श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 159, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीशङ्कराचार्यके समयसे बहुत पहले वर्तमान थे, तो भी स्वयंको निर्विशेषवादी वैदान्तिक कहनेवाले शङ्कराचार्यके प्रकट होनेपर भारतमें पञ्चोपासक-समाज पुनर्गठित हुआ। श्रीमन्महाप्रभुने श्रीशङ्कराचार्य-सम्प्रदायमें दशनामी एकदण्डि-संन्यासकी प्रथाके अनुसार वैदिक संन्यास ग्रहण किया। आर्यावर्त्तमें वैदिकाभास अर्थात् स्वयंको वेदानुग कहनेवाले बहुतसे आर्यसमाज शङ्कराचार्यके अनुगामी हैं और शाङ्करसम्प्रदायके शासनानुसार पञ्चोपासक हैं। “तीर्थाश्रमवनारण्यगिरिपर्वतसागराः। सरस्वती भारती च पुरी नामानि वै दशः॥” दशनामी संन्यासियोंके नाम इस प्रकार हैं—“तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती और पुरी।” प्रत्येकके संन्यासको, स्थानको और ब्रह्मचारीकी उपाधिको यथाक्रम लिखा हुआ है (मञ्जुषा दूसरी संख्या, पृष्ठ १०४-१०७ द्रष्टव्य है)। संन्यासकी उपाधि-तीर्थ और आश्रम; स्थान-द्वारका; ब्रह्मचारी नाम-स्वरूप। संन्यासकी उपाधि-वन और अरण्य; स्थान-पुरुषोत्तम (जगन्नाथ पुरी); ब्रह्मचारी नाम-प्रकाश। संन्यासकी उपाधि-गिरि, पर्वत और सागर; स्थान-बदरिकाश्रम; ब्रह्मचारी नाम-आनन्द। संन्यासकी उपाधि-सरस्वती, भारती और पुरी; स्थान-शृङ्गेरी; ब्रह्मचारीनाम-चैतन्य। श्रीशङ्कराचार्यने सम्पूर्ण भारतमें (पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण प्रदेशमें) चार मठ स्थापित करके अपने चार शिष्योंको उनका मठाधीश नियुक्त किया। इस चार मूलमठोंके अधीन असंख्य शाखामठोंका विस्तार हुआ। श्रीशङ्कराचार्यने चारों मठोंमें समान विचारधाराका निर्देश किया था, परन्तु अनेक क्षेत्रोंमें इसका विपर्यय दिखायी देता है। इन चार मठोंमें आनन्दवार, भोगवार, कीटवार और भूमिवार चार प्रकारके सम्प्रदाय हैं। समयके प्रभावसे इन सम्प्रदायोंकी धारणामें भी परिवर्तन दिखायी देता है। शङ्कर-सम्प्रदायके चार महावाक्योंके भी अलग-अलग मठके अनुसार विभाग हैं। संन्यास ग्रहणसे पहले मठाधीश संन्यासी गुरुके पास जाकर ब्रह्मचारी बनना होता है। जिस प्रकारके वे संन्यासी होते हैं, उसीके अनुसार 'ब्रह्मचारी' नाम देते हैं। यह प्रथा आज भी सम्प्रदायमें विशेषरूपसे चली आ रही है। केशव भारतीसे संन्यास ग्रहण करनेपर श्रीमन्महाप्रभुका ब्रह्मचारी नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' हुआ था। संन्यास ग्रहण करनेके बाद भी भगवान्ने अपने ब्रह्मचारी नामका ही प्रचार किया। उनके द्वारा संन्यासी नाम 'भारती' ग्रहण करके भी उस नामसे अपना परिचय देनेकी बात उनके किसी भी लीलालेखकने नहीं लिखी है। शङ्कर-सम्प्रदायमें संन्यास-नामके साथ स्वयंमें ईश्वर होनेका अभिमान (जीव ब्रह्म ही है) जुड़ा है, ऐसा जानकर उस प्रकारके व्यवहारका श्रीमन्महाप्रभुने आदर नहीं किया। 'ब्रह्मचारी' नाममें गुरुदास्यका अभिमान संयुक्त होनेके कारण वह भक्तिके प्रतिकूल नहीं है। महाप्रभुने दण्ड और कमण्डलु आदि संन्यासके चिह्नोंको ग्रहण किया था, ऐसा उल्लेख है॥३४॥ ताँर युगावतार जानि' गर्ग महाशय। कृष्णेर नामकरणे करियाछे निर्णय॥ ३५॥ अनुवाद-गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगके युगावतार रूपमें जानकर श्रीकृष्णके नामकरणके समय यह भविष्यवाणी की थी॥ ३५॥