श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। सन्न्यासकृच्छमः शान्तः" इत्येतानि। दर्शितञ्चैतत् परमविद्वच्छिरोमणिना श्रीसार्वभौमभट्टाचार्येण— “कालात्नष्टं भक्तियोगं निजं यः प्रादुष्कर्तुं कृष्णचैतन्यनामा। आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥” इति सर्वसंवादिन्याम्। 'त्विषा' अर्थात् जिनकी कान्ति 'अकृष्ण' अर्थात् गौरवर्ण है, कलियुगमें बुद्धिमान लोग उनकी उपासना करते हैं। उनके इस गौरवर्णकी बात गर्गाचार्यजीने परोक्षरूपसे श्रीनन्दमहाराजसे कही, — 'तुम्हारा यह पुत्र प्रत्येक युगमें विग्रह धारण करता है। अन्य तीन युगोंमें यह शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंका था, अभी इसने कृष्णवर्णको धारण किया है।' इस वाक्यमें वर्णित चार वर्णोंमें शुक्ल, रक्त और श्यामवर्णके अतिरिक्त जो 'पीतवर्ण' है, उससे महाप्रभुके अवतारका प्रमाण पाया जाता है। 'इदानीं' अर्थात् वर्तमान अवतारकाल रूपमें वर्णित द्वापरयुगमें 'वे कृष्णवर्णको प्राप्त हुए हैं'—इस उक्तिके कारण और सत्यमें शुक्ल एवं त्रेतायुगमें रक्तवर्णकी प्राप्तिके कारण भगवान्के पूर्व-पूर्व कलियुगोंमें पीतवर्णधारी अवतारको लक्ष्य करके ही इस पीतवर्णका प्रयोग भूतकालमें हुआ है। यहाँपर श्रीकृष्णका युगावतारके रूपमें वर्णन हुआ है और उनके परिपूर्णरूपकी व्याख्या बादमें होगी कि सभी अवतार उन्हींमें समाहित हैं और सभी अवतारोंकी प्रयोजनीयता केवल एक उनसे ही सिद्ध होती है। इसी प्रकार जिस द्वापरमें श्रीकृष्ण अवतीर्ण होते हैं, उसी चतुर्युगके कलियुगमें ही श्रीगौरसुन्दर भी अवतीर्ण होते हैं—इस प्रकार तात्पर्य होनेसे ऐसा कह सकते हैं कि श्रीगौरसुन्दर ही श्रीकृष्णके आविर्भाव-विशेष हैं, यह सिद्ध होता है, क्योंकि इनके अवतार लेनेका क्रम कभी भङ्ग नहीं होता। श्रीगौरसुन्दरके अवतारकी बात ऋषिवर करभाजनने स्वयं उनके सम्बन्धमें कहे गये विशेषणके द्वारा व्यक्त की है, जैसे,—'कृष्णवर्णं'—'कृ' और 'ष्ण' ये दो वर्ण जिनमें अर्थात् जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यके मध्य कृष्णत्वसूचक इन दो वर्णोंका प्रयोग हुआ है। (इस प्रकारकी व्याख्या काल्पनिक नहीं है, इसलिये दृष्टान्तरूपमें कह रहे हैं) जैसे, श्रीधरस्वामीने अपनी टीकामें श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें उद्धवजीके द्वारा कहे गये 'समाहुता----' पद्यमें 'श्रियः सवर्णेन' अंशकी व्याख्या की है—'श्री अर्थात् रुक्मिणीजीके समान दो वर्ण जिनके वाचक हैं, वे रुक्मी।' (यहाँपर श्लोकका अर्थ इस प्रकार हुआ है—श्रीरुक्मिणी नामके समान दो वर्ण जिनके नामके मध्य हैं, उन्हीं रुक्मीके द्वारा राजागण आमन्त्रित हुए थे)। इसलिये जैसे 'श्रियः सवर्णः' कहनेसे 'रुक्मी' का बोध होता है, उसी प्रकार 'कृ' और 'ष्ण' वर्णोंसे श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुको समझना चाहिये। अथवा 'कृष्णवर्णं' पदसे सूचित होता है कि जो 'कृष्ण'-नामका 'वर्णन' करते हैं अर्थात् अपने परमानन्द-विलासके स्मरणजनित उल्लासवशतः स्वयं इस नामका कीर्तन करते हैं और परम करुणावशतः समस्त जीवोंको जो इस नामका उपदेश करते हैं, वे ही श्रीगौरसुन्दर हैं। अथवा वे स्वयं 'अकृष्ण' अर्थात् गौर होकर भी 'त्विषा' अर्थात् अपनी शोभाविशेषके द्वारा ही 'कृष्ण'-सम्बन्धमें उपदेशदाता हैं अर्थात् जिनके दर्शनसे सभीको श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुणादिकी स्फूर्ति होती है; किम्वा सभीकी दृष्टिमें वे 'अकृष्ण' अर्थात् गौर होनेपर भी भक्त-विशेषकी दृष्टिमें 'त्विषा' विशेषप्रकाशयोगसे 'कृष्णवर्णं' अर्थात् उनके जैसे श्यामसुन्दर रूपमें ही स्थित हैं, ये वही श्रीगौरसुन्दर हैं। इसलिये उनमें सभी प्रकारसे श्रीकृष्णरूपका ही प्रकाश होनेपर, ये श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं, यही भावार्थ है।
१२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत