श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/५७-६० ] श्लोक-भावानुवाद—कान्तिकॆ आधिक्यके कारण जिन श्रीकृष्णका वर्ण गौर (पीत) है, विद्वान लोग स्पष्टरूपसे उच्च स्वरसे कीर्तनाख्य भक्तिका अवलम्बन करके उनकी नामरूपी यज्ञ विधानके द्वारा कलियुगमें पूजा करते हैं। वे सभी चतुर्थाश्रम-आश्रित भिक्षुकोंके एकमात्र पूज्य कहे गये हैं। वे चैतन्याकृति देव हमपर अतिशय कृपा करें॥५७॥ ब्रह्मज्योतिसे तमोनाश होता है :- प्रत्यक्ष ताँहार तप्तकाञ्चनेर द्युति। याँहार छटाय नाशे अज्ञान-तमस्तति॥५८॥ अनुवाद—उनकी पिघले स्वर्णके समान द्युति प्रत्यक्ष दिखलायी देती है और वह अज्ञानरूपी अन्धकारके विस्तारका नाश करती है॥५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘अज्ञान-तमस्तति’—अज्ञानरूपी अन्धकारका विस्तार।॥५८॥ जीवेर कल्मष-तमो नाश करिवारे। अङ्ग-उपाङ्ग-नाम नाना अस्त्र धरे॥५९॥ अनुवाद—जीवोंके कल्मष अर्थात् पापराशिरूप अन्धकारको नाश करनेके लिये उन्होंने अङ्ग-उपाङ्ग और श्रीकृष्णनामरूप नाना प्रकारके अस्त्रोंको धारण किया॥५९॥ अमृताणुकणिका—कलियुगके जीव साधारणतः भक्ति-विरोधी कर्मोंमें ही आसक्त हैं। उनकी इस आसक्तिको दूर करनेके उद्देश्यसे परम करुण श्रीगौराङ्ग अङ्ग, उपाङ्ग और श्रीकृष्णनाम-रूप अस्त्र लेकर अवतीर्ण हुए, उन्होंने चक्रादि अस्त्र इस बार प्रकट नहीं किये। जिनके प्रति उन्होंने एक बार ही प्रेम-दृष्टिपात किया अथवा जिन्होंने उनके श्रीअङ्गका एकबार भी दर्शन किया किम्वा उनके मुखसे एकबार भी हरिनाम् सुना, उनकी ही तत्क्षणात् भक्ति-विरोधी कर्मवासना दूर हो गयी। अन्यान्य अवतारोंमें चक्रादि अस्त्रोंका भय दिखाकर जीवकी भक्ति-विरोधी कर्मवासना त्याग करवायी अथवा चक्रादिकी सहायतासे असुरादिका संहार किया, किन्तु इस परम-करुण अवतारमें किसीको भी भय भी नहीं दिखाया और किसीका संहार भी नहीं किया। केवल श्रीअङ्ग और नाम प्रकट करके श्रीअङ्गके मनोहारित्व और श्रीनामके माधुर्यसे बहिर्मुख असुरादिके चित्तको इस प्रकारसे आकृष्ट किया कि उनकी बहिर्मुखता और असुरत्वादि बिना उनके जाने स्वेच्छापूर्वक दूर हो गये तथा वे प्रीति और उत्कण्ठाके सहित भगवत्-भजनमें प्रवृत्त हुए॥५९॥ तमः या कल्मषकी परिभाषा :— भक्तिर विरोधी कर्म, धर्म वा अधर्म। ताहार ‘कल्मष’ नाम, सेइ महातमः॥६०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्म हो अथवा अधर्म हो, जो कोई भी कर्म भक्तिका विरोधी हो, उसका नाम ‘कल्मष’ है—वही महान्धकार है॥६०॥ अमृताणुकणिका—स्वर्गादि-भोग प्राप्ति करानेवाले वैदिक अनुष्ठान भी धर्मके नामसे अभिहित हैं, किन्तु आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे इन्हें भी भक्तिका विरोधी कहा गया है। यहाँतक कि तीसरा अध्याय | १२७