भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

[ ३/३३-३४ डुभृञ् धातुर् अर्थ—पोषण, धारण। पुषिल, धरिल प्रेम दिया त्रिभुवन॥३३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘विश्वम्भर’ शब्द ‘डुभृञ्’ धातुसे बनता है। उस धातुका अर्थ पोषण और धारण करना है। महाप्रभुने अपना प्रेम देकर त्रिभुवनका पोषण किया और उसे धारण किया॥ ३३॥ अमृतानुक्रमणिका—पहले वराहावतारमें पृथ्वी जलमग्न होनेपर भगवन्नारायणने उसका उद्धारकर विश्वपालन किया, इसलिये भगवान्का नाम ‘विश्वम्भर’ हुआ। हयग्रीव अवतारके पूर्व जलमग्न पृथ्वीमें अधोक्षज वस्तुका परिचय विलुप्त होकर अक्षजज्ञानके समुद्रमें वेदशास्त्र डूब गये, तब भगवान् हयग्रीवने मधु और कैटभकी अक्षजज्ञानकी पहचान (स्मृतिचिह्न) और निसर्गवादका संहार करके अवतार-विचार वेदतात्पर्यरूपसे प्रचार किया था। तब भी उनका नाम ‘विश्वम्भर’ हुआ था। अनेक बार असुरोंके द्वारा देव-मानवादि सताये जानेपर नारायणके विभिन्न प्रकाशसमूह प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर विश्वकी रक्षा करते हैं, उन-उन अवतारोंका नाम भी ‘विश्वम्भर’ होता है। इसलिये महाप्रभुका नाम भी ‘विश्वम्भर’ रखना सङ्गत था। ये गौर-विश्वम्भर विष्णुके विभिन्न अवतारोंके दीपस्वरूप हैं। उनकी जन्मपत्रीसे भी कालविचारसे यह जाना जाता है कि वे स्वयंरूप और सभी विष्णुतत्त्वोंकी मूल वस्तु हैं। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है, इसलिये भक्तिरस ही उसका एकमात्र जीविका है। किन्तु अनादि-बहिर्मुख जीव श्रीकृष्णको भूलकर मायाके सुख-दुःखमें निमग्न हो गया है। श्रीकृष्ण-सेवाजनित भक्तिरसके अभावमें उसका स्वरूप क्षीण हो गया है। परम दयालु श्रीगौरसुन्दर उसकी बहिर्मुखता दूर करके उसको भक्तिरस दान करते हैं और उस भक्तिरसको पानकर उसका चिन्मय स्वरूप परिपुष्ट हो जाता है। इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर जीवोंका पोषण करते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु उसे भक्तिरस प्रदानकर जिस अवस्थामें लाते हैं, उसी अवस्थामें धारणकर उसे स्थिर रखते हैं और वह उस अवस्थासे च्युत नहीं होता अर्थात् वह पुनः मायिक सुखके लिये ललायित नहीं होता। इस प्रकार महाप्रभु जीवोंको धारण करते हैं। इस प्रकार भक्तिरसके द्वारा जीवोंका पोषण और उन्हें धारण करनेके कारण महाप्रभुका नाम हुआ है—‘विश्वम्भर’॥३३॥ सम्बन्धाधिदेवताका नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ है :- शेषलीलाय धरे नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’। श्रीकृष्ण जानाये सब विश्व कैल धन्य॥३४॥ अनुवाद—शेषलीलामें उनका नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ हुआ। इस लीलामें उन्होंने श्रीकृष्णके नाम-गुण-रूप-लीला और उनके गूढ़ रहस्योंको समस्त जगत्में प्रकाशित करके विश्वको धन्य किया॥ ३४॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने संन्यास ग्रहणके बाद चौबीस वर्षतक जो लीलाएँ की, उन्हें शेषलीला कहा जाता है। श्रीविष्णुस्वामि-सम्प्रदायमें दशनामी और अष्टोत्तरशतनामी त्रिदण्डि वैदिक-संन्यासी ११६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत