भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

[ ३/५२-५७ अनुवाद-हे भाइयों! अब श्रीचैतन्य महाप्रभुकी यह सब महिमा श्रवण कीजिये। इस श्लोकमें उनकी महिमाकी चरम सीमाका वर्णन किया गया है॥५२॥ 'कृष्णवर्णं'-श्लोककी व्याख्या :- 'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण सदा याँर मुखे। अथवा, कृष्णके तिँहो वर्णे निज सुखे॥५३॥ कृष्णवर्ण-शब्देर अर्थ दुइ त' प्रमाण। कृष्ण बिनु ताँर मुखे नाहि आइसे आन॥५४॥ केह ताँरे बले यदि कृष्ण-वरण। आर विशेषणे तारे करे निवारण॥५५॥ अनुवाद-'कृष्ण'-ये दो वर्ण जिनके मुखमें सदा रहते हैं अथवा श्रीकृष्णका जो सदा सुखपूर्वक अपने श्रीमुखसे वर्णन करते हैं। कृष्णवर्ण शब्दके उपरोक्त ये दो अर्थ हैं। उनके मुखसे 'कृष्ण' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं निकलता है। यदि कोई यह कहे कि उनके शरीरका वर्ण कृष्ण है, तो यह बात इसके अगले विशेषणसे खण्डित हो जाती है॥५३-५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मूल श्लोकमें यदि कोई 'कृष्णवर्णं' शब्दसे कलियुगके उपास्य पुरुषको कृष्ण (अर्थात् कृष्णरूप कान्तियुक्त) कहते हैं, तो 'त्विषाऽकृष्णं' इस दूसरे विशेषणके अनुसार 'कृष्णवर्णं' का यह अर्थ नहीं हो सकता॥५५॥ देहकान्त्ये हय तैँहो अकृष्णवरण। अकृष्णवरणे ताँर कहे पीतवरण॥५६॥ अनुवाद-उनके शरीरका वर्ण निःसन्देह अकृष्ण अर्थात् कृष्ण नहीं है। 'अकृष्णवर्ण' कहनेसे यह पीतवर्णको सूचित करता है॥५६॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (१)- कलौ यं विद्वांसः स्फुटमभियजन्ते द्युतिभरा- दकृष्णाङ्गं कृष्णं मखविधिभिरुत्कीर्त्तनमयैः। उपास्यञ्च प्राहुर्यमखिलचतुर्थाश्रमजुषां स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाकी भावरूप द्युतिका आधिक्य होनेसे अकृष्ण अर्थात् गौररूपको प्राप्त श्रीकृष्णका कीर्त्तनमय यज्ञके द्वारा सभी पण्डित कलिकालमें स्पष्टरूपसे आराधना करते हैं। वे संन्यासके अन्तर्गत परमहंसरूप चतुर्थाश्रमका आश्रय ग्रहण करनेवालोंके एकमात्र उपास्यतत्त्व हैं। वही चैतन्याकृति परमपुरुष शीघ्र ही मेरे प्रति कृपा करें॥५७॥ अनुभाष्य-विद्वांसः (पण्डिताः) स्फुटं (स्पष्टं) द्युतिभरात् (कान्त्याधिक्यात्) अकृष्णाङ्गं (गौरं पीतवर्णं) कृष्णं उत्कीर्त्तनमयैः (उच्चैः कीर्त्तनाख्यभक्त्यवलम्बनैः) मखविधिभिः (नामयज्ञविधानैः) कलौ अभियजन्ते, यं च अखिलचतुर्थाश्रमजुषां (सकलभिक्षूणाम्) उपास्यं (पूज्यं) प्राहुः, सः चैतन्याकृतिः देवः नः (अस्मान्) अतितरां (अतिशयेन) कृपयतु। १२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत