भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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जैसे, - अङ्ग शब्दका अर्थ है अंश। 'परमाण' अर्थात् प्रमाण। अङ्गका अवयव (अंश) उपाङ्ग है॥ ६७॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/१४)- नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥ ६८॥ अनुवाद-आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥ ६८॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥ ६८॥ जलशायी अन्तर्यामी येइ नारायण। सेहो तोमार अंश, तुमि मूल नारायण॥ ६९॥ 'अङ्ग'-शब्दे अंश कहे, सेहो सत्य हय। मायाकार्य नहे-सब चिदानन्दमय॥ ७०॥ अनुवाद-कारण, गर्भ और क्षीर समुद्रके जलमें शयन करनेवाले सभीके अन्तर्यामी नारायण आपके अंश हैं एवं आप मूल नारायण हैं। 'अङ्ग' शब्दका अर्थ अंश है, यह सत्य है, किन्तु यह मायाके द्वारा रचित कार्य नहीं है; आपके सभी अंश चिदानन्दमय है॥ ६९-७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अङ्ग शब्दसे अंशरूप कारणाब्धिशायी आदि तीन पुरुषावतारोंको समझना चाहिये। वे सब चिदानन्दमय हैं, वे ईश्वर हैं अर्थात् मायानिर्मित तत्त्व नहीं है। इसलिये श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दोनों महाप्रभुके दो अङ्ग हैं। अनुभाष्य-जिस प्रकार माया-जगत्में मायाके द्वारा वस्तु खण्डित होकर अंश होती है, उस प्रकार मायासे अतीत विष्णुत्तत्त्वके अंश होनेपर भी विष्णुत्व अथवा वस्तुत्वमें खण्ड नहीं होते। दीपके उदाहरणमें यह देखा जाता है कि मूल दीपसे अन्य दीप उदित होनेपर भी जैसे उनमें वस्तुतः उनमें पार्थक्य नहीं रहता, उसी प्रकार स्वयंरूप श्रीकृष्णके स्वयंप्रकाश या विलास श्रीबलदेव प्रभुसे समस्त विष्णुत्तत्त्वका आविर्भाव होता है-परस्परका लीलाभेद रहनेपर भी ये वस्तुतः अभेद हैं। वे चिदानन्दमय विष्णुत्तत्त्व सभी मायाधीश हैं-माया उनके ऊपर कोई कार्य नहीं कर सकती। विष्णुत्तत्त्वसे भिन्न जो वस्तुएँ हैं, उनपर मायाकी क्रिया होती है। मायाके द्वारा वशमें किये जा सकनेके कारण भगवान्के विभिन्नांश ब्रह्मा और शिव विकारको प्राप्त होते हैं। दूधकी परिणति जिस प्रकार दही है, शम्भु-तत्त्व आदि भी उसी प्रकार हैं। (अधिक जाननेके लिये ब्रह्मसंहितामें श्रीजीव गोस्वामीकी टीका द्रष्टव्य है)॥७०॥ दो विष्णु ही दो सेनापति :- अद्वैत, नित्यानन्द-चैतन्येर दुइ अङ्ग। अङ्गेर अवयवगण कहिये उपाङ्ग॥ ७१॥ अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण अस्त्र प्रभुर सहिते। सेइ सब अस्त्र हय पाषण्ड दलिते॥ ७२॥