण्डाले कीर्त्तन सञ्चारे। नाम-प्रेममाला गाँथि पराइल संसारे॥ ४०॥ अनुवाद-अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग, इन दो कारणोंसे स्वयं-भगवान् अपने भक्तोंको लेकर

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४/३६-४१ ] अवतरित हुए और भक्तोंके साथ स्वयं प्रेम एवं नामसङ्कीर्त्तनका आस्वादन किया तथा इसके द्वारा उन्होंने कीर्त्तनका प्रचारकर चण्डाल जैसे नीच लोगोंको भी प्रेमदान किया। उन्होंने नाम-प्रेमरूपी मालाको गूँथकर सम्पूर्ण संसारको पहनायी ॥ ३९-४० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णावतारमें जिस प्रकार उक्त अभिलाषाके लिये श्रीकृष्ण प्रकट हुए थे और असुर-संहार उनका मूलप्रयोजन ना होकर केवल आनुषङ्गिक प्रयोजन था, उसी प्रकार गौरावतारमें श्रीकृष्णचैतन्य पूर्णतम भगवान् हैं। नामसङ्कीर्त्तनरूप युगधर्मकी स्थापना उनका अपना कार्य नहीं था, परन्तु किसी गूढ़ कारणके लिये जब पूर्ण भगवान्ने अवतीर्ण होनेके लिये इच्छा की, तो घटनाक्रमसे उसी समय युगधर्मकाल भी आकर उपस्थित हो गया। इसलिये श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके गूढ़ अन्तरङ्ग प्रयोजन और युगधर्म प्रचाररूप बाह्य प्रयोजन-इन दो कारणोंसे अवतीर्ण होकर उन्होंने प्रेम और नामसङ्कीर्त्तनका भक्तोंके साथ आस्वादन किया ॥ ३६-३९ ॥ एइमत भक्तभाव करि' अङ्गीकार। आपनि आचरि' भक्ति करिल प्रचार ॥ ४१ ॥ अनुवाद-इस प्रकार उन्होंने भक्तभावको अङ्गीकार करके स्वयं आचरण किया और भक्तिका प्रचार भी किया ॥ ४१ ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णने अपनी औदार्यलीलाको प्रकट करनेकी इच्छासे अपनी नित्य गौरलीलाको इस प्रपञ्चमें प्रकाशित किया। नित्य गौरलीलामें श्रीकृष्णका भक्तभाव ही उनकी नित्यलीलाकी चमत्कारिता है। स्वयंरूप श्रीकृष्णने नित्यगौरलीलाको इस प्रपञ्चमें प्रकट करके सेव्य श्रीकृष्णकी सेवाको जीवके लिये सुलभ किया है। प्राकृत-साहजिक लम्पट-सम्प्रदायके लोग अप्राकृत विप्रलम्भके स्वरूपज्ञानको नहीं जानते हैं। श्रीगौरसुन्दरने जिस कारणसे भक्तभावको अङ्गीकार किया, उसका खण्डन करके वे उन्हें अवैधरूपसे सम्भोगविग्रह 'नागर' कहकर स्वयंको “नदीय-नागरी” या “गौरनागरी” आदि काल्पनिक शब्दोंसे भूषित करते हैं। इस प्रकार नित्य विप्रलम्भ रसके भक्त अथवा आश्रय-जातीय भावोंको विलुप्तकर वे लोग जो कुकर्म करते हैं, उससे स्वयंरूप श्रीकृष्ण कभी सन्तुष्ट नहीं होते हैं। स्वयंरूप श्रीगौरविग्रह उन सभी प्राकृत भोगपरायण साहजिकगणोंपर कृपा करनेके बदले बहुत दूरसे उनका त्याग कर देते हैं। उनका श्रीकृष्णलीलाके सम्भोग विचारसे विप्रलम्भ-रस-लीलामय कृष्णभक्तिके विनाशका प्रयास श्रीगौरसुन्दरसे विद्वेषके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ४१ ॥ अमृतानुकणिका-श्रीकृष्णके औदार्यमय गौरावतारका वैशिष्ट्य यह है कि इस बार साधारण जीवोंको, यहाँ तक पापियोंको भी अपने भजनकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जगत्में अवतीर्ण हुए हैं। इस बार भगवान् द्वापर युगकी भाँति केवल “मामेकं शरणं व्रज” नहीं कह रहे हैं। अपितु क्या करनेसे उनके शरणागत हुआ जायेगा, हाथ पकड़कर वह शिक्षा देनेके लिये अपनी अचिन्त्य-शक्तिबलसे भक्तभाव अङ्गीकार करके अवतीर्ण हुए हैं। कोई लोग तर्क करके कह सकते हैं कि श्रीचैतन्यदेवके भक्तोन्मत्त भाव साधारण लोगोंके लिये अनुसरणीय नहीं हैं। इस प्रसङ्गमें वे श्रीचैतन्यदेवके श्रीनृसिंह अथवा श्रीवराह अवतारके भाव-प्रदर्शनका दृष्टान्त उल्लेख करते हैं, परन्तु यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि श्रीमन्महाप्रभुका श्रीनृसिंह चौथा अध्याय | १६७

[ ४/४१-४४

अथवा श्रीवराह अवतारका भाव-प्रदर्शन भक्तोन्मत्त भाव नहीं है। वह तो श्रीगौरनारायणका आत्मस्वरूप-ऐश्वर्य-प्रकाश-लीला है। भक्तभावसे कोई कभी भी अपनेमें श्रीकृष्ण, श्रीनृसिंह, श्रीवराह, श्रीराम आदि विष्णुतत्त्व होनेका अभिमान नहीं करता। भक्तोंमें विष्णुके दास या दासानुदासके अतिरिक्त अन्य कोई अभिमान नहीं है। “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः” (भागवत १०/३३/३०) अर्थात् जीव कभी भी अपनेको मनके द्वारा भी ब्रह्म होनेकी कल्पना ना करे। क्योंकि जीव अनीश्वर अथवा वश्य-तत्त्व है। अनीश्वर होकर जो मूढ़तावशतः अपनेको ईश्वर मानते हैं, वे निश्चय ही विनष्ट हो जाते हैं। एकछत्र भोक्ता-तत्त्व भगवान् श्रीकृष्णकी रासादि-लीला, भगवान् बलदेवकी मद्यपान-लीला, द्वारकाधीशकी सोलह हजार महिषियोंसे विवाहकी लीला आदि भोग्य और वश्य जीवके लिये अनुकरणीय नहीं है। किन्तु श्रीकृष्ण और श्रीबलदेवने लोकशिक्षाके लिये सान्दीपनी मुनिके आश्रममें रहकर जो वेदाध्ययन और गुरुसेवाका आदर्श उन्होंने दिखलाया है, वहाँ यदि कोई उपरोक्त श्लोकका प्रयोग करके श्रीराम-कृष्णके आदर्शके अनुसरणसे विमुख हो जाय, तब उसे मन्दभाग्य ही कहा जायेगा। भगवान्की लोकशिक्षाके उद्देश्यसे की गयी लीलाओंका अवश्य अनुसरण करना चाहिये। अनर्थयुक्त जीव भगवान् श्रीगौरसुन्दर अथवा श्रीनित्यानन्द प्रभुके जैसे स्त्रीके स्वामी होनेकी इच्छा करके माल्य, चन्दन, ताम्बूल आदि भोग करनेकी स्पृहा करके परम अनर्थ-सागरमें पतित होंगे। किन्तु लोक-शिक्षक श्रीगौर-नित्यानन्दके द्वारा आचरित और प्रचारित विष्णु-वैष्णव-सेवा, सर्वात्माके द्वारा सब समय श्रीकृष्ण-अनुसन्धानके आदर्शको ग्रहण ना करनेके कारण श्रीगौरसुन्दरकी अहैतुकी-महावदान्यतारूपी गङ्गाके तटपर अवस्थित रहकर भी माया मरीचिकाके द्वारा ही भ्रान्त होंगे-ऐसा समझना चाहिये॥४१॥ शान्तके अतिरिक्त चारों रसोंके आश्रयवर्गकी श्रीकृष्णप्रीति ही काम्य :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार। चारि प्रेम, चतुर्विध भक्तइ आधार ॥४२॥ भक्तगण अपने-अपने रसकी श्रेष्ठता मानते हैं :- निज निज भाव सबे श्रेष्ठ करि' माने। निजभावे करे कृष्णसुख-आस्वादने ॥ ४३ ॥ निरपेक्ष विचारसे अप्राकृत मधुररसमें अन्यान्य रस अन्तर्भुक्त होनेपर श्रीकृष्णप्रीतिचेष्टा सर्वापेक्षा अधिक :- तटस्थ हइया हृदि विचार यदि करि। सब रस हैते शृङ्गारे अधिक माधुरी ॥ ४४ ॥ अनुवाद-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, ये चार प्रकारके रस हैं। चार प्रकारके भक्त इन रसोंमें प्रेमके आधार हैं। अपने-अपने भावको सभी भक्त श्रेष्ठ मानते हैं और अपने भावोंसे श्रीकृष्णकी सेवाकर उनके सुखमें स्वयं सुखका आस्वादन करते हैं। परन्तु निरपेक्ष होकर हृदयमें यदि विचार किया जाय, तो सभी रसोंसे शृङ्गार (मधुर) रसमें माधुर्य अधिक है॥४२-४४॥

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४/४२-४६ ] अमृतप्रवाह भाष्य-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-इन चार प्रकारके रसोंके भक्तोंमें प्रत्येकको अपने-अपने द्वारा कृष्णसुखास्वादन सर्वश्रेष्ठ लगता है, किन्तु तटस्थ अर्थात् निरपेक्ष होकर देखनेसे मधुर अर्थात् शृङ्गाररसकी माधुरी अन्य तीन रसोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ माननी होगी ॥ ४२-४४॥ दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें उत्तरोत्तर श्रीकृष्ण-सुखास्वादनका आधिक्य :- भक्तिरसामृतसिन्धु (२/५/३८)- यथोत्तरमसौ स्वादविशेषोल्लासमप्यपि। रतिर्वासनया स्वाद्धी भासते कापि कस्यचित् ॥ ४५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उल्लासमयी रति उत्तरोत्तर आस्वादन-विशेष प्रतीत होती है। वही रति स्थान-विशेषपर वासनाक्रमसे परमास्वादनीय होकर मधुर-रसरूपमें प्रकाश पाती है ॥ ४५ ॥ अनुभाष्य-असौ रतिः यथोत्तरम् (उत्तरोत्तरक्रमेण) स्वादविशेषोल्लासमयी (मधुरविशेषस्य आधिक्यवती) अपि वासनया (वासनाभेदेन) का अपि (रतिः) कस्यचित् (भक्तस्य) स्वाद्धी भासते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४५ ॥ मधुर रसमें दो प्रकार स्थिति, स्वकीया और परकीया :- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ ४६ ॥ अनुवाद-इसलिये इसका नाम मधुर रस है। यह दो प्रकारका होता है, एक स्वकीया और दूसरा परकीया ॥ ४६ ॥ अनुभाष्य-उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीरूप गोस्वामीने स्वकीया और परकीयाकी इस प्रकार परिभाषा दी है। स्वकीया कृष्णवल्लभा- “करग्राह विधिं प्राप्ताः पत्युरादेशतत्पराः। पातिब्रत्यादविचलाः स्वकीयाः कथिता इह ॥ ” अर्थात् “शास्त्रकी विधिके अनुसार जिनका पाणिग्रहण हुआ है, पतिके आदेश पालनमें जो सदा तत्पर रहती हैं और पातिव्रत्य-धर्मसे कभी विचलित नहीं होतीं, रसशास्त्रमें उनको 'स्वकीया' नारी कहा गया है।” परकीया कृष्णवल्लभा,- “रागेणैवार्पितात्मानो लोकयुग्मानपेक्षिणा। धर्मेणास्वीकृता यास्तु परकीया भवन्ति ताः ॥” अर्थात् “पर-पुरुषके अनुरागसे आकृष्ट होकर जो आत्मसमर्पण करती हैं और इस प्रकारका यौनसम्बन्ध धर्मशास्त्रविधिके द्वारा अस्वीकृत जानकर भी इस लोक और परलोकमें किसी भी असुविधाकी चिन्ता नहीं करती हैं, उनको 'परकीया रमणी' कहा जाता है।”॥४६॥ अमृतानुकणिका-सभी अप्राकृत रसोंके मध्य श्रीकृष्णका मधुररस अपार, अतुल, असमोध्र्व है। किन्तु श्रीकृष्णके दो असीम गुण जीवके पक्षमें बड़े ही उपादेय हैं। एक-उनकी सर्वशक्तिमत्ता और दूसरा-उनकी निरङ्कुश इच्छा। अपनी सर्वशक्तिमत्ताके प्रभावसे वे अपार, असमोध्र्व तत्त्वको चौथा अध्याय | १६९

[ ४/४६

अनायास ही प्रपञ्चमें ला सकते हैं। अपनी निरङ्कुश इच्छा-प्रभावसे वे तुच्छ प्रपञ्चमें उनके सर्वोत्कृष्ट तत्त्व प्रकाश करनेकी इच्छा करते हैं और प्रपञ्चकी हेयता और न्यूनतासे सम्पूर्ण रूपसे अस्पृष्ट रहकर भी ये सभी सर्वोत्कृष्ट तत्त्व प्रेमाञ्जनयुक्त भक्तिनेत्रोंवाले भक्तोंके अप्राकृत दर्शनके विषयीभूत होते हैं। विशेषतः कलियुगके जीवोंके सौभाग्यकी पराकाष्ठाकी बात तो सम्पूर्ण रूपसे कही नहीं जा सकती। क्योंकि इस युगमें स्वयं माधुर्य-विग्रह श्रीकृष्ण अपनी अपूर्व लीलारसका वितरण करनेके लिये औदार्यमय विग्रह रूपमें प्रकटित हुए हैं। और जीवोंके सौभाग्यका पथ इस युगमें ऐसे सहज भावसे आविष्कृत हुआ है कि स्वयं विषय (श्रीकृष्ण) सर्वश्रेष्ठ आश्रय (श्रीराधा) के भावोंको लेकर लोक-शिक्षक हुए हैं। 'आत्म' और 'पर'–ये दो तत्त्व हैं। आत्मनिष्ठ धर्म ही–आत्मारामता है, उसमें रसकी पृथक् सहायता नहीं है। किन्तु पररामता धर्ममें रसविचित्रता और रसोत्कर्षके लिये अनेक प्रकारकी पृथक् सहायताका अवस्थान है। आत्मारामता और पररामता, दोनों नित्य व्यापार हैं। श्रीकृष्ण एक ओर 'आत्माराम' और दूसरी ओर वैसे ही 'परराम' हैं। इस प्रकारके विरुद्धधर्मका समन्वय अचिन्त्यशक्तियुक्त लीलापुरुषोत्तमके पक्षमें स्वाभाविक ही है। श्रीकृष्णलीलाके एक केन्द्रमें आत्मारामता, और उसके विपरीत केन्द्रमें पररामताकी पराकाष्ठारूप परकीयता है। आत्मारामताकी दिशामें अग्रसर होनेसे क्रमशः रसकी निरपेक्षता और शुष्कता प्रकट होती है। और परकीयकी दिशामें अग्रसर होनेपर साथ-साथमें रसकी अधिकतर प्रफुल्लता प्रकट होती है। (भाः १०/३३/१६)–“रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्व-प्रतिबिम्ब-विभ्रमः॥” (भाः १०/३३/१९)–“रेमे स भगवान्स्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥” (भाः १०/३३/२५)–“सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः”, इन भागवतीय वचनोंके द्वारा यह स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि 'आत्मारामता' ही श्रीकृष्णका निजधर्म है। श्रीकृष्ण अद्वयतत्त्व हैं और उनकी शक्तियाँ अनन्त हैं (परस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते—श्वेताश्वतर ६/८)। वे सभी शक्तियाँ रूपवती होकर आत्माराम श्रीकृष्णको क्रीड़ा कराती हैं। श्रीकृष्णकी एक पराशक्ति ही रसविलासके लिये अनन्तशक्ति रूपमें प्रकाशित होती है। ये अनन्तशक्तियाँ पराशक्तिका कायव्यूह या विस्तार हैं। रासक्रीड़ामें श्रीकृष्ण जितनी संख्यामें हैं, गोपीशक्ति भी उसी संख्यामें प्रकाशित होती है। सभी श्रीकृष्ण ही हैं, किन्तु चित्शक्ति योगमाया श्रीकृष्णकी इच्छासे श्रीकृष्णको और गोपियोंको पृथक् प्रकट करती है, लीला-पोषणके लिये सभीको पृथक् भावसे सजाती है और रसपोषणके लिये परस्पर पारकीय सम्बन्धका ज्ञान प्रदान करती है। अचिन्त्य चित्शक्तिका यह अचिन्त्य कार्य क्षुद्रजीव अथवा ब्रह्मादि अधिकारिक देवताओंकी बुद्धिके भी अगम्य है। श्रीकृष्ण ऐश्वर्यमय चित्-जगत्में आत्मशक्तिको लक्ष्मीरूपमें प्रकट करके स्वकीय बुद्धिसे रमण करते हैं। यह स्वकीय बुद्धि प्रबल होनेसे दास्यरस पर्यन्त ही वहाँपर रसकी सुन्दर गति है अर्थात् उस स्थानका मधुररस-सादृश्य भी दास्यके स्तरपर स्थित है। और स्वकीय अभिमानसे रसकी अत्यन्त दुर्लभता और चमत्कारिता नहीं है, ऐसा देखकर श्रीकृष्ण आत्मशक्तिको लाखों गोपीरूपोंमें पृथक् करके विलास करते हैं।

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पारकीया रति ही परमा रति है, ऐसा कहते हुए श्रीरूप गोस्वामीने आलङ्कारिक भरतमुनिके वाक्यको उद्धृत किया है (उःनीः १/२०)— “बहु वार्यते यतः खलु यत्र प्रच्छन्नकामुकत्वं च। या च मिथो दुर्लभता सा मन्मथस्य परमा रतिः॥” अर्थात् “जिस रतिमें समाजगत और धर्मगत बहुत प्रकारके निवारण अर्थात् बाधाएँ रहती हैं, जिस रतिमें परस्पर प्रच्छन्न कामुकता होती है तथा परस्परके दर्शन, स्पर्शन और सम्भाषणके विषयमें भी दुर्लभता रहती है, उसीको कामकी श्रेष्ठ और परम शोभामयी रति (रमणीय या क्रिया) समझना चाहिये।” (उःनीः १/२१)— “लघुत्वमत्र यत्प्रोक्तं तत्तु प्राकृतनायके। न कृष्णे रसनिर्यास्स्वादार्थमवतारिणि॥” अर्थात् “किन्तु इस उपपतिभावकी जो लघुता बतलायी गयी है, वह केवल प्राकृत नायकोंके सम्बन्धमें ही प्रयोज्य है, स्वराट् लीला-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं। क्योंकि वे स्वयं-अवतारी हैं और मधुररस आस्वादनके लिये ही उनका अवतार हुआ है।” ‘पर’ शब्दसे एकमात्र श्रीकृष्णको ही समझना चाहिये। श्रीकृष्ण सम्बन्धीय वस्तु ही ‘पारकीय’ है। और श्रीकृष्ण ही जिस स्थानपर एकमात्र नायक हैं, उस स्थानपर परकीयताको कभी भी घृणास्पद अथवा व्यभिचार कहकर ग्रहण नहीं किया जा सकता। सामान्य कोई जीव जब ‘नायक’ पदवीको प्राप्त होता है, तब विषयके बहुत्व होनेके कारण धर्म और अधर्मका विचार आता है। गोलोकविहारी श्रीकृष्णचन्द्र जब अपने पर-रसको प्रपञ्चमें गोकुलके साथ लेकर आते हैं, तब गोपियोंके सम्बन्धमें जड़ालङ्कारगत अक्षज-विचारका वहाँ कोई स्थान नहीं होता है। श्रीउज्ज्वलनीलमणि ग्रन्थ (३/३२)में श्रीलरूपगोस्वामीपादने लिखा है— “मायाकलिततादृक्स्त्रीशीलनेनानसूयुभिः । न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः॥” अर्थात् “प्रकटलीलामें व्रजगोपियोंके पतिका अभिमान रखनेवाले केवल उन-उन भावोंके माया अवतार मात्र हैं। गान्धर्व-विवाहादि मायिक धारणामात्र है। मायाकल्पित विवाहित पतिका अभिमान रखनेवालोंके साथ श्रीकृष्ण-स्वरूपशक्ति व्रजगोपियोंका कभी भी मिलन नहीं होता है। वस्तुतः एकमात्र शक्तिमान् विग्रहकी स्वरूपगत शक्ति गोपियोंका अन्यत्र स्वरूपतः विवाह नहीं हैं, उनका उपपतित्व अथवा परदारत्व नहीं है।” तथापि परोढ़त्व अभिमान नित्य वर्तमान है। ऐसा ना होनेपर अपूर्व रसोदयका प्राकट्य कभी भी स्वभावतः नहीं होता। रसज्ञ व्यक्ति ही इस बातको अनुभव कर सकते है। दूसरे लोगोंके पक्षमें आलोचना प्रसार निष्प्रयोजनीय है। चित्शक्ति योगमाया गोलोकस्थ नित्य-मूल-स्वरूप परोढ़ा-अभिमानको श्रीकृष्णकी नित्य-स्वरूपशक्तियों (गोपियों) के साथ-साथ व्रजमें लाकर उस-उस अभिमानको पृथक् सत्तारूपमें (पतिरूपमें) स्थित करती है। उनके साथ गोपियोंका विवाह सम्पादन कराके श्रीकृष्णको नश्वर विषय-भोक्ता पतिके स्थानपर नित्यपति निर्देश करके योगमाया श्रीकृष्णको उनके नित्य अनुरागका विषय कहती हैं। सर्वज्ञ पुरुष श्रीकृष्ण और उनकी

चौथा अध्याय | १७१

[ ४/४६-५० सर्वज्ञा स्वरूपशक्तियाँ योगमायाके द्वारा अपने-अपने रसके आवेशमें उस-उस प्रत्ययको स्वीकार करते हैं; इससे रसका उत्कर्ष और स्वेच्छामय लीला-पुरुषोत्तमकी इच्छाशक्तिका परमोत्कर्ष लक्षित होता है। इस प्रकार उत्कर्ष वैकुण्ठ या द्वारकामें नहीं होता है। उज्ज्वलरसमें नायकचूड़ामणि श्रीकृष्ण ही विषयालम्बन अथवा नायक हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त श्रीकृष्णके राम-नृसिंहादि अवतार अथवा नारायण उज्ज्वल रसके नायक नहीं हो सकते। श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति गोपियाँ 'पर' अर्थात् परमपुरुष श्रीकृष्ण सम्बन्धी हैं। अद्वितीय भोक्ता श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कोई भी उनका भोक्ता नहीं हो सकता। योगमायाके प्रभावसे अभिमन्यु आदि मायाकल्पित अवतारगण उन सब गोपियोंमें अपनी विवाहिता पत्नीका अभिमान करते हैं। अभिमन्यु आदि कृष्णेतर-तत्त्वकी वञ्चना करना ही व्रजगोपियोंकी जड़-भोगरत कृष्णसेवाविमुख पतियोंकी वञ्चना है। इसलिये इस प्रकारके पतियोंकी वञ्चना करके एकमात्र पति श्रीकृष्णके सुखतात्पर्यका विधान करना ही व्रजगोपियोंकी पारकीयत्व अथवा श्रीकृष्ण-सम्बन्धमें नित्य अवस्थिति है। इसलिये गोलोकके पारकीय और स्वकीय रसका अचिन्त्य-भेदाभेद सम्बन्ध है। वहाँ पारकीय-सार जो स्वकीय-निवृत्ति है और जो स्वकीय-सार जो पारकीय-निवृत्तिरूप स्वरूपशक्ति-रमण है, दोनोंमें एक रस होकर दोनों वैचित्रताके आधाररूपमें विराजमान है। श्रीकृष्णमें धर्म-अधर्मशून्य पतित्व और उपपतित्व शुद्ध निर्मल रूपमें युगपत् अवस्थित है॥४६॥ इनमेंसे परकीय-भावका श्रीकृष्णप्रीतिका सर्वाधिक्य और केवलमात्र व्रजमें ही इसका अधिष्ठान :- परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास॥४७॥ व्रजललनाओंमें पारकीय-भावका नित्यावस्थान और श्रीराधामें उसकी पराकाष्ठा :- व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥४८॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्य्यरस-आस्वाद-कारण॥४९॥ श्रीराधाका भाव अङ्गीकार करके श्रीगौररूपमें अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :- अतएव सेइ भाव अङ्गीकार करि' । साधिलेन निजवाञ्छा गौराङ्ग-श्रीहरि॥५०॥ अनुवाद-परकीया भावमें रसका अत्यन्त उल्लास होता है और व्रजके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी इसका वास नहीं है। व्रजवधुओंमें यह भाव सब समय रहता है और उनमें श्रीराधामें इस भावकी चरमसीमा-मादनाख्या महाभाव तक है। उनका श्रीकृष्णैकसुख-तात्पर्यमय परिपक्व निर्मलभाव ही सर्वोत्तम प्रेम है और यही प्रेम श्रीकृष्णके द्वारा माधुर्यरसके आस्वादनका कारण है। इसलिये उसी भावको अङ्गीकार करके गौराङ्ग श्रीहरिने अपनी इच्छाएँ पूर्ण कीं॥४७-५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्य तीन रसोंसे शृङ्गार रसकी माधुरी अधिक होनेके कारण उसको 'मधुररस' कहा जाता है। वह मधुररस दो प्रकारका होता है-स्वकीय और पारकीय। श्रीकृष्णको १७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

विवाहित पति रूपमें ग्रहण करनेसे जो मधुररस उदित होता है, उसे स्वकीय-मधुररस कहते हैं। श्रीकृष्णको उपपति माननेसे जो मधुररस उदित होता है, उसे पारकीय-मधुररस कहा जाता है। मधुररस विचारकोंका यही एकमत है कि पारकीयभावमें मधुररसमें उल्लास अधिक है और व्रजके अतिरिक्त और यह भाव कहीं भी नहीं है। अनेक लोग ऐसा सोचते हैं कि श्रीकृष्ण तो गोलोकमें नित्य विहार करते हैं और उन्होंने केवल अल्प समयके लिये व्रजमें प्रकट होकर इस पारकीय-भावमें लीला की थी। हमारे पूर्व आचार्य गोस्वामियोंका यह मत नहीं है। उनके मतानुसार व्रजविहार भी नित्य है। नित्य चिन्मयधाम गोलोकके अति-अन्तरङ्ग प्रकोष्ठका नाम ही 'व्रज' है। जिस प्रकार प्रपञ्चावतारमें श्रीकृष्णकी लीलाएँ हुई हैं, नित्यधाम व्रजमें भी उसी प्रकार लीलाएँ नित्य विराजमान हैं। व्रजमें पारकीय रसका नित्य अवस्थान है। कविराज गोस्वामीने तीसरे अध्यायमें कहा है— “अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे। ब्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे॥” 'व्रजेर सहिते'- इस शब्दसे स्पष्ट रूपसे समझा जाता है कि चिन्मयधाममें 'व्रज' एक अचिन्त्य लीलीस्थली है, उसी लीलास्थलीके साथ श्रीकृष्ण अपनी चित्शक्तिबलसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण हुए थे। गोलोकके अन्तःपुर उस नित्य व्रजके अतिरिक्त पारकीय रसकी अन्यत्र स्थिति नहीं है, क्योंकि वहाँपर गोलोककी अपेक्षा अनन्तगुणा श्रेष्ठ रसका अवस्थान है। प्रकटव्रजमें अप्रकटव्रजकी विचित्रता जीवकी आँखोंके समक्ष दिखलायी देती है, दोनोंमें यही मात्र अन्तर है। व्रजवधुओंके भावकी अवधि अर्थात् अन्तिम सीमा श्रीराधामें हैं। परिपक्व विमलभावरूप श्रीराधाका व्रजगत-प्रेम ही सर्वोत्तम है। श्रीकृष्णके माधुर्यरसका जहाँतक आस्वादन सम्भव है, उसकी प्राप्ति ही इस प्रेमका कारण है। इसलिये उस भावको अङ्गीकार करके गौराङ्ग-श्रीहरिने अपनी इच्छाएँ पूर्ण की॥४६-५०॥ स्तवमाला प्रथम चैतन्याष्टकमें (२)- सुरेशानां दुर्गं गतिरतिशयैनोपनिषदां मुनीनां सर्वस्वं प्रणतपटलीनां मधुरिमा। विनिर्यांसः प्रेम्णो निखिलपशुपालाम्बुजदृशां स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥५१॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवताओंके लिये दुर्गम, उपनिषदोंके लिये कष्टगम्य, मुनियोंके सर्वस्व, शरणागत भक्तोंकी मधुरिमा, व्रजयुवतियोंके नयनोंके लिये प्रेमकी सार-वस्तु स्वरूप, वे चैतन्यचन्द्र क्या पुनः मेरे दृष्टिगोचर होंगे?॥५१॥ अनुभाष्य-सुरेशानां (महेन्द्रादीनां) दुर्गं (दुरधिगम्यः आश्रयः), उपनिषदं (वेदशिरोभागानाम्) अतिशयेन गतिः (लक्ष्यं), मुनीनां सर्वस्वं (जड़निर्विज्ञानां एकमात्रधनं), प्रणतपटलीनां (भक्तसमूहानां) मधुरिमा (सौन्दर्याश्रयः) निखिलपशुपालाम्बुजदृशां (समस्तव्रजवनितानां) प्रेम्णः विनिर्यांसः (सारः) स चैतन्यः पुनः अपि किं मे दृशोः पदं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद-इन्द्रादि देवताओंके आश्रय, वेदोंके श्रेष्ठ भाग उपनिषदोंके प्रमुख लक्ष्य, जड़ासक्तिरहित मुनियोंका एकमात्र धन, भक्तोंके लिये सौन्दर्यके आश्रय और समस्त गोपियोंके प्रेमके सार, वे श्रीचैतन्यचन्द्र क्या पुनः मेरे दृष्टिपथपर प्राप्त होंगे ? ॥५१॥ चौथा अध्याय | १७३

[ ४/५२-५४ स्तवमाला द्वितीय चैतन्याष्टकमें (३)— अपारं कस्यापि प्रणयिजनवृन्दस्य कुतुकी रसस्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तु रुचं स्वामावव्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कौतुकी श्रीकृष्ण अपने प्रेमीजनोंके रसोंको आस्वादन करते हुए अपार (असीम) किसी एक प्रकारके मधुररसविशेषको भोग करनेके उद्देश्यसे अपने वर्णको गोपन करके श्रीराधाकी द्युति स्वीकारकर चैतन्याकृतिमें प्रकट हुए हैं, वे मेरे ऊपर विशेष कृपा करें॥५२॥ अनुभाष्य—कुतुकी (भावास्वादानन्दः) यः कस्य अपि प्रणयिजनवृन्दस्य (निजप्रीतिविग्रहस्य) कमपि [अनिर्वचनीयम्] अपारं मधुरं रसस्तोमं हृत्वा उपभोक्तुं (स्वयं तद्भावग्रहणेन आस्वादयितुं) तदीयां (तत्प्रणयिजनसम्बन्धिनीं) द्युतिं (शोभां) प्रकटयन् (प्रकाशयन्) स्वां (स्वकीयां घनश्यामरूपां द्युतिं ) आवव्रे (आवृतवान्) सः चैतन्याकृतिर्देवः (गोपीजनवल्लभः) नः (अस्मान्) अतितरां कृपयतु। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५२॥ भावग्रहणेर हेतु करिल धर्म स्थापन। तार मुख्य हेतु कहि, शुन सर्वजन॥५३॥ मूल हेतु आगे श्लोकेर कैल आभास। एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ प्रकाश॥५४॥ अनुवाद—भावग्रहण ही वह मुख्य कारण जिसके लिये भगवान्ने अवतार लिया और युगधर्मकी स्थापना की। सभी लोग सुनो! अब उस मुख्य कारणको विस्तारसे कहूँगा। मैंने पूर्व श्लोकमें महाप्रभुके अवतारके मूल कारणका केवल आभास दिया, अब उसी श्लोकका वास्तविक अर्थ प्रकाश कर रहा हूँ॥५३-५४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीचैतन्य महाप्रभु] श्रीराधाका भावग्रहणके आशयसे धर्मस्थापनके कार्यमें प्रवृत्त हुए थे। उस कार्यका जो मुख्य प्रयोजन है, वह अब वर्णन कर रहा हूँ। मूल कारणको बतलानेके लिये श्लोकके आभासका अभी तक वर्णन किया है॥५३-५४॥ अनुभाष्य—इन चार पंक्तियोंके स्थानपर किसी-किसी संस्करणमें ये छह पंक्तियाँ दिखायी देती हैं— “भावग्रहणेर हेतु करिल धर्मस्थापन। मूलहेतु आगे श्लोकेर करिब विवरण॥ भावग्रहणेर एइ शुनह प्रकार। ताहा लागि पञ्चम श्लोकेर करिये विचार॥ एइ त' पञ्चम श्लोकेर कहिल आभास। एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ परकाश॥”५३-५४॥ १७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/५५-५७ ] आदि चौदह श्लोकोंमें पाँचवें श्लोककी व्याख्या :- श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चासे- राधा कृष्णप्रणयविकृतिर्ह्लादिनीशक्तिरस्मा- देकात्मानावपि भुवि पुरा देहभेदं गतौ तौ। चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्द्वयञ्चैक्यमाप्तं राधाभावद्युतिसुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम् ॥५५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रणय-विकृतिरूप ह्लादिनीशक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण स्वरूपतः एकात्मक होनेपर भी विलासतत्त्वकी नित्यताके कारण श्रीराधा-कृष्ण नित्यरूपसे दो स्वरूपोंमें विराजमान हैं। वही दो तत्त्व अब एक स्वरूपमें चैतन्य-तत्त्वरूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये श्रीराधाकी भाव और कान्तिके द्वारा सुवलित उन्हीं श्रीकृष्णस्वरूप गौरसुन्दरको मैं प्रणाम करता हूँ॥५५॥ अनुभाष्य-राधा कृष्णप्रणयविकृतिः (कृष्णस्य प्रणयविकृतिः प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिः); एकात्मानौ (अभित्रात्मानौ) अपि पुरा (अनादिकालत:) तौ (राधाकृष्णौ) भुवि देहभेदं (विषयाश्रयगत-विग्रहद्वयभेदं) गतौ (प्राप्तौ)। अधुना (इदानीं) तद्द्वयं (तयोर्द्वयं) ऐक्यम् आप्तम्; राधाभावद्युतिसुवलितं (भावश्च द्युतिश्च भावद्युती, राधायाः भावद्युती, ताभ्यां सुवलितं युक्तम्, अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं) चैतन्याख्यां प्रकटं (प्रकटितविग्रहं) कृष्णस्वरूपं नौमि (प्रणमामि)। श्लोक-भावानुवाद-राधा कृष्णके प्रणयकी विकार अर्थात् प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण अभिन्न आत्मा होते हुए भी अनादिकालसे विषय और आश्रय-इन दो विग्रहोंके भेदको प्राप्त हुए थे। अब वे दोनों एक रूप हुए हैं। राधाजीके भाव और द्युति, इन दोनोंसे युक्त, अन्दर श्रीकृष्ण और बाहर श्रीगौरसुन्दर, श्रीकृष्णस्वरूप उन श्रीचैतन्य नामसे प्रकटित विग्रहको मैं प्रणाम करता हूँ॥५५॥ पहले श्रीराधा-कृष्णतत्त्व :- राधाकृष्ण एक आत्मा, दुइ देह धरि'। अन्योन्ये विलासे रस आस्वादन करि' ॥ ५६ ॥ अनुवाद-श्रीराधाकृष्ण एक आत्मा होनेपर भी दो शरीर धारण करके परस्पर विभिन्न प्रकारके विलासमैं रसास्वादन करते हैं॥५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'अन्योन्ये' - अर्थात् परस्परमें। इस पद्यका वाक्यार्थ स्पष्ट है, किन्तु भावार्थ गूढ़ हैं। राधाजी शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान् तत्त्व हैं। "शक्तिशक्तिमतोरभेदः"-इस वेदान्त-वाक्यका अर्थ यह है-किसी भी विचारसे शक्तिके आधारसे शक्तिको पृथक् नहीं किया जा सकता है। किन्तु अचिन्त्य-शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण परस्पर विलासके रसास्वादन करनेके लिये नित्य पृथक् होनेपर भी युगपत् (सब समय) एक ही हैं॥५६॥ राधागोविन्दका मिलित तनु गौर हैं :- सेइ दुइ एक एबे चैतन्य गोसाञि। भाव आस्वादिते दोँ हे हैला एक ठाँइ ॥ ५७ ॥ चौथा अध्याय | १७५

[ ४/५७-६० ] अनुवाद-वे दोनों अब मिलकर एक चैतन्य गोसाईं हुए हैं। भावके आस्वादनके लिये दोनों एक शरीर हुए हैं॥५७॥ अमृताणुकणिका-यदि कहें-रसास्वादनके लिये श्रीराधा-कृष्ण एक होनेपर भी इन दो रूपोंमें हुए और कुछ समय रसास्वादनके बाद श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें एक देह हुए हैं, तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इससे श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाका अनादित्व और नित्यत्व नहीं होगा। श्रीकृष्ण और श्रीराधा जैसे अनादिकालसे विद्यमान हैं, उनके मिलित विग्रह श्रीकृष्णचैतन्य भी अनादिकालसे विद्यमान हैं, कलियुगमें वे केवल इस प्रपञ्चमें प्रकटित हुए हैं। श्रीकृष्णचैतन्य श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं। श्रीकृष्णके सभी अविर्भाव अथवा स्वरूप नित्य और अनादिकालसे विद्यमान हैं॥५७॥ गौरतत्त्व-महिमा वर्णनके लिये राधागोविन्दकी प्रणय-व्याख्या :- इथि लागि' आगे करि ताहार विवरण। याहा हैते हय गौरेर महिमा-कथन ॥५८॥ अनुवाद-इसलिये पहले श्रीराधाकृष्णकी एकात्मताका वर्णन कर रहा हूँ, जिससे श्रीगौरचन्द्रकी महिमा प्रकाशित होगी॥५८॥ श्रीराधाका तत्त्व और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध :- राधिका हयेन कृष्णेर प्रणय-विकार। स्वरूपशक्ति-‘ह्लादिनी’ नाम याँहार॥५९॥ अनुवाद-श्रीमती राधिका श्रीकृष्णके प्रणयका विकार हैं। वे श्रीकृष्णकी 'ह्लादिनी' नामक स्वरूपशक्ति हैं॥५९॥ ह्लादिनी-शक्तिका लक्षण :- ह्लादिनी कराय कृष्णे आनन्दास्वादन। ह्लादिनीर द्वारा करे भक्तेर पोषण॥६०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधाजी वास्तवमें श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति ह्लादिनी हैं। वे श्रीकृष्णको परमानन्दमें निमग्न करके रखती हैं, इसलिये उनका नाम ह्लादिनी है। और भी, वे श्रीकृष्णके चित्-विभिन्नांशरूप जीवोंके स्वरूपगत प्रेमपुष्टिकी क्रियाके द्वारा लक्षित होती हैं॥५९-६०॥ अनुभाष्य-श्रीजीवप्रभुने 'प्रीतिसन्दर्भ' (६५ संख्या) में लिखा है- “अथ श्रुतौ च-‘भक्तिरेवैनं नयति, भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषः, भक्तिरेव भूयसी' इति श्रूयते। तस्मादेवं विविच्यते-या चैवं भगवन्तं स्वानन्देन मदयति, सा किंलक्षणा स्यात्? इति। न तावत् सांख्यानामिव प्राकृतसत्त्वमय-मायिकानन्दरूपा, भगवतो मायानभिभाव्यत्वश्रुतेः, स्वतस्तृप्तत्वाच्च। न च निर्विशेषवादिनामिव भगवत्स्वरूपानन्दरूपा, अतिशयानुपपत्तेः। अतो नतरां जीवस्य स्वरूपानन्दरूपा, -अत्यन्तक्षुद्रत्वात् तस्य। ततो 'ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वय्येका सर्वसंश्रये। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥' इति श्रीविष्णुपुराणानुसारेण (१/१२/६९) ह्लादिन्याख्य-त्वदीयस्वरूपशक्त्यानन्द-रूपैवेत्यवशिष्यते, यया खलु भगवान् स्वरूपानन्दविशेषी भवति, ययैव तं तमानन्दमन्यानप्यनुभावयतीति। अथ तस्या अपि भगवति सदैव वर्त्तमानतयातिशयानुपपत्तेस्त्वेवं विवेचनीयं- श्रुताथान्यथानुपपत्त्यार्थापत्तिप्रमाणसिद्धत्वात्। तस्या ह्लादिन्या एव कापि सर्वानन्दातिशायिनी वृत्तिर्नित्यं १७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/६०-६१ ] भक्तवृन्देष्वेव निक्षिप्यमाणा भगवत्प्रीत्याख्यया वर्त्तते। अतस्तदनुभवेन श्रीभगवानपि श्रीमद्भक्तेषु प्रीत्यातिशयं भजत इति।” वेदोंमें भी यह वर्णित है कि भक्ति ही भक्तोंको भगवान्‌के निकट ले जाती है, भक्ति ही भक्तको भगवान्‌का दर्शन कराती है, भक्तिके द्वारा ही भगवान् वशीभूत होते हैं और वेदोंमें अधिकांश भक्तिका ही वर्णन है। इसलिये यह विचार करें कि जो वस्तुशक्ति भगवान्‌को अपने आनन्दके द्वारा उन्मत्त कराती है, उसके क्या लक्षण हैं? उसके उत्तरमें कह रहे हैं—सांख्यमतवादियोंके सिद्धान्तानुसार उस वस्तुशक्तिको कभी भी प्राकृत-सत्त्वगुणमयी मायिकी-आनन्दरूपा नहीं कह सकते। क्योंकि श्रुतियोंमें कहा गया है कि 'माया भगवान्‌का अतिक्रम नहीं कर सकती है' और 'भगवान् स्वयं तृप्त हैं', इसलिये स्वतः-तृप्त भगवान् मायाके गुणमें कभी भी आसक्त नहीं होते। उस वस्तुशक्तिको निर्विशेषवादियोंकी भाँति भगवत्स्वरूपानन्द भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह सिद्धान्त पूर्व और बादमें विचार करनेसे विशेषरूपसे असिद्ध है, क्योंकि भगवान् अपने स्वरूपानन्दकी अपेक्षा भक्त्यानन्दकी ही अधिक आकाङ्क्षा किया करते हैं। इसलिये वह जीवके स्वरूपानन्दरूपा भी नहीं है, क्योंकि जीव नित्य होनेपर भी अत्यन्त क्षुद्र है। वह भगवान्‌को वशीभूत नहीं कर सकता। इसलिये “हे भगवन्, सबके आश्रयस्वरूप आपमें केवल 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्' नामक तीन शक्तियाँ अवस्थित हैं। गुणातीत आपमें आह्लाद (सात्त्विक) और क्लेश (तामसिक) तथा मिश्रा (राजसिक) भाव नहीं है”—इस विष्णुपुराण-वाक्यसे उनकी ह्लादिनी-नामक स्वरूपशक्ति ही आनन्दस्वरूपा है, क्योंकि इसी शक्तिके द्वारा ही भगवत्-स्वरूपमें आनन्द विशेष लक्षित होता है और भगवान् इस शक्तिके द्वारा ही वैसा आनन्द अन्य भक्तोंको प्रदान करते हैं—यही चरम सिद्धान्त है। भगवान्‌में ह्लादिनीशक्ति नित्य विद्यमान रहनेके कारण निर्विशेषवादियोंका उक्त सिद्धान्त विशेषरूपसे परित्यज्य है। क्योंकि श्रुतिके अर्थसमूहकी अन्यरूप असङ्गति होनेपर फलान्तरकी आशङ्का होती है अर्थात् विष्णुपुराणका उक्त प्रमाण वेदके अर्थके साथ एक रूपमें सिद्ध है, इसलिये निर्विशेषवादियोंकी इस प्रकारकी उक्ति वेदोंके अर्थसे विपर्ययजनक (विपरीत) और वेदार्थ-तात्पर्यके विषयीभूत नहीं है। उस ह्लादिनी शक्तिकी ही सर्वानन्दातिशायिनी किसी एक वृत्तिको भक्तोंमें नित्य प्रदान करनेपर वह 'भगवत्-प्रीति' कहलाती है। श्रीभगवान् भी उस प्रीतिको भक्तमें अनुभव करके भक्तके प्रति अतिशय प्रीति प्रदर्शित करते हैं। विष्णुपुराणमें श्रीभगवान्में तीन प्रकारकी शक्तियोंका वर्णन है, जो शक्ति भगवान्‌के आनन्दका विधान करती है, वह सांख्यके जड़ानन्द अथवा निर्विशेषवादियोंके शक्ति-शक्तिमान्‌के पार्थक्यकी अनभिज्ञताके कारण केवल चिदेकानन्द नहीं है। ह्लादिनी शक्ति ही भगवान्‌को आनन्द प्रदान करती है और भगवान् ह्लादिनी शक्तिके द्वारा जीवको उनका अपने प्रति प्रेमधर्म प्रदान करते हैं तथा भक्तकी भगवत्-प्रीतिसे बाध्य होकर प्रीति पुष्ट करते हैं॥६०॥ एक ही शक्तिमान्की एक ही शक्तिके तीन रूप :- सच्चिदानन्द, पूर्ण, कृष्णेर स्वरूप। एकइ चिच्छक्ति ताँर, धरे तिन रूप॥६१॥ चौथा अध्याय | १७७

[ ४/६१-६२ अनुवाद—सच्चिदानन्द और स्वयंमें पूर्ण, यह श्रीकृष्णका स्वरूप है। उनकी चित्-शक्ति एक ही होकर तीन रूप धारण करती है॥६१॥ आनन्दांशे ह्लादिनी, सदंशे सन्धिनी। चिदंशे सम्वित्—यारे ज्ञान करि' मानि॥६२॥ अनुवाद—वह चित्-शक्ति आनन्द-अंशसे ह्लादिनी, सत्-अंशसे सन्धिनी और चित्-अंशसे सम्वित् जिसको ज्ञान भी कहा जाता है, इन तीन रूपोंको धारण करती है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्णतत्त्व श्रीकृष्ण सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। उनकी एक ही चित्-शक्ति पहले सत्-अंशसे सन्धिनी अर्थात् सत्ताका विस्तार करनेवाली है, चित्-अंशसे पूर्ण ज्ञानरूप सम्वित्तत्त्व अर्थात् श्रीकृष्णका स्वरूपतत्त्व है और आनन्द-अंशसे ह्लादिनी अर्थात् उसी स्वरूपतत्त्वको आह्लाद-प्रदान करनेवाली है॥६१-६२॥ अनुभाष्य—श्रीजीवप्रभु श्रीभगवत्-सन्दर्भमें (संख्या १०२) में कह रहे हैं— “सद्रूपत्वेन व्यपदिश्यमानो यया सत्तां दधति धारयति च सा सर्वदेश-काल-द्रव्यादि-प्राप्तिकरी सन्धिनी; तथा सम्विद्रूपोऽपि यया सम्वेत्ति सम्वेदयति च, सा सम्वित्; तथा ह्लादरूपोऽपि यया सम्विदुत्कर्षरूपया तं ह्लादं सम्वेत्ति सम्वेदयति च, सा ह्लादिनीति विवेचनीयम्। तदेवं तस्या मूलशक्तेस्त्रयात्मकत्वे सिद्धे येन स्वप्रकाशतालक्षणेन तद्वृत्तिविशेषेण स्वरूपं स्वयं स्वरूपशक्तिर्वा विशिष्टं वाविर्भवति तद्विशुद्धसत्त्वम्। तच्चान्य-निरपेक्षस्तत्प्रकाश इति ज्ञापनज्ञानवृत्तिकत्वात् सम्विदेव। अस्य मायया स्पर्शाभावात् विशुद्धत्वम्। यतश्च सत्त्वात् लोको वैकुण्ठाख्यः प्रकाशते। सत्त्व-शब्देन स्वप्रकाशता-लक्षण-स्वरूप-शक्तिवृत्तिविशेष उच्यते। प्रकृतिगुणः सत्त्व-मित्यशुद्धसत्त्व-लक्षणप्रसिद्धयनुसारेण तथाभूतश्विच्छक्तिविशेषः सत्त्वमिति सङ्गतिलाभात्। ततश्च तस्य स्वरूपशक्तिवृत्तित्वेन स्वरूपात्मतैवेत्युक्तम्। प्राकृताः सत्त्वादयो गुणा जीवस्यैव न त्वीशस्येति श्रूयते। यथैकादशे—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे’ इति। श्रीविष्णुपुराणे च—‘सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र न प्राकृता गुणाः। स शुद्धः सर्वशुद्धेभ्यः पुमानाद्यः प्रसीदतु॥’ अत्र प्राकृता इति विशिष्याप्राकृतास्त्वन्ये गुणास्तस्मिन् सन्त्येवेति व्यञ्जितम्। तथा च दशमे देवेन्द्रणोक्तम्—‘विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम्। मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहे न विद्यते ते ग्रहणानुबन्धः॥’ प्रकृतिगुणः सत्त्वं, गोचरस्य बहुरूपत्वे रजः, बहुरूपस्य तिरोहितत्वे तमः। तथा परस्परस्योदासीनत्वे सत्त्वम्; उपकारित्वे रजः; अपकारित्वे तमः। अत्र चेदमेव विशुद्धसत्त्वं सन्धिन्यंशप्रधानं चेदाधारशक्तिः; सम्विदंशप्रधानमात्मविद्या, ह्लादिनीसारांशप्रधानं गुह्यविद्या। युगपत् शक्तित्रयप्रधानं मूर्तिः। अत्राधारशक्त्या भगवद्धाम प्रकाशते।” (अर्थात्) “सत्-रूपसे प्रसिद्ध भगवान् जिस शक्तिके द्वारा सत्ताको धारण करते हैं और कराते हैं, वह समस्त देश-काल-द्रव्यादिको प्रकाशित करनेवाली ‘सन्धिनी’ शक्ति है; (उसी प्रकार सम्वित्-रूप होकर भी भगवान्) जिस शक्तिके द्वारा वे स्वयं जानते और दूसरोंको जनानेमें समर्थ होते हैं, वह ‘सम्वित्’ शक्ति है; (तथा आनन्दरूप होकर भी भगवान्) चित्-प्रधान जिस शक्तिके द्वारा वे स्वयं आनन्दको जानते हैं और दूसरोंको जनानेमें समर्थ होते हैं, उसको ‘ह्लादिनी’ शक्ति कहते हैं, ऐसा समझना होगा। इसलिये उस मूल पराशक्तिके तीन रूप सिद्ध हुए हैं; उसकी स्वतःप्रकाश लक्षणवाली जिस विशेष वृत्तिके द्वारा भगवान् स्वयं और उनकी स्वरूपशक्ति अथवा चित्-वैशिष्ट्यादिका आविर्भाव होता है, वही ‘विशुद्धसत्त्व’ है। वह किसी भी अन्यकी अपेक्षासे रहित और १७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/६२ ] भगवत्-प्रकाशस्वरूप है। स्वयं अनुभव करने और अन्योंको अनुभव करानेकी दो वृत्तियाँ विद्यमान रहनेके कारण वह सम्वित् भी है। मायाका स्पर्श नहीं रहनेके कारण वह विशुद्ध है। इस विशुद्धसत्त्वसे 'वैकुण्ठ' नामक धाम प्रकाशित होता है। स्वतःप्रकाशलक्षणमय भगवत्-स्वरूपशक्तिकी वृत्तिविशेषको 'विशुद्धसत्त्व' कहा जाता है। प्राकृत-सत्त्वका (रजः और तमः से मिश्रित होनेके कारण) अशुद्धता लक्षण प्रसिद्ध है, इसलिये शुद्धसत्त्व या सन्धिनी चित्शक्तिविशेष है। इस शुद्धसत्त्वको स्वरूपशक्तिकी वृत्ति कहनेसे यह भी स्वरूपशक्त्यात्मक है। श्रुति और स्मृतिमें कहा गया है कि प्राकृत सत्त्वादि गुणसमूह जीवोंके ही हैं, ईश्वरके नहीं हैं। जैसे एकादश स्कन्धमें भगवान्‌की उक्ति-“सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणोंका मुझसे विमुख जीवोंके साथ सम्बन्ध है, कभी भी मेरे साथ इनका कोई सम्बन्ध नहीं है।” विष्णुपुराणमें भी कहा गया है-“जिनमें अप्राकृत गुणसमूह विराजमान है, उन ईश्वरमें सत्त्वादि 'प्राकृत' गुण नहीं रहते हैं और रह भी नहीं सकते हैं; समस्त शुद्धवस्तुओंमें अमिश्रित शुद्धवस्तु आदिपुरुष भगवान् नारायण प्रसन्न हों।” यहाँपर 'प्राकृत' विशेषणके प्रयोगके द्वारा विशेषरूपसे यह दिखलाया जा रहा है कि भगवान्‌में प्राकृतसे भिन्न अप्राकृत गुणसमूह विद्यमान हैं। दशमस्कन्धमें देवराज इन्द्रकी उक्ति—“हे भगवन् ! आपका धाम विशुद्ध सत्त्वमय है, वह शान्त, तपस्यारूप सेवामय और रजो-तमो गुणोंसे रहित है; आप इन मायामय गुणप्रवाह और प्राकृत गुणोंको स्पर्श अथवा ग्रहण नहीं करते हैं।” अव्यक्तावस्थामें सत्त्वगुण; बाह्य अभिव्यक्ति और उत्पत्तिशील अनेक रूपोंके प्रकाशमें रजोगुण तथा अनेक रूपोंके प्रकाशके अभावमें तमोगुण वर्तमान है; अर्थात् तीनों गुण जिस स्थानपर परस्पर शिथिल या उदासीन हैं, वहाँपर सत्त्वगुण है; जिस स्थानपर कार्यकारिता या क्रियाशीलता है, उस स्थलपर रजोगुण है और जिस स्थानपर ध्वंस अथवा विनाशका भाव है, वहाँपर तमोगुण वर्तमान है। इस स्थानपर विशुद्धसत्त्व ही सन्धिनी-अंश प्रधान होनेपर आधारशक्ति, सम्वित्-अंश प्रधान होनेपर आत्मविद्या और ह्लादिनीशक्तिका सारांश प्रधान होनेपर गुह्यविद्या (प्रेमभक्ति) है। तीनों शक्तियाँ एक साथ प्रधान होनेपर उसे मूर्ति या विग्रह कहा जाता है। इस आधारशक्तिके द्वारा ही भगवद्धाम प्रकाशित होता है।” परतत्त्व-अर्थात् भगवान् वास्तव-वस्तुस्वरूप हैं और वे तीन शक्तियोंसे नित्य प्रकटित है। वे परतत्त्व इन चार रूपोंमें नित्य अवस्थान करते हैं- १) परा अचिन्त्य (अन्तरङ्गा) शक्तिसे वैकुण्ठादि स्वरूपवैभव रूपमें; २) तटस्था नामक शक्तिसे चिदेकात्म शुद्धजीव रूपमें; ३) बहिरङ्गा शक्तिसे जड़ात्म प्रधान रूपमें और ४) अपने पूर्णस्वरूपमें। स्वरूपशक्ति और तद्रूपवैभवशक्ति अन्तरङ्गा-शक्तिके स्वयंरूप और वैभव-प्रकाशके भेदसे दो प्रकारसे अवस्थित है। अङ्गीके आन्तरिक अङ्गमें जो शक्ति विराजमान है, उसे 'अन्तरङ्गा' कहते हैं। अन्तरङ्गा-शक्तिकी शक्तिमत्तासे स्वयंरूप भगवान् अपने वैकुण्ठादि स्वरूपवैभवको प्रकाश करते हैं। भगवान्‌के बाह्य अङ्ग- 'प्रधान' और जड़ीय पदार्थ हैं। यह बहिरङ्गा शक्ति प्राकृत चौथा अध्याय | १७९

[ ४/६२-६३ जगत्में ब्रह्मासे लेकर स्थावर-पत्थरादि बड़े-छोटे शरीरोंके द्वारा तटस्थाशक्तिसे प्रकटित जीवोंको आवृत करके अवस्थान करती है। स्वरूपशक्ति तीन विभागोंमें परिलक्षित होती है। उन तीनोंको अंशिनी स्वरूपशक्तिका अंश कहा जाता है। शक्तिकी नित्यता अथवा सत्-अंश अर्थात् जो कालके द्वारा क्षोभित नहीं होता, उसे सन्धिनी कहते हैं। ज्ञातृत्व अथवा चित्-अंश नित्य आनन्दसे विशेषरूपसे युक्त होकर अद्वयज्ञान 'सम्वित्' नामसे कहलाता है अर्थात् जिसके द्वारा श्रीकृष्णका स्वतःकर्त्तृत्व पूर्ण चिद्धर्मसे परिचित है, वही 'सम्वित्-शक्ति' के नामसे प्रसिद्ध है। अंशिनीके जिस अंशकी सत्-चित्से विशेषता है, वही आनन्दमयी शक्ति है। विशेषताके वर्णनसे शक्तिका तीन प्रकारसे परिचय होनेपर भी ये तीनों अंश स्वरूपशक्तिमें ही अवस्थित हैं। और भी, तटस्था एवं बहिरङ्गाशक्तिमें इन तीन शक्तियोंका विभिन्न अधिष्ठान परिलक्षित होता है। बहिरङ्गा शक्तिमें ये त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम) रूपमें और तटस्थाशक्तिके बद्धजीव-अंशमें इन तीन गुणोंकी क्रिया रूपमें एवं मुक्तजीव-अंशमें सच्चिदानन्दकी आश्रयजातीयकी सेवावृत्तिसे सेव्यके उपयोगी शक्त्यांश रूपमें विराजमान हैं॥६२॥ श्रीविष्णुपुराणमें (१/१२/६९) ध्रुवकी उक्ति- ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥६३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्! आप सभीके आश्रय और निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्', तीनों चिन्मय हैं। मायाके वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति 'ह्लादकारी', 'तापकरी' और 'मिश्रा'-इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती है॥६३॥ अनुभाष्य-[हे भगवन्!] एका (मुख्या अव्यभिचारिणी स्वरूपभूता शक्तिः) ह्लादिनी (आह्लादकारी) सन्धिनी (सन्तता) सम्वित् (विद्याशक्तिः) सर्वसंस्थितौ (सर्वेषां सम्यक् स्थितिय॑स्मात् तस्मिन् सर्वाधिष्ठानभूते) त्वयि एव [न तु जीवेषु। तत्र च या गुणमयी त्रिविधा सा त्वयि नास्ति]; ह्लादतापकरी मिश्रा (ह्लादकरी मनःप्रसादोत्था सात्त्विकी, विषयवियोगादिषु तापकरी तामसी, तदुभयमिश्रा विषयजन्या राजसी) गुणवर्जिते (प्राकृत-सत्त्वादिगुणैः वर्जिते) त्वयि (भगवति) न [परन्तु जीवेषु एव। अत्र क्रमादुत्कर्षेण सन्धिनीसम्वित्ह्लादिन्यो ज्ञेयाः]। श्लोक-भावानुवाद-हे भगवन्! एक ही मुख्य अमिश्रित स्वरूपभूता शक्तिके अन्तर्गत ह्लादिनी-सन्धिनी-सम्वित्के अधिष्ठानरूप आप ही हैं, वह जीवोंमें नहीं है। जीवोंमें जो तीन गुणोंवाली अर्थात् मनकी प्रसन्नतासे उत्पन्न सुखप्रद सात्त्विकी, विषयोंके वियोगसे कष्ट प्रदान करनेवाली तामसी और इन दोनोंकी मिश्रित राजसिक माया है, वह प्राकृत सत्त्वादि गुणोंसे रहित आप भगवान्में नहीं है। यहाँ सन्धिनी, सम्वित् और ह्लादिनीको क्रमसे श्रेष्ठतर जानना चाहिये। इस श्लोककी और भागवत (१/७/६) श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीने श्रीविष्णुस्वामिके 'सर्वज्ञसूक्त'से यह श्लोक उद्धृत किया है-'ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः। १८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/६३-६६ ] स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः॥' अर्थात् सच्चिदानन्द ईश्वर ह्लादिनी और सम्वित्-इन स्वरूपशक्तिके द्वारा आश्लिष्ट हैं, परन्तु जीव अविद्यासे ढका है, इसलिये क्लेशोंकी निधिका मूल है॥६३॥ सन्धिनीकी भगवान् और उनके सेवोपकरण-प्राकट्य विधानरूप सेवा :- सन्धिनी सार अंश—'शुद्धसत्त्व' नाम। भगवानेर सत्ता हय याहाते विश्राम॥६४॥ अनुवाद—सन्धिनीके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है, जिसमें भगवान्‌की सत्ता विश्राम ग्रहण करती है॥६४॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके माता-पिता, धाम-गृहादि सभी शुद्धसत्त्वकी परिणति हैं। परिणत शुद्धसत्त्वमें भगवान्‌का स्वरूप शुद्धसत्त्वात्मकरूपसे परिदृष्ट होता है। श्रीकृष्णका मूल स्थल जो शुद्धसत्त्व है, उसमें श्रीकृष्णकी उत्पत्तिका स्वरूप दिखलायी देनेपर भी श्रीकृष्ण वसुदेवात्मक शुद्धसत्त्वमात्र नहीं हैं, वे अद्वयज्ञान सम्वित्-सार भगवत्-ज्ञानके नित्य अधिष्ठाता देवता हैं। आश्रयजातीय कृष्णसम्बन्धी सभी वस्तुएँ शुद्धसत्त्वात्मक हैं और सेवोन्मुखचित्तसे उनसे श्रीकृष्णका सम्बन्ध देखा जा सकता है; वास्तवमें भगवान् चित्स्वरूप ही हैं॥६४॥ माता, पिता, स्थान, गृह, शय्यासन आर। एसब कृष्णेर शुद्धसत्त्वेर विकार॥६५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके माता-पिता, स्थान (धाम), गृह और शय्या-आसन-ये सब श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार हैं॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सत्ताविस्तारिणी सन्धिनीशक्तिके सारांशका नाम 'शुद्धसत्त्व' है। सत्त्व दो प्रकारके हैं—मिश्रसत्त्व और शुद्धसत्त्व। वस्तुसत्ताका ही नाम 'सत्त्व' है। सन्धिनीकी क्रियाके बिना कोई भी सत्त्व हो नहीं सकता अर्थात् किसीकी सत्ता नहीं हो सकती। भगवान्‌की सत्ताका प्रकाश भी सन्धिनीका कार्य है। शुद्धचित्-तत्त्वमें सन्धिनीकी जो क्रिया है, उसका ही नाम 'शुद्धसत्त्व' है। भगवान्‌के माता, पिता, स्थान, गृह, शय्या और आसनादि श्रीकृष्णके शुद्धसत्त्वका विकार अर्थात् विशेषरूप कार्य हैं। यहाँपर इस तत्त्वको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये यह भी जानना उचित कि स्वरूप अर्थात् चित्शक्तिके अन्तर्गत सन्धिनी ही चित्-जगत्‌की पूर्ण सत्ता है अर्थात् उसीने भगवान्‌के चिन्मयस्वरूप, भगवान्‌के दास, दासी, सङ्गिनी, पिता, मातादि सभी चिन्मयस्वरूपकी सत्ताको प्रकाश किया है; मायाशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जड़जगत्‌की सभी भौतिक सत्ताका विस्तार किया है और जीवशक्तिके अन्तर्गत सन्धिनीने जीवकी चित्कणरूप सत्ताका विस्तार किया है॥६४-६५॥ श्रीमद्भागवत (४/३/२३)— सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव-शब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः। सत्त्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते॥६६॥ चौथा अध्याय | १८१

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमहादेवने कहा-"भगवान्‌की स्वरूपशक्तिगत सन्धिनीके प्रभावसे ही शुद्धसत्त्वरूप जो नित्यतत्त्व है, उसीका नाम 'वसुदेव' है। उसी शुद्धसत्त्वसे चैतन्यस्वरूप भगवान्‌ने नित्यप्रकाश प्राप्त किया है, इसलिये उनका नाम 'वासुदेव' हैं। वे जड़़ीय और मायिक सभी इन्द्रियोंसे अतीत हैं। भक्तिसे पवित्र हुए हृदयसे मैं उनको प्रणाम करता हूँ।" इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णका स्वरूपादि उनकी स्वरूपशक्ति-गत सन्धिनीका नित्यकार्य है॥६६॥ अनुभाष्य-सती जब अपने पिता दक्षके घर यज्ञके दर्शनके लिये जा रही थीं, तब दक्षको विष्णुविमुख जानकर महादेवकी उक्ति,- विशुद्धं (स्वरूपशक्तिवृत्तित्वात् जाड्यांशेन रहितं) सत्त्वं (चिच्छक्तिवृत्तिमयम् अप्राकृतं) वसुदेव-शब्दितं (वसंत्यस्मिन्निति वसुः तथा दीव्यति द्योतते इति देवः, स चासौ स चेति) यत् (यस्मात्) तत्र (सत्त्वे) पुमान् (पुरुषः) अपावृतः (आवरणशून्यः सन्) ईयते (प्रकाशते)। तस्मिन् सत्त्वे अधोक्षजः (अधःकृतम् अतिक्रान्तम् अक्षजम् इन्द्रियजज्ञानं येन सः) भगवान् वासुदेवः (वसुदेवे भवति प्रतीयते इति वासुदेवः परमेश्वरः प्रसिद्धः, वासयति देवमिति व्युत्पत्त्या) मे (मया) मनसा विधीयते (विशेषेण चिन्यते)। श्लोक-भावानुवाद-विशुद्ध सत्त्व अर्थात् जड़ांशसे सर्वथा रहित स्वरूपशक्तिकी वृत्ति जिसे वसुदेव (जो वास करते हैं, वे वसु हैं; जो प्रकाश करते हैं, वे देव हैं; अथवा जो वसु हैं, वही देव हैं) कहते हैं, उससे भगवान् आवरणशून्य होकर प्रकाशित होते हैं। उन अधोक्षज (जिनके द्वारा इन्द्रियज्ञान अधःकृत अर्थात् नीचे पड़ जाता है अर्थात् जो इन्द्रियज्ञानसे अतीत हैं) भगवान् वासुदेव (जो वसुदेवमें प्रतीत होनेके कारण 'वासुदेव' नामसे प्रसिद्ध हैं; व्युत्पत्तिगत अर्थ है जो देवको वास कराते हैं) का मैं विशेषरूपसे चिन्तन करता हूँ। श्रीजीवप्रभु (भगवत् सन्दर्भ १०२ संख्यामें)-"अथ मूर्त्या परतत्त्वात्मकः श्रीविग्रह प्रकाशते; इयमेव वासुदेवाख्या।" अर्थात् विशुद्धसत्त्वसे परतत्त्वात्मक श्रीविग्रह प्रकाशित होते हैं, उन्हींका नाम वासुदेव है। परवर्त्ती अन्तिम अंशमें और श्रीमद्भागवतमें इस श्लोकका गौड़ीय भाष्य द्रष्टव्य है॥६६॥ सम्बित्-शक्तिके द्वारा श्रीकृष्णमें अद्वयतत्त्व भगवत्ता-ज्ञान :- कृष्णे भगवत्ता-ज्ञान-सम्बितेर सार। ब्रह्म-ज्ञानादिक सब तार परिवार ॥ ६७॥ अनुवाद-श्रीकृष्णमें भगवत्ताका ज्ञान अर्थात् वे ही स्वयं-भगवान् हैं, ऐसा ज्ञान ही सम्बित्‌का सार है, ब्रह्मज्ञानादि अर्थात् ब्रह्म और जड़ विषयोंका ज्ञान सब उसके परिवार हैं॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सम्बित्-क्रियाका नाम 'ज्ञान' है। दो द्रष्टा हैं-श्रीकृष्ण और जीव। श्रीकृष्णका दर्शन पूर्णज्ञानमूलक होनेके कारण उनके सम्वेदन और कार्यमें अन्तर नहीं है, इसलिये उनके ज्ञानको 'ईक्षण-मात्र' कहा जाता है। परन्तु जीवके दर्शनमें उससे बहुत अन्तर है, इसलिये उसके दर्शनको 'सम्वेदनस्वरूपज्ञान' कहा जाता है। वह ज्ञान तीन प्रकारका है-साक्षात्-ज्ञान, व्यतिरेक ज्ञान और विकृतज्ञान। जड़विषयोंमें जीवकी जड़ेन्द्रियोंके द्वारा जो ज्ञान होता है, वह कभी भी निर्मल नहीं है, इसलिये वह विकृत है; वह माया-शक्तिगत १८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत