भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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३/६३-६७ ]

अन्यान्य अवतारोंके अस्त्र और सैन्यसामन्त, किन्तु गौरावतारके भक्त और सङ्कीर्तन :- अन्य अवतारे सब सैन्य-शस्त्र सङ्गे। चैतन्य-कृष्णेर सैन्य अङ्ग-उपाङ्गे॥६४॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके श्रीअङ्ग और श्रीमुखका जो भी दर्शन करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह प्रेमधनको प्राप्त करता है। अन्य अवतारोंमें वे सेना और अस्त्र-शस्त्र लेकर अवतरित होते हैं, किन्तु इस श्रीकृष्णचैतन्य अवतारमें उनके अङ्ग और उपाङ्ग ही उनकी सेना है॥६३-६४॥

स्तवमालाका प्रथम-चैतन्याष्टकमें (१)— सदोपास्यः श्रीमान् धृतमनुजकायैः प्रणयितां वहद्भिर्गीर्वाणैर्गिरिश-परमेष्ठि-प्रभृतिभिः। स्वभक्तेभ्यः शुद्धां निजभजनमुद्रामुपदिशन् स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥६५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य शरीरधारी शिव-ब्रह्मादि देवताओंके प्रणयको ग्रहण करनेवाले श्रीचैतन्यदेव सभी जीवोंके सदा उपास्य हैं। अपने भक्तोंको अपनी विशुद्ध भजन-परिपाटीका उपदेश करते-करते वे श्रीचैतन्यदेव क्या पुनः मेरे नयनगोचर होंगे?॥६५॥ अनुभाष्य—प्रणयितां वहद्भिः (स्वानुरागपोषणपरैः) धृतमनुजकायैः (गृहीत-नरशरीरैः) गिरिश-परमेष्ठिप्रभृतिभिः (शिवचतुर्मुखादिभिः) गीर्वाणैः (देवैः) सदा (नित्यं) उपास्यः (पूज्यः) स्वभक्तेभ्यः (स्वरूप-रामानन्दादि-निजजनेभ्यः) शुद्धां (निर्मलाम् अन्याभिलाषिताहीनां कर्मज्ञानाद्यनावृतां) निजभजनमुद्रां (स्वभजन-परिपांटिं) उपदिशन् स चैतन्यः किं पुनः अपि मे (मम) दृशोः पदं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—नर शरीरधारी शिव-ब्रह्मादि देवताओंके अपने प्रति अनुरागको पुष्ट करनेवाले, सभीके नित्य उपास्य, निजभक्तों (स्वरूप दामोदर, राय रामानन्दादि निजजनों) को निर्मल (श्रीकृष्णसेवासे इतर अभिलाषा रहित और कर्म-ज्ञानादिसे अनावृत) अपने भजनकी परिपाटी (विधि) का उपदेश करते हुए वे श्रीचैतन्य क्या पुनः मेरे दृष्टिपथपर प्राप्त होंगे?॥६५॥

अङ्गोपाङ्ग अस्त्र करे स्वकार्यसाधन। 'अङ्ग'-शब्देर अर्थ आर शुन दिया मन॥६६॥ 'अङ्ग'-शब्दे अंश कहे शास्त्र-परमाण। अङ्गेर अवयव 'उपाङ्ग'-व्याख्यान॥६७॥ अनुवाद—इस अवतारमें अङ्ग-उपाङ्गरूप अस्त्रोंके द्वारा वे अपने कार्यको सिद्ध करते हैं। अब मन लगाकर 'अङ्ग' शब्दका अर्थ श्रवण करें। शास्त्रोंमें यह प्रमाणित है कि 'अङ्ग' शब्दका अर्थ अंश होता है। अङ्गके अङ्गको 'उपाङ्ग' कहा जाता है॥६६-६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अङ्ग शब्दका पहले किये गये अर्थके अतिरिक्त एक और अर्थ है;

तीसरा अध्याय | १२९