भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ ३/६०-६३ मुक्तिके उद्देश्यसे जो समस्त अनुष्ठान शास्त्रोंमें विहित हैं, वे समस्त भी भक्तिके विरोधी हैं। क्योंकि भक्तिका तात्पर्य एकमात्र श्रीकृष्ण-प्रीति है; जहाँ श्रीकृष्ण-प्रीतिका स्थान नहीं है, अपितु आत्मेन्द्रिय-तृप्तिकी, स्वसुख-साधनकी अथवा स्वदुःख-निवृत्तिकी वासना दिखलायी देती है, वह कभी भी भक्तिके अनुकूल नहीं हो सकती। जबतक भुक्ति और मुक्तिकी स्पृहा हृदयमें जाग्रत रहती है, तबतक उस हृदयमें भक्तिदेवी विराजमान नहीं होतीं। यह भुक्ति-मुक्ति-स्पृहारूपी कल्मष ही गाढ़ अन्धकारके समान जीवके भक्ति-नेत्रोंको आच्छादित करके रखता है। गाढ़ अन्धकारमें जैसे लोग अपने पथको ना देख पानेके कारण कीचड़-काँटोंमें गिरकर कष्ट भोग करते हैं, उसी प्रकार भक्तिविरोधी कर्मरूप कल्मष-परायण लोग भी भक्तिके पथको देख ना पानेके कारण अन्य पथोंपर अग्रसर होकर संसार-यन्त्रणा भोग करते हैं॥६०॥ बाहु तुलि' हरि बलि' प्रेमदृष्ट्ये चाय। करिया कल्मष नाश प्रेमेते भासाय ॥६१॥ अनुवाद-जब महाप्रभु अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर 'हरिबोल' कहते हुए लोगोंको प्रेमदृष्टिसे देखते हैं, तब वे सभीके कल्मष नाशकर उन्हें श्रीकृष्णप्रेममें डुबो देते हैं॥६१॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (८)— स्मितालोकः शोकं हरति जगतां यस्य परितो गिरान्तु प्रारम्भः कुशलपटलीं पल्लवयति। पदालम्भः कं वा प्रणयति न हि प्रेमनिवहं स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥६२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी मन्दहास्ययुक्त दृष्टि जगत्के शोकको सम्पूर्णरूपसे दूर कर देती है, जिनके वाक्यका प्रारम्भ ही सभी प्रकारके कल्याणकी लतारूपी भक्तिलताको पल्लवित करता है और जिनके चरणोंका आश्रय समस्त प्रेमरहस्यको प्राप्त करानेवाला है, वे ही चैतन्याकृति देव मेरे प्रति प्रचुर कृपा करें॥६२॥ अनुभाष्य-यस्य (चैतन्यदेवस्य) स्मितालोकः (मन्दहासकटाक्षः) जगतां (सर्वप्राणिनां) परितः (सर्वतोभावेन) शोकम् (अभावं) हरति (विनाशयति), गिरां प्रारम्भः (वाक्योपक्रमः) तु कुशलपटलीं (कल्याणमालां) पल्लवयति (विस्तारयति), पदालम्भः (चरणाश्रयः) कं वा प्रेमनिवहं (प्रेममकलं) न हि प्रणयति (प्रापयति), सः चैतन्याकृति देवः नः (अस्मान्) अतितरां कृपयतु। श्लोक-भावानुवाद-जिनका मन्द हास्यसे युक्त कटाक्ष सभी प्राणियोंके सभी प्रकारसे शोक (अभावों) का विनाश करता है। जिनके वाक्यका आरम्भ ही कल्याणरूपी मालाका विस्तार करता है। जिनके चरणोंका आश्रयकर कौन प्रेम नहीं प्राप्त करता? वे चैतन्याकृति देव हमपर अतिशय कृपा करें॥६२॥ गौरदर्शनसे पापक्षय और प्रेमकी प्राप्ति :- श्रीअङ्ग, श्रीमुख येइ करे दरशन। तार पापक्षय हय, पाय प्रेमधन ॥६३॥ १२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत