भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

३/५१-५२ ]

‘साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्’—इस वाक्यमें उनकी भगवत्ताको स्पष्ट कर रहे हैं। उनके अभिन्न ‘अङ्ग’ समूह परम मनोहर हैं और ‘उपाङ्ग’ या भूषणादि महाप्रभावयुक्त हैं, ये सभी उनके ‘अस्त्र’ हैं। तथा जो सदा ही एकान्तरूपसे उनके सान्निध्यमें वास करते हैं, वे सभी उनके ‘पार्षद’ हैं। उनकी इस प्रकार रूपकी शोभाका जिन बहुतसे महाजनोंने अनेक बार दर्शन किया है, वे गौड़, वरेन्द्र, बङ्ग, उत्कलादि देशवासियोंके मध्यमें भी विशेष प्रसिद्ध हैं। अथवा अङ्ग, उपाङ्ग और अस्त्रतुल्य उनके अतिशय प्रेमके पात्र श्रीअद्वैताचार्य आदि अतिप्रभावशाली पार्षदोंके साथ वे सदा विद्यमान रहते हैं, इस प्रकार अन्य अर्थ ग्रहण करनेसे भी वे ही व्यक्त होते हैं। इस प्रकारसे वर्णित उन गौरसुन्दरकी सुमेधा लोग किस-किस उपायसे आराधना करते हैं? वे यज्ञरूप पूजा-सामग्रीके द्वारा उनकी आराधना करते हैं, क्योंकि ‘जिस स्थानमें श्रीकृष्णकीर्तनरूप महोत्सव नहीं होता है, वह स्थान स्वर्गलोक होनेपर भी रहने योग्य नहीं है’, देवोंका यह वाक्य (भाः ५/१९/२३) इसका प्रमाण है। उसमें ‘सङ्कीर्त्तनप्रायैः’ इस विशेषणके द्वारा सङ्कीर्तनप्रधान यज्ञको ही आराधनाके उपायरूपमें व्यक्त कर रहे हैं। ‘सङ्कीर्तन’ अर्थात् अनेक लोगोंके द्वारा मिलकर जो श्रीकृष्णकीर्तन होता है, वही उस यज्ञमें प्रधान सामग्री है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके आश्रित भक्तोंमें ही सङ्कीर्तनका प्राधान्य दिखलायी देता है, इसलिये सङ्कीर्तन ही आराधनाका उपाय है, यह स्पष्ट है। इसलिये श्रीविष्णुसहस्रनामोंमें उनके अवतार सूचक—सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वराङ्ग, चन्दनाङ्गदी, संन्यासकृत, शान्तादि नामोंका वर्णन हुआ है। परमपण्डित-शिरोमणि श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भी इसीको व्यक्त किया है—‘कालक्रमसे लुप्त अपने भक्तियोगको जो पुनः प्रकटित करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य नामसे आविर्भूत हुए हैं, उनके चरणकमलोंमें मेरा मनरूपी भृङ्ग गाढ़रूपसे लीन हो।”॥५१॥ अनुभाष्य—‘कौनसे युगमें भगवान् किस रूपमें अवतीर्ण होते हैं?’—राजा निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीकरभाजन कलिकालके अवतारी और उनका भजन करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए कह रहे हैं— सुमेधसः (बुद्धिमन्तः) त्विषा (कान्त्या) अकृष्णं (विद्युद्गौरं शुक्लरक्तवर्णद्वयावशेषं तृतीयं पीतवर्णं) कृष्णवर्णं (कृष्णं वर्णयति गायति यः तम्; यद्वा, कृष्णेति एतौ वर्णौ च यस्मिन् तं) साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् (अङ्गे नित्यानन्दाद्वैतौ, उपाङ्गानि श्रीवासादि-भक्ताः, अस्त्राणि हरिनामादीनि, पार्षदाः गदाधरदामोदरस्वरूपादयः, तैः सहितं) सङ्कीर्त्तनप्रायैः (बहुभिर्मिलित्वा हरिकथा-नाम-गानैः) यज्ञैः यजन्ति। श्लोक-भावानुवाद—शुक्ल और रक्त—इन दो वर्णोंके अतिरिक्त तीसरे विद्युतके समान पीतवर्ण जिनकी कान्ति है, जो ‘कृ’ और ‘ष्ण’, इन दो वर्णोंका गान करते हैं अथवा ये दो वर्ण जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यमें हैं, अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदसहित उन श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी बुद्धिमान लोग मिलकर हरिकथा-नाम-गानरूपी सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा आराधना करते हैं। [अङ्ग—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु; उपाङ्ग—श्रीवासादि भक्त; अस्त्र—हरिनामादि; पार्षद—गदाधर पण्डित-स्वरूप दामोदरादि हैं]॥५१॥ शुन, भाइ, एइ सब चैतन्य-महिमा। एइ श्लोके कहे ताँर महिमार् सीमा॥५२॥

तीसरा अध्याय | १२५

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