श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
३/५१-५२ ]
‘साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्’—इस वाक्यमें उनकी भगवत्ताको स्पष्ट कर रहे हैं। उनके अभिन्न ‘अङ्ग’ समूह परम मनोहर हैं और ‘उपाङ्ग’ या भूषणादि महाप्रभावयुक्त हैं, ये सभी उनके ‘अस्त्र’ हैं। तथा जो सदा ही एकान्तरूपसे उनके सान्निध्यमें वास करते हैं, वे सभी उनके ‘पार्षद’ हैं। उनकी इस प्रकार रूपकी शोभाका जिन बहुतसे महाजनोंने अनेक बार दर्शन किया है, वे गौड़, वरेन्द्र, बङ्ग, उत्कलादि देशवासियोंके मध्यमें भी विशेष प्रसिद्ध हैं। अथवा अङ्ग, उपाङ्ग और अस्त्रतुल्य उनके अतिशय प्रेमके पात्र श्रीअद्वैताचार्य आदि अतिप्रभावशाली पार्षदोंके साथ वे सदा विद्यमान रहते हैं, इस प्रकार अन्य अर्थ ग्रहण करनेसे भी वे ही व्यक्त होते हैं। इस प्रकारसे वर्णित उन गौरसुन्दरकी सुमेधा लोग किस-किस उपायसे आराधना करते हैं? वे यज्ञरूप पूजा-सामग्रीके द्वारा उनकी आराधना करते हैं, क्योंकि ‘जिस स्थानमें श्रीकृष्णकीर्तनरूप महोत्सव नहीं होता है, वह स्थान स्वर्गलोक होनेपर भी रहने योग्य नहीं है’, देवोंका यह वाक्य (भाः ५/१९/२३) इसका प्रमाण है। उसमें ‘सङ्कीर्त्तनप्रायैः’ इस विशेषणके द्वारा सङ्कीर्तनप्रधान यज्ञको ही आराधनाके उपायरूपमें व्यक्त कर रहे हैं। ‘सङ्कीर्तन’ अर्थात् अनेक लोगोंके द्वारा मिलकर जो श्रीकृष्णकीर्तन होता है, वही उस यज्ञमें प्रधान सामग्री है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके आश्रित भक्तोंमें ही सङ्कीर्तनका प्राधान्य दिखलायी देता है, इसलिये सङ्कीर्तन ही आराधनाका उपाय है, यह स्पष्ट है। इसलिये श्रीविष्णुसहस्रनामोंमें उनके अवतार सूचक—सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वराङ्ग, चन्दनाङ्गदी, संन्यासकृत, शान्तादि नामोंका वर्णन हुआ है। परमपण्डित-शिरोमणि श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भी इसीको व्यक्त किया है—‘कालक्रमसे लुप्त अपने भक्तियोगको जो पुनः प्रकटित करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य नामसे आविर्भूत हुए हैं, उनके चरणकमलोंमें मेरा मनरूपी भृङ्ग गाढ़रूपसे लीन हो।”॥५१॥ अनुभाष्य—‘कौनसे युगमें भगवान् किस रूपमें अवतीर्ण होते हैं?’—राजा निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीकरभाजन कलिकालके अवतारी और उनका भजन करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए कह रहे हैं— सुमेधसः (बुद्धिमन्तः) त्विषा (कान्त्या) अकृष्णं (विद्युद्गौरं शुक्लरक्तवर्णद्वयावशेषं तृतीयं पीतवर्णं) कृष्णवर्णं (कृष्णं वर्णयति गायति यः तम्; यद्वा, कृष्णेति एतौ वर्णौ च यस्मिन् तं) साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् (अङ्गे नित्यानन्दाद्वैतौ, उपाङ्गानि श्रीवासादि-भक्ताः, अस्त्राणि हरिनामादीनि, पार्षदाः गदाधरदामोदरस्वरूपादयः, तैः सहितं) सङ्कीर्त्तनप्रायैः (बहुभिर्मिलित्वा हरिकथा-नाम-गानैः) यज्ञैः यजन्ति। श्लोक-भावानुवाद—शुक्ल और रक्त—इन दो वर्णोंके अतिरिक्त तीसरे विद्युतके समान पीतवर्ण जिनकी कान्ति है, जो ‘कृ’ और ‘ष्ण’, इन दो वर्णोंका गान करते हैं अथवा ये दो वर्ण जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यमें हैं, अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदसहित उन श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी बुद्धिमान लोग मिलकर हरिकथा-नाम-गानरूपी सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा आराधना करते हैं। [अङ्ग—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु; उपाङ्ग—श्रीवासादि भक्त; अस्त्र—हरिनामादि; पार्षद—गदाधर पण्डित-स्वरूप दामोदरादि हैं]॥५१॥ शुन, भाइ, एइ सब चैतन्य-महिमा। एइ श्लोके कहे ताँर महिमार् सीमा॥५२॥
तीसरा अध्याय | १२५
[ ३/५२-५७ अनुवाद-हे भाइयों! अब श्रीचैतन्य महाप्रभुकी यह सब महिमा श्रवण कीजिये। इस श्लोकमें उनकी महिमाकी चरम सीमाका वर्णन किया गया है॥५२॥ 'कृष्णवर्णं'-श्लोककी व्याख्या :- 'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण सदा याँर मुखे। अथवा, कृष्णके तिँहो वर्णे निज सुखे॥५३॥ कृष्णवर्ण-शब्देर अर्थ दुइ त' प्रमाण। कृष्ण बिनु ताँर मुखे नाहि आइसे आन॥५४॥ केह ताँरे बले यदि कृष्ण-वरण। आर विशेषणे तारे करे निवारण॥५५॥ अनुवाद-'कृष्ण'-ये दो वर्ण जिनके मुखमें सदा रहते हैं अथवा श्रीकृष्णका जो सदा सुखपूर्वक अपने श्रीमुखसे वर्णन करते हैं। कृष्णवर्ण शब्दके उपरोक्त ये दो अर्थ हैं। उनके मुखसे 'कृष्ण' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं निकलता है। यदि कोई यह कहे कि उनके शरीरका वर्ण कृष्ण है, तो यह बात इसके अगले विशेषणसे खण्डित हो जाती है॥५३-५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मूल श्लोकमें यदि कोई 'कृष्णवर्णं' शब्दसे कलियुगके उपास्य पुरुषको कृष्ण (अर्थात् कृष्णरूप कान्तियुक्त) कहते हैं, तो 'त्विषाऽकृष्णं' इस दूसरे विशेषणके अनुसार 'कृष्णवर्णं' का यह अर्थ नहीं हो सकता॥५५॥ देहकान्त्ये हय तैँहो अकृष्णवरण। अकृष्णवरणे ताँर कहे पीतवरण॥५६॥ अनुवाद-उनके शरीरका वर्ण निःसन्देह अकृष्ण अर्थात् कृष्ण नहीं है। 'अकृष्णवर्ण' कहनेसे यह पीतवर्णको सूचित करता है॥५६॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (१)- कलौ यं विद्वांसः स्फुटमभियजन्ते द्युतिभरा- दकृष्णाङ्गं कृष्णं मखविधिभिरुत्कीर्त्तनमयैः। उपास्यञ्च प्राहुर्यमखिलचतुर्थाश्रमजुषां स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाकी भावरूप द्युतिका आधिक्य होनेसे अकृष्ण अर्थात् गौररूपको प्राप्त श्रीकृष्णका कीर्त्तनमय यज्ञके द्वारा सभी पण्डित कलिकालमें स्पष्टरूपसे आराधना करते हैं। वे संन्यासके अन्तर्गत परमहंसरूप चतुर्थाश्रमका आश्रय ग्रहण करनेवालोंके एकमात्र उपास्यतत्त्व हैं। वही चैतन्याकृति परमपुरुष शीघ्र ही मेरे प्रति कृपा करें॥५७॥ अनुभाष्य-विद्वांसः (पण्डिताः) स्फुटं (स्पष्टं) द्युतिभरात् (कान्त्याधिक्यात्) अकृष्णाङ्गं (गौरं पीतवर्णं) कृष्णं उत्कीर्त्तनमयैः (उच्चैः कीर्त्तनाख्यभक्त्यवलम्बनैः) मखविधिभिः (नामयज्ञविधानैः) कलौ अभियजन्ते, यं च अखिलचतुर्थाश्रमजुषां (सकलभिक्षूणाम्) उपास्यं (पूज्यं) प्राहुः, सः चैतन्याकृतिः देवः नः (अस्मान्) अतितरां (अतिशयेन) कृपयतु। १२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/५७-६० ] श्लोक-भावानुवाद—कान्तिकॆ आधिक्यके कारण जिन श्रीकृष्णका वर्ण गौर (पीत) है, विद्वान लोग स्पष्टरूपसे उच्च स्वरसे कीर्तनाख्य भक्तिका अवलम्बन करके उनकी नामरूपी यज्ञ विधानके द्वारा कलियुगमें पूजा करते हैं। वे सभी चतुर्थाश्रम-आश्रित भिक्षुकोंके एकमात्र पूज्य कहे गये हैं। वे चैतन्याकृति देव हमपर अतिशय कृपा करें॥५७॥ ब्रह्मज्योतिसे तमोनाश होता है :- प्रत्यक्ष ताँहार तप्तकाञ्चनेर द्युति। याँहार छटाय नाशे अज्ञान-तमस्तति॥५८॥ अनुवाद—उनकी पिघले स्वर्णके समान द्युति प्रत्यक्ष दिखलायी देती है और वह अज्ञानरूपी अन्धकारके विस्तारका नाश करती है॥५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘अज्ञान-तमस्तति’—अज्ञानरूपी अन्धकारका विस्तार।॥५८॥ जीवेर कल्मष-तमो नाश करिवारे। अङ्ग-उपाङ्ग-नाम नाना अस्त्र धरे॥५९॥ अनुवाद—जीवोंके कल्मष अर्थात् पापराशिरूप अन्धकारको नाश करनेके लिये उन्होंने अङ्ग-उपाङ्ग और श्रीकृष्णनामरूप नाना प्रकारके अस्त्रोंको धारण किया॥५९॥ अमृताणुकणिका—कलियुगके जीव साधारणतः भक्ति-विरोधी कर्मोंमें ही आसक्त हैं। उनकी इस आसक्तिको दूर करनेके उद्देश्यसे परम करुण श्रीगौराङ्ग अङ्ग, उपाङ्ग और श्रीकृष्णनाम-रूप अस्त्र लेकर अवतीर्ण हुए, उन्होंने चक्रादि अस्त्र इस बार प्रकट नहीं किये। जिनके प्रति उन्होंने एक बार ही प्रेम-दृष्टिपात किया अथवा जिन्होंने उनके श्रीअङ्गका एकबार भी दर्शन किया किम्वा उनके मुखसे एकबार भी हरिनाम् सुना, उनकी ही तत्क्षणात् भक्ति-विरोधी कर्मवासना दूर हो गयी। अन्यान्य अवतारोंमें चक्रादि अस्त्रोंका भय दिखाकर जीवकी भक्ति-विरोधी कर्मवासना त्याग करवायी अथवा चक्रादिकी सहायतासे असुरादिका संहार किया, किन्तु इस परम-करुण अवतारमें किसीको भी भय भी नहीं दिखाया और किसीका संहार भी नहीं किया। केवल श्रीअङ्ग और नाम प्रकट करके श्रीअङ्गके मनोहारित्व और श्रीनामके माधुर्यसे बहिर्मुख असुरादिके चित्तको इस प्रकारसे आकृष्ट किया कि उनकी बहिर्मुखता और असुरत्वादि बिना उनके जाने स्वेच्छापूर्वक दूर हो गये तथा वे प्रीति और उत्कण्ठाके सहित भगवत्-भजनमें प्रवृत्त हुए॥५९॥ तमः या कल्मषकी परिभाषा :— भक्तिर विरोधी कर्म, धर्म वा अधर्म। ताहार ‘कल्मष’ नाम, सेइ महातमः॥६०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्म हो अथवा अधर्म हो, जो कोई भी कर्म भक्तिका विरोधी हो, उसका नाम ‘कल्मष’ है—वही महान्धकार है॥६०॥ अमृताणुकणिका—स्वर्गादि-भोग प्राप्ति करानेवाले वैदिक अनुष्ठान भी धर्मके नामसे अभिहित हैं, किन्तु आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे इन्हें भी भक्तिका विरोधी कहा गया है। यहाँतक कि तीसरा अध्याय | १२७
[ ३/६०-६३ मुक्तिके उद्देश्यसे जो समस्त अनुष्ठान शास्त्रोंमें विहित हैं, वे समस्त भी भक्तिके विरोधी हैं। क्योंकि भक्तिका तात्पर्य एकमात्र श्रीकृष्ण-प्रीति है; जहाँ श्रीकृष्ण-प्रीतिका स्थान नहीं है, अपितु आत्मेन्द्रिय-तृप्तिकी, स्वसुख-साधनकी अथवा स्वदुःख-निवृत्तिकी वासना दिखलायी देती है, वह कभी भी भक्तिके अनुकूल नहीं हो सकती। जबतक भुक्ति और मुक्तिकी स्पृहा हृदयमें जाग्रत रहती है, तबतक उस हृदयमें भक्तिदेवी विराजमान नहीं होतीं। यह भुक्ति-मुक्ति-स्पृहारूपी कल्मष ही गाढ़ अन्धकारके समान जीवके भक्ति-नेत्रोंको आच्छादित करके रखता है। गाढ़ अन्धकारमें जैसे लोग अपने पथको ना देख पानेके कारण कीचड़-काँटोंमें गिरकर कष्ट भोग करते हैं, उसी प्रकार भक्तिविरोधी कर्मरूप कल्मष-परायण लोग भी भक्तिके पथको देख ना पानेके कारण अन्य पथोंपर अग्रसर होकर संसार-यन्त्रणा भोग करते हैं॥६०॥ बाहु तुलि' हरि बलि' प्रेमदृष्ट्ये चाय। करिया कल्मष नाश प्रेमेते भासाय ॥६१॥ अनुवाद-जब महाप्रभु अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर 'हरिबोल' कहते हुए लोगोंको प्रेमदृष्टिसे देखते हैं, तब वे सभीके कल्मष नाशकर उन्हें श्रीकृष्णप्रेममें डुबो देते हैं॥६१॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (८)— स्मितालोकः शोकं हरति जगतां यस्य परितो गिरान्तु प्रारम्भः कुशलपटलीं पल्लवयति। पदालम्भः कं वा प्रणयति न हि प्रेमनिवहं स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥६२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी मन्दहास्ययुक्त दृष्टि जगत्के शोकको सम्पूर्णरूपसे दूर कर देती है, जिनके वाक्यका प्रारम्भ ही सभी प्रकारके कल्याणकी लतारूपी भक्तिलताको पल्लवित करता है और जिनके चरणोंका आश्रय समस्त प्रेमरहस्यको प्राप्त करानेवाला है, वे ही चैतन्याकृति देव मेरे प्रति प्रचुर कृपा करें॥६२॥ अनुभाष्य-यस्य (चैतन्यदेवस्य) स्मितालोकः (मन्दहासकटाक्षः) जगतां (सर्वप्राणिनां) परितः (सर्वतोभावेन) शोकम् (अभावं) हरति (विनाशयति), गिरां प्रारम्भः (वाक्योपक्रमः) तु कुशलपटलीं (कल्याणमालां) पल्लवयति (विस्तारयति), पदालम्भः (चरणाश्रयः) कं वा प्रेमनिवहं (प्रेममकलं) न हि प्रणयति (प्रापयति), सः चैतन्याकृति देवः नः (अस्मान्) अतितरां कृपयतु। श्लोक-भावानुवाद-जिनका मन्द हास्यसे युक्त कटाक्ष सभी प्राणियोंके सभी प्रकारसे शोक (अभावों) का विनाश करता है। जिनके वाक्यका आरम्भ ही कल्याणरूपी मालाका विस्तार करता है। जिनके चरणोंका आश्रयकर कौन प्रेम नहीं प्राप्त करता? वे चैतन्याकृति देव हमपर अतिशय कृपा करें॥६२॥ गौरदर्शनसे पापक्षय और प्रेमकी प्राप्ति :- श्रीअङ्ग, श्रीमुख येइ करे दरशन। तार पापक्षय हय, पाय प्रेमधन ॥६३॥ १२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/६३-६७ ]
अन्यान्य अवतारोंके अस्त्र और सैन्यसामन्त, किन्तु गौरावतारके भक्त और सङ्कीर्तन :- अन्य अवतारे सब सैन्य-शस्त्र सङ्गे। चैतन्य-कृष्णेर सैन्य अङ्ग-उपाङ्गे॥६४॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके श्रीअङ्ग और श्रीमुखका जो भी दर्शन करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह प्रेमधनको प्राप्त करता है। अन्य अवतारोंमें वे सेना और अस्त्र-शस्त्र लेकर अवतरित होते हैं, किन्तु इस श्रीकृष्णचैतन्य अवतारमें उनके अङ्ग और उपाङ्ग ही उनकी सेना है॥६३-६४॥
स्तवमालाका प्रथम-चैतन्याष्टकमें (१)— सदोपास्यः श्रीमान् धृतमनुजकायैः प्रणयितां वहद्भिर्गीर्वाणैर्गिरिश-परमेष्ठि-प्रभृतिभिः। स्वभक्तेभ्यः शुद्धां निजभजनमुद्रामुपदिशन् स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥६५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य शरीरधारी शिव-ब्रह्मादि देवताओंके प्रणयको ग्रहण करनेवाले श्रीचैतन्यदेव सभी जीवोंके सदा उपास्य हैं। अपने भक्तोंको अपनी विशुद्ध भजन-परिपाटीका उपदेश करते-करते वे श्रीचैतन्यदेव क्या पुनः मेरे नयनगोचर होंगे?॥६५॥ अनुभाष्य—प्रणयितां वहद्भिः (स्वानुरागपोषणपरैः) धृतमनुजकायैः (गृहीत-नरशरीरैः) गिरिश-परमेष्ठिप्रभृतिभिः (शिवचतुर्मुखादिभिः) गीर्वाणैः (देवैः) सदा (नित्यं) उपास्यः (पूज्यः) स्वभक्तेभ्यः (स्वरूप-रामानन्दादि-निजजनेभ्यः) शुद्धां (निर्मलाम् अन्याभिलाषिताहीनां कर्मज्ञानाद्यनावृतां) निजभजनमुद्रां (स्वभजन-परिपांटिं) उपदिशन् स चैतन्यः किं पुनः अपि मे (मम) दृशोः पदं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—नर शरीरधारी शिव-ब्रह्मादि देवताओंके अपने प्रति अनुरागको पुष्ट करनेवाले, सभीके नित्य उपास्य, निजभक्तों (स्वरूप दामोदर, राय रामानन्दादि निजजनों) को निर्मल (श्रीकृष्णसेवासे इतर अभिलाषा रहित और कर्म-ज्ञानादिसे अनावृत) अपने भजनकी परिपाटी (विधि) का उपदेश करते हुए वे श्रीचैतन्य क्या पुनः मेरे दृष्टिपथपर प्राप्त होंगे?॥६५॥
अङ्गोपाङ्ग अस्त्र करे स्वकार्यसाधन। 'अङ्ग'-शब्देर अर्थ आर शुन दिया मन॥६६॥ 'अङ्ग'-शब्दे अंश कहे शास्त्र-परमाण। अङ्गेर अवयव 'उपाङ्ग'-व्याख्यान॥६७॥ अनुवाद—इस अवतारमें अङ्ग-उपाङ्गरूप अस्त्रोंके द्वारा वे अपने कार्यको सिद्ध करते हैं। अब मन लगाकर 'अङ्ग' शब्दका अर्थ श्रवण करें। शास्त्रोंमें यह प्रमाणित है कि 'अङ्ग' शब्दका अर्थ अंश होता है। अङ्गके अङ्गको 'उपाङ्ग' कहा जाता है॥६६-६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अङ्ग शब्दका पहले किये गये अर्थके अतिरिक्त एक और अर्थ है;
तीसरा अध्याय | १२९
जैसे, - अङ्ग शब्दका अर्थ है अंश। 'परमाण' अर्थात् प्रमाण। अङ्गका अवयव (अंश) उपाङ्ग है॥ ६७॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/१४)- नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥ ६८॥ अनुवाद-आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥ ६८॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥ ६८॥ जलशायी अन्तर्यामी येइ नारायण। सेहो तोमार अंश, तुमि मूल नारायण॥ ६९॥ 'अङ्ग'-शब्दे अंश कहे, सेहो सत्य हय। मायाकार्य नहे-सब चिदानन्दमय॥ ७०॥ अनुवाद-कारण, गर्भ और क्षीर समुद्रके जलमें शयन करनेवाले सभीके अन्तर्यामी नारायण आपके अंश हैं एवं आप मूल नारायण हैं। 'अङ्ग' शब्दका अर्थ अंश है, यह सत्य है, किन्तु यह मायाके द्वारा रचित कार्य नहीं है; आपके सभी अंश चिदानन्दमय है॥ ६९-७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अङ्ग शब्दसे अंशरूप कारणाब्धिशायी आदि तीन पुरुषावतारोंको समझना चाहिये। वे सब चिदानन्दमय हैं, वे ईश्वर हैं अर्थात् मायानिर्मित तत्त्व नहीं है। इसलिये श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दोनों महाप्रभुके दो अङ्ग हैं। अनुभाष्य-जिस प्रकार माया-जगत्में मायाके द्वारा वस्तु खण्डित होकर अंश होती है, उस प्रकार मायासे अतीत विष्णुत्तत्त्वके अंश होनेपर भी विष्णुत्व अथवा वस्तुत्वमें खण्ड नहीं होते। दीपके उदाहरणमें यह देखा जाता है कि मूल दीपसे अन्य दीप उदित होनेपर भी जैसे उनमें वस्तुतः उनमें पार्थक्य नहीं रहता, उसी प्रकार स्वयंरूप श्रीकृष्णके स्वयंप्रकाश या विलास श्रीबलदेव प्रभुसे समस्त विष्णुत्तत्त्वका आविर्भाव होता है-परस्परका लीलाभेद रहनेपर भी ये वस्तुतः अभेद हैं। वे चिदानन्दमय विष्णुत्तत्त्व सभी मायाधीश हैं-माया उनके ऊपर कोई कार्य नहीं कर सकती। विष्णुत्तत्त्वसे भिन्न जो वस्तुएँ हैं, उनपर मायाकी क्रिया होती है। मायाके द्वारा वशमें किये जा सकनेके कारण भगवान्के विभिन्नांश ब्रह्मा और शिव विकारको प्राप्त होते हैं। दूधकी परिणति जिस प्रकार दही है, शम्भु-तत्त्व आदि भी उसी प्रकार हैं। (अधिक जाननेके लिये ब्रह्मसंहितामें श्रीजीव गोस्वामीकी टीका द्रष्टव्य है)॥७०॥ दो विष्णु ही दो सेनापति :- अद्वैत, नित्यानन्द-चैतन्येर दुइ अङ्ग। अङ्गेर अवयवगण कहिये उपाङ्ग॥ ७१॥ अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण अस्त्र प्रभुर सहिते। सेइ सब अस्त्र हय पाषण्ड दलिते॥ ७२॥
३/७१-७६ ] नित्यानन्द गोसाञि साक्षात् हलधर। अद्वैत आचार्य गोसाञि साक्षात् ईश्वर ॥७३ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचैतन्य महाप्रभुके दो अङ्ग हैं, अङ्गके अवयव अर्थात् अंशको ही उपाङ्ग कहा जाता है। पाषण्डी लोगोंके दलनके लिये प्रभुके साथ सदा ये सभी अङ्ग-उपाङ्गरूपी तीक्ष्ण अस्त्र रहते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु साक्षात् हलधर अर्थात् श्रीबलदेव प्रभु हैं और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु साक्षात् ईश्वर हैं॥७१-७३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साक्षात् ईश्वर' अर्थात् वे साक्षात् महाविष्णुका अवतार हैं॥७३ ॥ अनुभाष्य—'पाषण्ड'—जो लोग मायाधीश विष्णुत्तत्त्वके साथ मायावश्य शिवादि-तत्त्वको समान मानते हैं, भगवत्-लीलाके नित्यत्वको नहीं समझकर नित्य भक्तितत्त्वको कालके द्वारा खण्डित तथा अनित्य कर्ममात्र मानते हैं, वे पाषण्डी हैं। इस प्रकारके पाषण्डियोंकी दुर्बुद्धिको दूर करनेका विष्णु और उनके सेवकोंका (वैष्णवोंका) प्रयास है॥७२॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं श्रीकृष्ण हैं, श्रीबलदेव श्रीकृष्णके विलासरूप अंश हैं और महाविष्णु उनके स्वांश हैं। इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु भी श्रीचैतन्य महाप्रभुके अङ्ग हैं। और श्रीअद्वैत तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुके जो अङ्ग (अथवा अंश—उनके अनुगत भक्तमण्डली), उसका नाम ही श्रीकृष्णचैतन्यके उपाङ्ग है; श्रीवासादि भक्तवृन्द ही उपाङ्ग हैं। श्रीअद्वैत-नित्यानन्द-श्रीवासादिरूप अङ्ग-उपाङ्ग ही पाषण्ड दलन कार्यके लिये अस्त्रतुल्य कहे गये हैं। श्रीभगवान्के तीक्ष्ण अस्त्रोंके सामनेसे जैसे असुर बचकर नहीं भाग सकते, अपितु मारे जाते हैं, उसी प्रकार श्रीअद्वैत-नित्यानन्दादिके प्रभावसे कोई भी पाषण्डी भाग नहीं सकते, उनके अलौकिक प्रभावसे सभी पाषण्डी पाषण्डत्व त्यागकर परम-भागवत हो जाते हैं॥७१-७३॥ भक्तगण ही सैनिक और श्रीकृष्णकीर्त्तन ही अस्त्र :— श्रीवासादि परिषद सैन्य सङ्गे लञा। दुइ सेनापति बुलेन कीर्त्तन करिया ॥७४ ॥ पाषण्डदलनवाना नित्यानन्द राय। आचार्य-हुङ्कारे पाप-पाषण्डी पलाय ॥७५ ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु—ये दो सेनापति अपनी सेनाओंके साथ अर्थात् श्रीवासादि पार्षदोंको लेकर कीर्त्तन करते हुए सर्वत्र भ्रमण करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अङ्ग-भङ्गिमा आदि चिह्न देखनेसे ही विश्वास होता है कि वे पाषण्डियोंका अर्थात् उनकी पाषण्ड-वृत्तिका दलन करनेमें सक्षम हैं। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी हुङ्कारसे ही पापी-पाषण्डी भाग जाते हैं अर्थात् उनके पाप-पाषण्ड दूर होकर वे परम-भागवत बन जाते हैं॥७४-७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वाना' का अर्थ चिह्न होता है। यह तुरीभेरीकी भाँति एक प्रकारका यन्त्र होता है, जिसके द्वारा पाषण्डदलन-चिह्न प्रकाशित होता है॥७५॥ श्रीकृष्णकीर्त्तनके पिता श्रीगौरसुन्दर :— सङ्कीर्त्तन-प्रवर्त्तक श्रीकृष्णचैतन्य। सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे भजे, सेइ धन्य ॥७६ ॥ तीसरा अध्याय | १३१
[ ३/७६-७८
अनुवाद- श्रीकृष्ण नामसङ्कीर्तनके प्रवर्तक स्वयं श्रीकृष्णचैतन्य हैं। सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा जो उनका भजन करता है, वह धन्य है॥७६॥ अमृतानुकणिका-श्रीचैतन्यदासानुदास आत्माकी स्वाभाविक वृत्तिसे निरन्तर “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” सम्बोधनात्मक नामोच्चारण करते रहते हैं। एकमात्र इसीके द्वारा ही विप्रलम्भ-विग्रह सपारषद श्रीगौरसुन्दरकी आराधना होती है। क्योंकि इस प्रकार सङ्कीर्तन और सम्बोधनात्मक उच्चारण अत्यन्त विरह-कातर भक्तोंके हृदयसे प्रस्फुटित प्रस्रवन है। सङ्कीर्तनके समान विरहोत्सव और नहीं है। इसलिये श्रीचैतन्यदासगण अन्यान्य सम्भोग-गन्धमय साधनोंका परित्याग करके एकमात्र 'सङ्कीर्तन'को ही साधन और साध्य कहकर निरूपण करते हैं॥७६॥ सेइ त' सुमेधा, आर कुबुद्धि संसार। सर्व-यज्ञ हैते कृष्णनामयज्ञ सार॥७७॥ जड़कर्मके साथ श्रीनामप्रभुका समान-ज्ञान पाषण्डता :- कोटि अश्वमेध एक कृष्ण-नाम सम। येइ कहे, से पाषण्डी, दण्डे तारे यम॥७८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७-७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो सङ्कीर्त्तन यज्ञके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यका भजन करते हैं, वे ही सुमेधा अर्थात् सुबुद्धिवाले हैं और संसारमें जो लोग उनका इस प्रकार भजन नहीं करते हैं, वे लोग नितान्त मन्दबुद्धिवाले हैं। श्रीकृष्णनाम-यज्ञ सभी यज्ञोंका सार है। करोड़ों अश्वमेध-यज्ञोंके साथ भी एक श्रीकृष्णनामकी तुलना नहीं हो सकती। जो दोनोंको समान समझता है, वह पाषण्डी है और उसे यमराजके दण्डका भागी बनना पड़ता है अर्थात् बार-बार जन्म-मरणके चक्रमें घूमना पड़ता है॥७७-७८॥ अनुभाष्य- “धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्वशुभ-क्रिया-साम्यमपि प्रमादः।” अर्थात् धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुद्ध कर्मोंको अप्राकृत भगवन्नामके समान या तुल्य समझना भी प्रमाद या असावधानी है, पद्मपुराणमें वर्णित दस नामापराधोंमें यह आठवाँ नामापराध सम्पूर्णरूपसे वर्जनीय है। “गो-कोटिदानं ग्रहणे खगस्य, प्रयाग-गङ्गोदक-कल्पवासः। यज्ञायुतं मेरुसुवर्णदानं, गोविन्दकीर्त्तनं समं शतांशैः।” (स्कन्द पुराण) अर्थात् “यदि कोई सूर्य या चन्द्र-ग्रहणके समय एक करोड़ गाय दान करता है, गङ्गा-यमुनाके सङ्गम-स्थल प्रयागमें एक कल्पतक वास करता है, दस हजार यज्ञ करता है और ब्राह्मणोंको सुमेरू पर्वतके समान ऊँचे स्वर्णके पर्वतका दान करता है, तो भी उसका फल श्रीगोविन्दके कीर्तनके सौवें भागके बराबर भी नहीं होता।”॥७८॥ अमृतानुकणिका-पद्मपुराणके पातालखण्डमें अश्वमेध यज्ञकी महिमाको अगस्त्य मुनि श्रीरामचन्द्रजीको बतलाते हुए कहते हैं-
१३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/७८ ] “एवं प्रकुर्वतः कर्म यज्ञः सम्पूर्णातां गतः। करोति सर्वपापानां नाशनं रिपुनाशनं ॥ ४/१९१॥” अर्थात् “यथाविधि इसका अनुष्ठान करनेसे समस्त पाप और शत्रु नष्ट हो जाते हैं।” अश्वमेध यज्ञ वेदोंके कर्मकाण्ड विधानके अन्तर्गत है। कर्मकाण्डके अनुष्ठानमें मन्त्रोंके उच्चारणमें स्वरादि-भ्रंशजनित त्रुटि, तन्त्रोक्त विधानके क्रमभङ्गजनित त्रुटि, देश-काल-पात्रादिकी त्रुटि, वस्तु और दक्षिणादि विषयक त्रुटि-ऐसी बहुतसी त्रुटियाँ होनेकी सम्भावना रहती है। इन समस्त त्रुटियोंका शोधन किये बिना कोई भी कर्म अपना फल प्रदान नहीं करता। इसलिये इन समस्त त्रुटियोंके शोधनके लिये प्रत्येक वैदिक अनुष्ठानके पश्चात् ‘अच्छिद्र-मन्त्र’के पाठका विधान है। यह अच्छिद्र मन्त्र भी हरिनाम-सङ्कीर्तनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। भागवत (८/२३/१६) में शुक्राचार्यकी भगवान् वामनदेवके प्रति उक्ति- “मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः। सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसङ्कीर्तनं तव॥” अर्थात् “हे भगवन्! मन्त्रोंकी, अनुष्ठान पद्धतिकी, देश, काल, पात्र और वस्तुकी समस्त त्रुटियाँका आपके नाम-सङ्कीर्तनसे शोधन हो जाता है; आपका नाम समस्त त्रुटियोंको पूर्ण कर देता है।” इससे समझा जा सकता हैं कि नाम-सङ्कीर्तनकी सहायताके बिना अश्वमेध यज्ञादिका फलदानके उपयोगी भावसे अनुष्ठित होनेकी सम्भावना अति अल्प है। और समस्त कर्मोंके फलदाता भी श्रीकृष्ण हैं, कर्म स्वयं फलदान करनेमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्ण और उनके नाममें कोई भेद नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णकी समस्त शक्ति उनके नाममें हैं, किसी यज्ञादिमें नहीं। इसलिये नाममें ही समस्त कर्मोंके फलदानकी अन्य-निरपेक्ष भावसे यथेष्ट शक्ति है। (हःभःविः ११/३९८-३९९, स्कन्दपुराण वचन)- “दानव्रततपस्तीर्थक्षेत्रादिनाश्च याः स्थितः। शक्तयो देव-महतां सर्वपापहराः शुभाः॥ राजसूयाश्वमेधानां ज्ञानस्याध्यात्मवस्तुनः। आकृष्य हरिणा सर्वाः स्थापिताः स्वेषु नामसु॥” अर्थात् “दान, व्रत, तपस्या, तीर्थयात्रादिके द्वारा जो पापसमूह विदूरित होते हैं, देवता और साधुसेवाके द्वारा जो सब पाप नष्ट होते हैं, राजसूय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञके द्वारा और तत्त्व अध्यात्म वस्तु लाभसे जो पापसमूह विनष्ट होते हैं, मङ्गलमय श्रीहरिने उन सब शुभदायिनी शक्तियोंको आकर्षण करके अपने नामोंमें प्रतिष्ठित किया है।” दान-व्रतादि, राजसूय-अश्वमेध यज्ञादिकी पापनाशक शक्तिका जो वर्णन इस श्लोकमें किया गया है, उससे समझा जा सकता है कि ये सभी अनुष्ठान पापोंके प्रायश्चितके लिये ही हैं। किन्तु इन समस्त कर्मकाण्ड-विहित प्रायश्चित करनेके बाद अनुष्ठानकारीको पापोंमें पुनः लिप्त होना देखा जाता है। इसलिये इन सब अनुष्ठानोंसे पाप करनेकी मूल वृत्तिका नाश नहीं होता। किन्तु शुद्ध हरिनामकी बात तो दूर, नामाभाससे ही समस्त पापोंका समूल नाश हो जाता है और पाप करनेके वृत्ति सदाके लिये दूर हो जाती है, अजामिलका चरित्र ही इसका प्रमाण तीसरा अध्याय | १३३
[ ३/७८-८२ है। किन्तु नामका यही एकमात्र फल नहीं है, एक शुद्ध श्रीकृष्णनामसे श्रीकृष्णप्रेम और श्रीकृष्णसेवा तक प्राप्त होते हैं, जो कोटि-कोटि अश्वमेध यज्ञोंके द्वारा भी सम्भव नहीं है॥७८॥ 'भागवतसन्दर्भ'-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे। ए श्लोक जीवगोसाञि करियाछे व्याख्याने॥७९॥ अनुवाद-जीवगोस्वामी पादने अपना स्वकृत ग्रन्थ 'भागवतसन्दर्भ' के मङ्गलाचरणमें निम्नलिखित श्लोकके द्वारा व्याख्या की है॥७९॥ तत्त्वसन्दर्भ (२)- अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं दर्शिताङ्गादिवैभवम्। कलौ सङ्कीर्त्तनाद्यैः स्म कृष्णचैतन्यमाश्रिताः॥८०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अङ्ग-उपाङ्गादि वैभवके द्वारा लक्षित भीतरमें साक्षात् श्रीकृष्ण और बाहर श्रीगौरस्वरूप श्रीकृष्णचैतन्यका कलियुगमें सङ्कीर्तनादि अङ्गोंके द्वारा हम आश्रय ग्रहण करते हैं॥८०॥ अनुभाष्य-श्रीजीवगोस्वामीने 'कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं' श्लोकको 'भागवत-सन्दर्भ' (षट्सन्दर्भ) के मङ्गलाचरणमें लिखा है। इसके अनुरूप उनके द्वारा रचित श्लोक-'अन्तःकृष्णं बहिर्गौरम्'-मङ्गलाचरणका दूसरा श्लोक है और यह भागवतमें वर्णित करभाजनके श्लोककी व्याख्यामात्र है। षट्सन्दर्भकी अनुव्याख्या 'सर्वसंवादिनी' ग्रन्थके प्रारम्भमें इसका तात्पर्य वर्णित हुआ है। अन्तःकृष्णं (अन्तर्मध्ये चित्ताभ्यन्तरे कृष्णो यस्य तं, राधा हृदयभावेन आवृतकृष्णहृद्गत-नागरभावं) बहिर्गौरं (देहकान्तिकिरणैः पीतवर्णविग्रहं) दर्शिताङ्गादिवैभवं (दर्शितं प्रकटितं अङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदवैभवं येन तं) कृष्णचैतन्यं कलौ सङ्कीर्तनाद्यैः (नामसङ्कीर्तनयज्ञाद्यैः) [वयम्] आश्रिताः स्म। श्लोक-भावानुवाद-वे जो चित्तमें भीतरसे श्रीकृष्ण हैं और श्रीकृष्णके हृदयगत-नागरभाव अभी राधाजीके हृदयके भावोंसे आवृत हैं, बाहरसे देहकान्तिकी किरणोंसे पीतवर्ण विग्रहवाले हैं, जो अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदादि वैभवको प्रकट कर रहे हैं, उन श्रीकृष्णचैतन्यके कलियुगमें नामसङ्कीर्तन यज्ञादिके द्वारा हम आश्रित होते हैं॥८०॥ उपपुराणेह शुनि श्रीकृष्णवचन। कृपा करि व्यास प्रति करियाछेन कथन॥८१॥ अनुवाद-उपपुराणोंमें भी श्रीकृष्णका यह वचन सुना जाता है, जो उन्होंने कृपा करके व्यासजीको कहा है॥८१॥ उपपुराण- अहमेव क्वचिद् ब्रह्मन् संन्यासाश्रममाश्रितः। हरिभक्तिं ग्राहयामि कलौ पापहतान्नरान्॥८२॥ १३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/८२-८४ ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ब्रह्मन् ! किसी विशेष कलियुगमें मैं संन्यासाश्रमको ग्रहणकर पापोंसे रहित मनुष्योंको हरिभक्ति प्रदान करूँगा॥८२॥ अनुभाष्य-किसी उपपुराणमें यह श्लोक मिलता है- हे ब्रह्मन्, अहं (भगवान्) एव क्वचित् कलौ (वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंश-चतुर्युगीय-कलियुगे प्रथम- सन्ध्यायां) संन्यासाश्रमं (तुर्याश्रमं) आश्रितः सन् (अवलम्ब्य) पापहतान् नरान् हरिभक्तिं ग्राहयामि (दास्यामि)। श्लोक-भावानुवाद-हे ब्रह्मन् ! मैं स्वयं-भगवान् कृष्ण ही किसी कलियुग [वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगकी प्रथम संध्यामें] चतुर्थ आश्रम संन्यासका अवलम्बन करके निष्पाप मनुष्योंको हरिभक्ति दूँगा॥८२॥ गौरसुन्दरकी स्वयं भगवत्ता-विषयमें शब्दप्रमाण :- भागवत, भारतशास्त्र, आगम पुराण। चैतन्य-कृष्ण-अवतार प्रकट प्रमाण ॥ ८३ ॥ अनुवाद-श्रीमद्भागवत, महाभारत, वेदों और पुराणोंमें श्रीकृष्णचैतन्य अवतारके स्पष्ट प्रमाण हैं॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भागवतमें “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं”, “आसन वर्णास्त्रयो”, “छन्न कलौ” आदि वाक्योंसे; महाभारतमें “सम्भवामि युगे युगे”, “संन्यासकृत् शमः शान्तः” आदि वचनोंसे; “महान प्रभुर्वे पुरुषः” “यदा पश्यः पश्यति रुक्मवर्णं” आदि वेदवाक्योंसे; “मायापुरे भविष्यामि शचीसुतः” आदि आगम-अनुगत अनेक तन्त्रवाक्योंसे और “अहमेव” आदि उपपुराणोंके वाक्योंसे श्रीचैतन्यकृष्णका साक्षात् अवतार होना प्रमाणित हुआ है॥८३॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/२२ का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाण :- प्रत्यक्षे देखह नाना प्रकट प्रभाव। अलौकिक कर्म, अलौकिक अनुभाव ॥ ८४ ॥ अनुवाद-उनकी अलौकिक लीला और उनके अलौकिक अनुभावोंके द्वारा प्रकटित उनके प्रभावको प्रत्यक्ष रूपसे देखा जा सकता है॥८४॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुका लीलासार्मथ्य, उनका लोकातीत आचरण और लोकातीत महिमा-प्रभाव-वैचित्र्य स्वयं अपनी इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष देखनेपर ही शास्त्रोंका लक्ष्य श्रीगौर स्वयं श्रीकृष्ण हैं, यह समझा जा सकता है॥८४॥ अमृताणुकणिका-प्रश्न हो सकता है-श्रीकृष्ण कलियुगमें श्रीगौररूपमें अवतीर्ण हुए हैं, शास्त्र प्रमाणके अनुसार उसे तो स्वीकार किया जा सकता है, परन्तु नवद्वीपमें जो अवतीर्ण हुए हैं, क्या वे ही ये शास्त्रकथित श्रीकृष्णचैतन्य हैं? इसके उत्तरमें कहते हैं-नवद्वीप-विहारी श्रीकृष्णचैतन्य ही वे शास्त्रकथित कलि-अवतार हैं, इसके अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। १)-शास्त्रोंमें कलि-अवतारके जो समस्त प्रभावोंका वर्णन है, नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यका भी वैसा प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। २)-नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यने वनके पशु-पक्षी तकको तीसरा अध्याय | १३५
[ ३/८४-८६ प्रेमदानरूप जो समस्त अलौकिक कर्म किये, वे स्वयं श्रीकृष्णके अतिरिक्त और किसीके लिये सम्भव नहीं हैं। ३)—नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीअङ्गोंमें जो समस्त प्रेम-विकारादि दिखलायी दिये, वे किसी जीवके पक्षमें तो दूरकी बात है, अन्य किसी भगवत्-स्वरूपके पक्षमें भी सम्भव नहीं है; वास्तवमें राधा-भाव-द्युति-सुवलित श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीके भी पक्षमें सम्भव नहीं है। शास्त्रकथित लक्षणोंके साथ मिलाकर अवतारकी भगवत्ता-निर्धारण-विषयमें भक्तोंकी अनुभूति ही मुख्य प्रमाण है। भक्तिके प्रभावसे भक्तका चित्त गुणातीत निर्मलत्व प्राप्त करता है और भगवान्की कृपाशक्तिको धारण करनेकी योग्यता भी प्राप्त करता है। इस कृपाशक्तिके प्रभावसे ही भक्त भगवान्के रूप-गुण-लीलादिको यथार्थ अनुभव करनेमें सक्षम होता है, अन्य लोग नहीं। क्योंकि भक्तिदेवीकी कृपासे भक्तके चित्तसे सभी दोष दूर हो जाते हैं और वह दिव्यज्ञान लाभ करता है। (आदि २/८६)—“भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। आर्ष-विज्ञवाक्ये नाहि दोष एइसब।”॥८४॥ अधोक्षज-तत्त्व भोगनेत्रोंके द्वारा नहीं देखे जा सकते :— देखिया ना देखे यत अभक्तेर गण। उलूके ना देखे येन सूर्येर किरण॥८५॥ अनुवाद—जैसे उल्लू सूर्यको ना देख पानेके कारण उसके अस्तित्वको नकार देता है, वैसे अभक्त लोग भी इस लीलावैचित्र्यको देखकर भी अनदेखा करते हैं॥८५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘उलूक’—सूर्यके प्रकाशमें देखनेमें असमर्थ उल्लू। सूर्यके किरणोंको देखनेमें सक्षम ना होनेके कारण वह सूर्यके अस्तित्वको स्वीकार नहीं कर पाता है॥८५॥ अमृताणुकणिका—दिनके समय उल्लू जैसे वृक्षके छिद्रमें रहकर उसके बाहर सूर्यकिरणको नहीं देखता और अपनी आँख बन्दकर भीतर ही रहता है, वैसे ही जो अभक्त हैं, संसार-आसक्तिवशतः संसारके छिद्रमें ही आबद्ध रहकर वे भी विषयोंसे अतीत श्रीभगवत्-अनुभव लाभ नहीं कर पाते; संसार-सुखसे मुग्ध होकर भगवत्-अनुभव लाभ करनेकी चेष्टा भी नहीं करते। उल्लूको जैसे अन्धकारमें रहना अच्छा लगता है, वैसे ही अभक्त लोगोंको भी अज्ञान-अन्धकारमें ही रहना अच्छा लगता है॥८५॥ आलवन्दारु यामुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (१५)— त्वां शीलरूपचरितैः परमप्रकृष्टैः सत्त्वेन सात्त्विकतया प्रबलैश्च शास्त्रैः। प्रख्यातदैवपरमार्थविदां मतैश्च नैवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति बोद्धुम्॥८६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! आपके अवतार-तत्त्वज्ञ परमार्थको जाननेवाले व्यासादि भक्त प्रबल सात्त्विक शास्त्रोंके द्वारा (और) आपके शील-स्वभाव, रूप, चरित्र एवं परम सात्त्विकभावको लक्ष्य करके आपको जान पाते हैं, किन्तु रजो और तमोगुण प्रधान आसुरिक प्रकृतिवाले जीव आपको पहचाननेमें समर्थ नहीं हो पाते॥८६॥ १३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/८६-८९ ] अनुभाष्य—श्रीरामानुजाचार्यके गुरु और परमगुरु श्रीयामुनाचार्य, जिनका दूसरा नाम आलवन्दारु है, उन्होंने अपने द्वारा रचित स्तोत्ररत्नके पन्द्रहवें और अठारहवें, दो श्लोकोंमें भगवान्की महिमा और ऐश्वर्यका वर्णन किया है— हे भगवन्! परमप्रकृष्टैः (सर्वोत्कृष्टतमैः) शीलरूपचरितैः (शीलं रूपाणि च चरितानि च तैः) सत्त्वेन (अलौकिक प्रभावेण) सात्त्विकतया (सत्त्वप्रधानतया) प्रबलैः शास्त्रैः प्रख्यातदैवपरमार्थविदां (प्रसिद्धं दैवं परमार्थञ्च विदन्ति ये तेषां) मतैश्च आसुर-प्रकृतयः (दुर्बुत्ताः भक्तद्रोहिनः) त्वां बोद्धुं (ज्ञातुं) न प्रभवन्ति (समर्थाः भवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८६॥ किन्तु भक्तके प्रेमसे अजित भगवान्को भी जीता जाता है, वैकुण्ठको मापा जा सकता है :— आपना लुकाइते कृष्ण नाना यत्न करे। तथापि ताँहार भक्त जानये ताँहारे॥८७॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीकृष्ण अपने आपको छिपानेके लिये बहुत प्रयत्न करते हैं, तथापि उनके भक्त उनको पहचान लेते हैं॥८७॥ आलवन्दारु यामुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (१८)— उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमातिशायि सम्भावनं तव परिव्रढ़िम-स्वभावम्। मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः॥८८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! देश, काल और चिन्तन—इन तीन सीमाओंके द्वारा सभी वस्तुएँ आबद्ध हैं, किन्तु आपका गूढ़स्वभाव असमोर्ध्व और अद्वितीय होनेके कारण उक्त तीन प्रकारकी सीमाओंका अतिक्रमणकर वर्तमान है। आप अपनी मायाके द्वारा इस स्वभावको आच्छादित करते हैं, किन्तु आपके अनन्यभक्त सदा आपका दर्शन करनेमें सक्षम होते हैं॥८८॥ अनुभाष्य—उल्लङ्घित-त्रिविध-सीम-समातिशायि-सम्भावनं (उल्लङ्घिता अतिक्रान्ता त्रिविधानां देशकालद्रव्यानां सीमा समा अतिशायिनी च सम्भावना च येन तं) भवता मायाबलेन (स्वयोगमायासामर्थ्येन) निगुह्यमानं अपि तव परिब्रढ़िम-स्वभावं (परिब्रढ़िम्नः प्रभुत्वस्य स्वभावं स्वरूपं) केचित् त्वदनन्यभावाः (त्वयि अनन्यभावाः एकान्तभक्ताः) अनिशं (निरन्तरं) पश्यन्ति। श्लोक-भावानुवाद—जिनके समान अथवा अधिक होनेकी किसीकी कोई सम्भावना नहीं है, वे आप देश-काल-द्रव्य इन तीन प्रकारकी सीमाओंका उल्लङ्घन करके अपनी योगमायाके बलसे अपनेको गोपनीय रखनेका प्रयास करते हैं, तो भी आपके गूढ़ स्वभाव या स्वरूपको आपके अनन्य भक्त निरन्तर देखते हैं॥८८॥ अधोक्षज—भक्तिके द्वारा प्राप्य, इन्द्रियोंके ज्ञानसे अतीत :— असुरस्वभाव कृष्णे कभु नाहि जाने। लुकाइते नारे कृष्ण भक्तजन-स्थाने॥८९॥ तीसरा अध्याय | १३७
[ ३/८९-९४ अनुवाद-असुर स्वभाववाले व्यक्ति कभी भी श्रीकृष्णको जान नहीं पाते, किन्तु श्रीकृष्ण भक्तोंसे स्वयंको छिपा नहीं पाते हैं॥८९॥ पद्मपुराण- द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। विष्णुभक्तः स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः॥९०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस जगत्में 'दैव' और 'असुर' भेदसे दो प्रकारके लोगोंकी सृष्टि हुई है। विष्णुभक्त 'दैव' कहलाते हैं और जो विष्णुभक्त नहीं हैं, वे लोग उनके विपरीत अर्थात् आसुरी स्वभावके हैं॥९०॥ अनुभाष्य-अस्मिन् लोके दैवः आसुरश्च एव द्वौ भूतसर्गौ (प्राणीसृष्टी) - विष्णुभक्तः (हरिजनः) दैवः स्मृतः, तद्विपर्ययः (मायाभोगनिरतः) आसुरः (प्रकृतिजनः) एव। श्लोक-भावानुवाद-इस जगत्में देव और असुर, इन दो प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि हुई है। हरिका भजन करनेवाले हरिके जन देव कहलाते हैं, (इसके विपरीत) मायाके भोगोंमें रत असुर ही हैं॥९०॥ भक्तावतार कहनेसे ही आचार्यका गौरावतारण-सामर्थ्य :- आचार्य गोसाञि प्रभुर भक्त-अवतार। कृष्ण-अवतार हेतु याँहार हुङ्कार॥९१॥ स्वयंरूपावतारके पूर्व गुरुवर्गरूप सेवकगणोंका प्राकट्य :- कृष्ण यदि पृथिवीते करेन अवतार। प्रथमे करेन गुरुवर्गेर सञ्चार॥९२॥ पिता माता गुरु आदि यत मान्यगण। प्रथमे करेन सबार पृथिवीते जनम॥९३॥ माधव-ईश्वर-पुरी, शची, जगन्नाथ। अद्वैत आचार्य प्रकट हैला सेइ साथ॥९४॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य भगवान्के भक्त-अवतार हैं और उनकी हुङ्कारके कारण ही श्रीकृष्णने अवतार ग्रहण किया। जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वीपर अवतरित होते हैं, तो वे पहले अपने गुरुवर्गोंको प्रकटित कराते हैं। पिता-माता तथा गुरु आदि जितने भी गुरुजन हैं, ये सब पहले पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करते हैं। श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, शचीमाता और जगन्नाथ मिश्र-ये सभी श्रीअद्वैताचार्यके साथ ही प्रकट हुए॥९१-९४॥ अमृतानुकणिका-श्रीअद्वैताचार्य जीव-तत्त्व नहीं हैं, कारणोदशायी पुरुषके एक स्वरूप होनेके कारण वे ईश्वर-तत्त्व हैं। वे जगत्में अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये वे अवतार हैं। किन्तु भगवदावतार होनेपर भी उन्होंने ईश्वर-भावको नहीं प्रकट किया, अपितु सदा भक्तभावको ही प्रकट किया, भक्तके समान आचरण किया और उनकी अनुभूति भी वैसी ही थी। इसलिये उनको महाप्रभुका भक्तावतार कहा गया है। १३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/९१-९६ ] भगवान् दो प्रकारसे अवतीर्ण होते हैं-सद्वारक और अद्वारक। जब भगवान् मनुष्यके समान पिता-माताके द्वारा आविर्भूत होते हैं, तब इस प्रकारके अवतारको सद्वारक कहा जाता है, पिता-माता उन अवतारके द्वार स्वरूप हैं। श्रीराम-श्रीकृष्ण-श्रीवामनादि सद्वारक अवतार हैं। पिता-माताकी अपेक्षा नहीं रखकर भगवान् जब स्वयं अवतीर्ण होते हैं, तब उन्हें अद्वारक कहा जाता हैं-मत्स्य, कूर्म, नृसिंहादि अद्वारक अवतार हैं। भगवान् जब नरलीला प्रकट करते हैं, तब पिता-माताके योगसे मनुष्यके समान जन्मलीला प्रकट करते हैं। अवश्य ही प्रकटलीलामें भगवान्के जो माता-पिता होते हैं, वे भी साधारण मनुष्य नहीं होते, वे भगवान्की सन्धिनी-शक्तिका परिणाम हैं, अनादिकालसे ही वे उनके माता-पितारूपमें विराजमान हैं। अप्रकटलीलामें उनका मातृत्व और पितृत्व गर्भधारण अथवा जन्मदानके लिये नहीं है, वहाँ भगवान्का जन्म ही नहीं है, उनके मातृत्व और पितृत्वका अभिमान मात्र उनके चित्तमें अनादिकालसे विराजित है। इसलिये भगवान् पहले अनादिसिद्ध पिता-माताको जगत्में अवतीर्ण कराते हैं और बादमें उनके चित्तमें प्रविष्ट होकर जन्मलीला प्रकट करते हैं, प्रकटलीलामें भी भगवान्का साधारण मनुष्यके समान शौक्र जन्म नहीं होता। श्रीमन्महाप्रभु भी सद्वारक अवतार हैं और पिता-माताके योगसे अवतीर्ण होकर उन्होंने नरलीला प्रकट की। प्रकटलीलामें भी उनका श्रीविग्रह प्राकृत अस्थि-मांस-मज्जाके द्वारा गठित नहीं होता, वह नित्य चिन्मय कलेवर ही होता है॥९१-९४॥ अवतरणसे पूर्व तात्कालिक समाजकी अवस्था :- प्रकटिया देखे आचार्य सकल संसार। कृष्णभक्तिगन्धहीन विषय-व्यवहार ॥ ९५ ॥ केह पापे, केह पुण्ये करे विषयभोग। भक्तिगन्ध नाहि, याते याय भवरोग ॥ ९६ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने पहले प्रकट होकर देखा कि सारा संसार श्रीकृष्ण-भक्तिसे शून्य है और सभी लोग विषय भोगोंमें रत हैं। उस समय कोई पाप कार्योंके द्वारा और तो कोई पुण्य कार्योंके द्वारा विषयोंको भोग कर रहे थे। किन्तु जिसके द्वारा यह भवरोग दूर होता है, उस श्रीकृष्णभक्तिकी गन्धतक भी उनमें नहीं थी ॥ ९५-९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साक्षात् भगवान्ने अवतीर्ण होनेसे पहले ही 'गुरुवर्गेर सञ्चार' अर्थात् पृथ्वीपर गुरुवर्गोंको जन्म ग्रहण करवाया। अन्यान्य गुरुवर्गोंके साथ श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, श्रीशची, श्रीजगन्नाथ, श्रीअद्वैताचार्य प्रकट हुए। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने प्रकट होकर देखा कि समस्त संसार ही पाप-पुण्य कार्योंमें लगा है और उनमें श्रीकृष्णभक्ति है ही नहीं। सभी जीव विषयभोग कर रहे हैं, किन्तु जिससे भवरोग दूर होता है, उस श्रीकृष्णभक्तिको वे अपने कार्योंके साथ नहीं कर रहे हैं॥ ९२-९६॥ अमृतानुकणिका—अच्युत भक्तिरहित सत्कर्म हो, अथवा नैष्कर्म्य ही हो, ज्ञान ही हो, अथवा अज्ञान ही हो; नीति ही हो अथवा दुर्नीति ही हो, कोई भी संसाररूपी दावाग्निके हाथोंसे जीवका उद्धार नहीं कर सकते। तथाकथित परोपकार अथवा महाराज भरतके समान असहाय, निरीह मृगशावकके प्रति सात्त्विक दयारूपी सत्कर्म हो, किन्तु वह संसारसे मुक्त नहीं कर सकता। तीसरा अध्याय | १३९
[ ३/९५-१०० नैष्कर्म्यवादी जीवन्मुक्त मुनि-ऋषियोंकी संसार-वासना उत्पत्तिकी कथा सुनी जाती है। यथा (वासनाभाष्यधृत श्रीभगवत्-परिशिष्ट-वचन)- “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्बन्धनं यान्ति कर्मभिः। यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ भगवत्यपराधिनः ॥” अर्थात् “अचिन्त्य महाशक्तिसम्पन्न श्रीभगवान्के निकट अपराध करनेपर अर्थात् उनमें नित्य भक्ति परित्याग करनेपर जीवन्मुक्त व्यक्ति भी अपने कर्मोंके द्वारा पुनः बन्धनको प्राप्त करते हैं।” ज्ञानी, योगीगण भी भगवद्भक्तिरहित होनेपर संसारको जय नहीं कर पाते, इस बातके सैकड़ों प्रमाण शास्त्रोंमें पाये जाते हैं। यथा भागवत (१०/२/३२)- “येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥” अर्थात् “यदि कोई कहे कि भगवत्-चरणाश्रयकी क्या आवश्यकता है? शुष्कज्ञानके द्वारा ही तो भव-सागरको पार किया जा सकता है! इसके उत्तरमें कहते हैं-हे कमललोचन! आपके भक्तोंके अतिरिक्त अन्य जो व्यक्ति स्वयंको 'मुक्त' मानकर अभिमान करते हैं, आपके प्रति उनकी प्रीति नहीं रहनेके कारण वे मलिनचित्तवाले हैं। वे व्यक्ति अतिशय कष्ट उठाकर किसी प्रकार मोक्षके निकट तक पहुँचनेपर भी आपके चरणकमलोंका अनादर करनेके कारण वहाँसे गिर जाते हैं।” तात्पर्य यह है कि ज्ञानी लोग अपने आपको बहुत कष्टसाध्य तपस्याके प्रभावसे जीवन्मुक्त माननेपर भी और अति उन्नत पदवीपर आरूढ़ होनेपर भी 'मैं ही ब्रह्म हूँ'-ऐसा विचार करके भगवान्की भक्ति परित्याग करके अधःपतित हो जाते हैं। भागवत (४/२३/१२)- “तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात्॥” अर्थात् “मुमुक्षु व्यक्ति जब तक गदाग्रज श्रीहरिकी कथामें अनुराग प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक वे केवल योगादि साधनोंके द्वारा दूसरे विषयोंसे अनासक्त नहीं हो सकते॥” ९५-९६॥ आचार्यकी जीवोंके लिये दया-विषयक चिन्ता :- लोकगति देखि' आचार्य करुण-हृदय। विचार करेन, लोकेर कैछे हित हय॥९७॥ आपनि श्रीकृष्ण यदि करेन अवतार। आपने आचरि' भक्ति करेन प्रचार॥९८॥ नाम बिनु कलिकाले धर्म नाहि आर। कलिकाले कैछे हवे कृष्ण अवतार॥९९॥ शुद्धभावे करिब कृष्णेर आराधन। निरन्तर सदैन्ये करिब निवेदन॥१००॥ १४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/९७-१०३ विष्णुके द्वारा ही विष्णुका अवतरण; इसलिये उन्हें अद्वैत कहा है :- आनिया कृष्णेरे करों कीर्त्तन सञ्चार। तबे से 'अद्वैत'-नाम सफल आमार॥१०१॥ कृष्ण वश करिबेन कोन् आराधने। विचारिते एई श्लोक आइल ताँर मने॥१०२॥ अनुवाद—लोगोंकी इस प्रकार गतिविधियोंको देखकर श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका हृदय करुणासे भर गया और किस प्रकार इन लोगोंका कल्याण हो, यह विचार करने लगे। यदि श्रीकृष्ण स्वयं अवतार ग्रहण करें, तो वे स्वयं आचरण करके इस भक्तिका प्रचार कर सकते हैं। कलिकालमें हरिनामके अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं है, किन्तु कलिकालमें श्रीकृष्णका अवतार कैसे होगा? इसलिये मैं श्रीकृष्णकी शुद्धभावसे आराधना करूँगा और दीनतापूर्वक निरन्तर उनसे अवतीर्ण होनेका निवेदन करूँगा। यदि मैं श्रीकृष्णको अवतीर्ण कराकर जगत्में श्रीकृष्णकीर्त्तनका सञ्चार कर पाऊँगा, तभी मेरा 'अद्वैत'-नाम सफल होगा। कौनसी आराधनासे श्रीकृष्णको वशीभूत किया जा सकता है, इसपर विचार करते-करते उनके मनमें यह श्लोक आया॥९७-१०२॥ भक्तके आत्मनिवेदनसे ही अजितकी पराजय :- विष्णुधर्म-वचन और गौतमीय-तन्त्र-वाक्य- तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः ॥१०३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तुलसीदल और चुल्लूमात्र जल उनको भक्तिपूर्वक अर्पण करनेसे श्रीकृष्ण अपने भक्तवात्सल्य गुणके कारण स्वयंको भक्तके हाथोंमें बेच देते हैं। किसी-किसी संस्करणमें ये दो श्लोक भी देखे जाते हैं,- “साग्रजं तुलसीपत्रं द्विदलं क्षुद्रमेव च। मञ्जरी सा तु विख्याता प्रशस्ता कृष्णपूजने ॥” अर्थात् “डण्ठलके साथ जुड़े हुए दो छोटे ही तुलसीके पत्र तथा उनमें जुड़ी हुई प्रसिद्ध मञ्जरी श्रीकृष्ण पूजनमें प्रशस्त (महिमायुक्त) माने गये हैं।” यथा राधा प्रिया विष्णोस्तथा च मञ्जरी हरेः। तस्माद्दद्यात् प्रयत्नेन चन्दनेन तु मिश्रिताम्॥” अर्थात् “जैसे राधाजी श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, उसी प्रकार मञ्जरी भी उनकी प्रिया हैं, अतः प्रयत्नपूर्वक चन्दनसे मिश्रित मञ्जरी उन्हें प्रदान करनी चाहिये॥” १०३॥ अनुभाष्य-भक्तवत्सलः (निजजनरतः भगवान्) तुलसीदलमात्रेण (चन्दन-मन्त्रादिकं बिना केवलतुलसीपत्रेण) जलस्य चुलुकेन (गण्डूषेण) वा (च) भक्तेभ्यः आत्मानं विक्रीणीते (तदायत्तं करोति)। श्लोक-भावानुवाद-अपने भक्तोंके ध्यानमें रत भगवान्, चन्दन और मन्त्रादिके बिना भी केवल तुलसीपत्र और चुल्लूभर जलके विनिमयमें स्वयंको भक्तोंके आधीन कर देते हैं॥१०३॥ तीसरा अध्याय | १४१
[ ३/१०४-१०७ एइ श्लोकार्थ आचार्य करेन विचारण। कृष्णके तुलसीजल देय येइ जन ॥ १०४॥ तार ऋण शोधिते कृष्ण करेन चिन्तन। 'जल-तुलसीर सम किछु घरे नाहि धन' ॥ १०५॥ तबे आत्मा बेचि' करे ऋणरे शोधन। एत भावि' आचार्य करेन आराधन ॥ १०६॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य इस श्लोकके अर्थपर विचार करने लगे। यदि कोई श्रीकृष्णको तुलसी और जल देता है, तो श्रीकृष्ण उस ऋणका शोधन करनेके लिये चिन्ता करने लगते हैं कि जल और तुलसीपत्रके समान तो मेरे पास कुछ भी धन नहीं है। तब वे अपने-आपको बेचकर अर्थात् उस भक्तके वशीभूत होकर उस ऋणसे मुक्त होते हैं। ऐसा विचार करके श्रीअद्वैताचार्य श्रीकृष्णकी आराधना करने लगे॥१०४-१०६॥ गङ्गाजले तुलसीमञ्जरी अनुक्षण। कृष्णपादपद्म भावि' करे समर्पण ॥ १०७॥ अनुवाद-वे श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते हुए गङ्गाजलके साथ तुलसीमञ्जरी अनुक्षण अर्पण करने लगे॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो भक्त श्रीकृष्णको जल-तुलसी देते हैं, श्रीकृष्ण उनका ऋण चुका ना पानेके कारण स्वयंको उसके बदलेमें देकर ऋणका शोधन करते हैं। इसलिये श्रीअद्वैताचार्य श्रीकृष्णके साक्षात् स्वरूपको अवतीर्ण करानेके लिये गङ्गाजल तुलसीमञ्जरीके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें अर्पण करने लगे॥१०६-१०७॥ अमृताणुकणिका-'तुलसीमञ्जरी'-तुलसीके कोमल बीज-मुकुलको मञ्जरी कहते हैं। श्रीकृष्णकी पूजाके लिये मञ्जरीके दोनों ओर दो कोमल पत्तियोंके साथ मञ्जरीका चयन करना चाहिये। महाप्रभुका श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको गोवर्धन-शिलार्चन निर्देश (अन्त्य ६/२९७)- “दुइदिके दुइपत्र-मध्ये कोमल मञ्जरी। एइमत अष्टमञ्जरी दिबे श्रद्धा करि' ॥” अर्थात् “दोनों ओर दो पत्तियोंके सहित मञ्जरीका चयन करना और इस प्रकार प्रतिदिन श्रद्धाके साथ आठ मञ्जरियोंसे श्रीगोवर्धन शिलाका पूजन करना।" इससे जाना जा सकता है कि श्रीकृष्णपूजामें तुलसी मञ्जरीका अत्यन्त महत्व है। शास्त्रोंमें अन्यान्य स्थानोंपर भी तुलसी मञ्जरीका महत्व वर्णित है। द्वारका माहात्म्यमें मार्कण्डेय-इन्द्रद्युम्न संवाद (हःभःविः ७/२७९)- “यथा लक्ष्मीः प्रिया विष्णोस्तुलसी च ततोऽधिका।” अर्थात् "लक्ष्मी जिस प्रकार श्रीविष्णुकी प्रिया हैं, तुलसी उससे भी अधिक प्रिया हैं।" कृष्णपादपद्म भावि'- श्रीकृष्णके श्रीचरणोंका चिन्तन करते हुए। श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें तुलसी प्रदान करनेके समय इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये, जैसे श्रीकृष्णचरणके सान्निध्यमें उपस्थित हैं और साक्षात् भावसे उनके श्रीचरणोंमें तुलसी अर्पण कर रहे हैं। अन्यान्य उपचार अर्पणके समय भी इसी प्रकार चिन्ता करनी चाहिये। साक्षात्-भजनमें प्रवृत्तियुक्त भजनको 'सासङ्ग-भजन' १४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१०७-११० ] कहते हैं और साक्षात्-भजनमें प्रवृत्तिहीन भजनको 'अनासङ्ग-साधन' कहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्व १/२०)—“साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या सुचिरादपि।” अर्थात् अनासङ्ग साधनोंको चिरकालतक करते रहनेपर भी हरिभक्ति प्राप्त नहीं होती। (आदि ८/१६)—“बहु जन्म करे यदि श्रवण, कीर्त्तन। तबु त' ना पाय कृष्णपदे प्रेमधन॥” अर्थात् “[अपराधके साथ] अनेक जन्मों तक भी यदि श्रवण, कीर्त्तनादि नवधा भक्तिके अङ्गोंका अनुष्ठान किया जाय, तो भी [नामके वास्तविक फल] श्रीकृष्ण-प्रेमधनकी प्राप्ति नहीं होगी॥”१०७॥ कृष्णेर आह्वान करेन करिया हुङ्कार। एमते कृष्णेरे कराइल अवतार ॥ १०८॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य हुङ्कार करके श्रीकृष्णका आह्वान करने लगे। इस प्रकार उन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाया॥१०८॥ श्रीकृष्णप्रेम-वितरणरूप भक्तकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये ही स्वयं-श्रीकृष्णकी श्रीगौरलीला :— चैतन्येर अवतारे एइ मुख्य हेतु। भक्तेर इच्छाय अवतारे धर्मसेतु ॥ १०९॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-चैतन्य अवतारका यह मुख्य कारण है। भक्तकी इच्छासे धर्मसेतु अर्थात् धर्मरक्षक श्रीभगवान् अवतार ग्रहण करते हैं॥१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्मके सेतुस्वरूप श्रीकृष्ण भक्तकी इच्छासे अवतीर्ण होते हैं। परमभक्त श्रीअद्वैताचार्यकी प्रार्थनासे श्रीचैतन्य महाप्रभुका अवतार हुआ॥१०९॥ अमृताणुकणिका—'धर्मसेतु'—सेतुका अर्थ है मेड़ अर्थात् खेतके चारों ओर मिट्टीका बनाया हुआ घेरा। खेतके चारों ओर मेड़ रहनेसे खेतकी उर्वरता-शक्ति आदिकी रक्षा होती है, इसलिये मेड़को क्षेत्ररक्षक कहते हैं। इस प्रकार सेतुका अर्थ रक्षक भी होता है, इसलिये धर्मसेतुका अर्थ हुआ धर्मरक्षक। सेतु जिस प्रकार बाहरके असमय जलादिसे खेतकी फसलकी रक्षा करता है और समयपर खेतमें भरे जलको फसलके लिये उसमें स्थिर रखकर फसलकी वृद्धिका आनुकूल्य करता है, उसी प्रकार जो शास्त्रनिषिद्ध आचरणको प्रवेश नहीं करने दें और शास्त्रविहित आचरणादिको जीवोंके मध्य प्रतिष्ठित करके धर्मकी रक्षा करें, वे ही धर्मसेतु अथवा धर्मरक्षक हैं। धर्मरक्षक भगवान् भक्तकी इच्छाको उपलक्ष्य करके धर्मरक्षार्थ जगत्में अवतीर्ण होते हैं॥१०९॥ श्रीमद्भागवत (३/९/११)— त्वं भक्तियोगपरिभावित-हृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्। यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ब्रह्माजी बोले,—“हे नाथ! आप भक्तोंके श्रवणपथ और नयनपथमें सदा विहार करते हैं। भक्तियोगके द्वारा पवित्र हुए उनके हृदयरूपी कमलमें आप सदा अवस्थान करते तीसरा अध्याय | १४३
[ ३/११०
हैं। हे उरुगाय! भक्तगण अपने हृदयमें आपके जिस-जिस नित्यस्वरूपकी भावना करते हैं, उनके प्रति अनुग्रह करके आप उस-उस स्वरूपको प्रकट करते हैं॥”११०॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये तृतीय परिच्छेदः। तृतीय अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—ब्रह्माजी तपस्याके द्वारा भगवान्के दर्शन और कृपा प्राप्त करके सृष्टि करनेकी इच्छासे स्तव कर रहे हैं— ननु हे नाथ (हे प्रभो) श्रुतेक्षितपथः (श्रुतं शास्त्रसिद्धान्त-श्रवणं तेन ईक्षितः दृष्टः पन्थाः यस्य सः) त्वं पुंसां भक्तियोग परिभावित-हृत्सरोजे (भक्तियोगेन प्रेम्णा परिभावितं योग्यतां आपादितं यत् हृत्सरोजं तस्मिन्) आस्से (तिष्ठसि)। ते धिया यद् यद् विभावयन्ति (चिन्तयन्ति), हे उरुगाय, (उरुधा एव गीयस इति उरुक्रम) सदनुग्रहाय (सतां भक्तानां अनुग्रहाय) तत् तत् वपुः (शरीरं) प्रणयसे (प्रकर्षेण तत्समीपे नयसि प्रकटयसि)। श्लोक-भावानुवाद—(निःसन्देह) हे प्रभो! शास्त्रसिद्धान्तोंका श्रवण और उनके दिखलाये पथपर जिनकी दृष्टि है, उनके प्रेमसे विभावित हृदयकमलमें आप विराजमान होते हैं। उनकी बुद्धि जिस-जिस रूपका चिन्तन करती है, हे उरुगाय! भक्तोंपर अनुग्रह करके उस-उस शरीरको प्रकृष्टरूपसे आप उनके समीप प्रकट करते हैं। [उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिनका स्तुतिगान किया जाता है, उन्हें उरुगाय अथवा उरुक्रम कहते हैं] ॥११०॥ इति अनुभाष्ये तृतीय परिच्छेदः। तृतीय अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृताणुकणिका—‘श्रुतेक्षित-पथ’—शास्त्रोंमें नाना प्रकारके साधन-पन्थोंका उल्लेख है; जो जिस भावसे भगवान्को पानेकी इच्छा करता है, वह शास्त्रोंसे उसके अनुकूल साधन-पन्थको ग्रहण करेगा। इस वाक्यका भाव यह है कि शास्त्रोंसे बहिर्भूत किसी भी मनोकल्पित साधनसे भगवत्प्राप्ति सम्भव नहीं है। भक्तिरसामृतसिन्धु-धृत-ब्रह्मयामल वचन (पूर्व २/१०१)— “श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते॥” अर्थात् “श्रुति, स्मृति, पुराण तथा पञ्चरात्रादि शास्त्रोंमें वर्णित विधिकी उपेक्षा करके ऐकान्तिक हरिभक्ति केवल उत्पातका ही कारण बनती है।” भक्तियोग-परिभावित-हृत्सरोज—भक्तियोगके द्वारा परिभावित हुआ हृदयरूप कमल अर्थात् भक्तियोगका अनुष्ठान करके साधकका हृदय कमलके समान निर्मल, कोमल और पवित्र हो जाय। साधनभक्तिका अनुष्ठान करते हुए अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, रति आदि सोपानोंको पार करते हुए चित्त जब परिभावित हो अर्थात् शुद्धसत्त्वके आविर्भावसे उज्ज्वलता धारण करके शुद्धसत्त्व-स्वरूप भगवान्के आविर्भावकी योग्यता लाभ करे, तभी उस हृदय-कमलमें श्रीभगवान् आविर्भूत होते हैं, उसके पूर्व नहीं। वे ऐसे हृदय कमलको कभी त्याग नहीं करते और सदा उसमें अवस्थान करते हैं। शास्त्रोंमें भगवान्के जिन-जिन रूपोंका वर्णन किया गया है, उनमेंसे भक्त निज बुद्धिके द्वारा जिन-जिन रूपोंका चिन्तन करते हैं, भक्तवत्सल भगवान् उन्हीं रूपोंको भक्तोंके समक्ष प्रकृष्ट
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