श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/७१-७६ ] नित्यानन्द गोसाञि साक्षात् हलधर। अद्वैत आचार्य गोसाञि साक्षात् ईश्वर ॥७३ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचैतन्य महाप्रभुके दो अङ्ग हैं, अङ्गके अवयव अर्थात् अंशको ही उपाङ्ग कहा जाता है। पाषण्डी लोगोंके दलनके लिये प्रभुके साथ सदा ये सभी अङ्ग-उपाङ्गरूपी तीक्ष्ण अस्त्र रहते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु साक्षात् हलधर अर्थात् श्रीबलदेव प्रभु हैं और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु साक्षात् ईश्वर हैं॥७१-७३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साक्षात् ईश्वर' अर्थात् वे साक्षात् महाविष्णुका अवतार हैं॥७३ ॥ अनुभाष्य—'पाषण्ड'—जो लोग मायाधीश विष्णुत्तत्त्वके साथ मायावश्य शिवादि-तत्त्वको समान मानते हैं, भगवत्-लीलाके नित्यत्वको नहीं समझकर नित्य भक्तितत्त्वको कालके द्वारा खण्डित तथा अनित्य कर्ममात्र मानते हैं, वे पाषण्डी हैं। इस प्रकारके पाषण्डियोंकी दुर्बुद्धिको दूर करनेका विष्णु और उनके सेवकोंका (वैष्णवोंका) प्रयास है॥७२॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं श्रीकृष्ण हैं, श्रीबलदेव श्रीकृष्णके विलासरूप अंश हैं और महाविष्णु उनके स्वांश हैं। इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु भी श्रीचैतन्य महाप्रभुके अङ्ग हैं। और श्रीअद्वैत तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुके जो अङ्ग (अथवा अंश—उनके अनुगत भक्तमण्डली), उसका नाम ही श्रीकृष्णचैतन्यके उपाङ्ग है; श्रीवासादि भक्तवृन्द ही उपाङ्ग हैं। श्रीअद्वैत-नित्यानन्द-श्रीवासादिरूप अङ्ग-उपाङ्ग ही पाषण्ड दलन कार्यके लिये अस्त्रतुल्य कहे गये हैं। श्रीभगवान्के तीक्ष्ण अस्त्रोंके सामनेसे जैसे असुर बचकर नहीं भाग सकते, अपितु मारे जाते हैं, उसी प्रकार श्रीअद्वैत-नित्यानन्दादिके प्रभावसे कोई भी पाषण्डी भाग नहीं सकते, उनके अलौकिक प्रभावसे सभी पाषण्डी पाषण्डत्व त्यागकर परम-भागवत हो जाते हैं॥७१-७३॥ भक्तगण ही सैनिक और श्रीकृष्णकीर्त्तन ही अस्त्र :— श्रीवासादि परिषद सैन्य सङ्गे लञा। दुइ सेनापति बुलेन कीर्त्तन करिया ॥७४ ॥ पाषण्डदलनवाना नित्यानन्द राय। आचार्य-हुङ्कारे पाप-पाषण्डी पलाय ॥७५ ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु—ये दो सेनापति अपनी सेनाओंके साथ अर्थात् श्रीवासादि पार्षदोंको लेकर कीर्त्तन करते हुए सर्वत्र भ्रमण करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अङ्ग-भङ्गिमा आदि चिह्न देखनेसे ही विश्वास होता है कि वे पाषण्डियोंका अर्थात् उनकी पाषण्ड-वृत्तिका दलन करनेमें सक्षम हैं। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी हुङ्कारसे ही पापी-पाषण्डी भाग जाते हैं अर्थात् उनके पाप-पाषण्ड दूर होकर वे परम-भागवत बन जाते हैं॥७४-७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वाना' का अर्थ चिह्न होता है। यह तुरीभेरीकी भाँति एक प्रकारका यन्त्र होता है, जिसके द्वारा पाषण्डदलन-चिह्न प्रकाशित होता है॥७५॥ श्रीकृष्णकीर्त्तनके पिता श्रीगौरसुन्दर :— सङ्कीर्त्तन-प्रवर्त्तक श्रीकृष्णचैतन्य। सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे भजे, सेइ धन्य ॥७६ ॥ तीसरा अध्याय | १३१