भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

है, किन्तु वह तो केवल उनके विच्छेद-दुःखसे कातर होकर श्रीरामचन्द्रके वनगमनके समय था। सब समय, विशेषतः श्रीरामचन्द्रका सीताजीके साथ संयोगके समय वृक्षादिका इस प्रकार आचरण नहीं देखा जाता। परन्तु श्रीकृष्णके साथ गोपियोंके मिलन-समयमें भी प्रतिदिन ही पशु-पक्षी-वृक्ष-लता आदिके देहमें प्रेमविकार दिखलायी देते हैं॥ २७॥ ताहाते आपन भक्तगण करि' सङ्गे। पृथिवीते अवतरि' करिमु नाना रङ्गे॥ २८॥ एत भावि' कलिकाले प्रथम सन्ध्याय। अवतीर्ण हैला कृष्ण आपनि नदीयाय ॥ २९॥ चैतन्यसिंहेर नवद्वीपे अवतार। सिंहग्रीव, सिंहवीर्य, सिंहेर हुङ्कार ॥ ३०॥ सेइ सिंह वसुक जीवेर हृदय-कन्दरे। कल्मष-द्विरद नाशे याँहार हुङ्कारे ॥ ३१॥ अनुवाद-मैं अपने परिकरोंको साथ लेकर पृथ्वीपर अवतरित होकर विभिन्न प्रकारकी लीलाओंको प्रकाश करूँगा- इस प्रकार श्रीकृष्णने यह निर्णय लिया और वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें कलियुगकी प्रथम संध्यामें नदीयामें अवतीर्ण हुए। सिंहकी भाँति जिनकी बलिष्ठ गर्दन है, सिंहकी भाँति जिनकी शक्ति और प्रभाव है तथा सिंहकी भाँति जिनकी गम्भीर गर्जन है, ऐसे श्रीचैतन्य महाप्रभु रूप सिंहने नवद्वीपमें अवतार लिया। जैसे वनमें सिंहकी गर्जनसे हाथी पलायन करते हैं, वैसे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी सिंहकी गर्जनासे हृदयमें सभी पापराशियोंका नाश हो जाता है। वे (परम दयालु) श्रीचैतन्य महाप्रभुरूप सिंह जीवोंके हृदयरूपी गुफामें विराजमान हों ॥ २८-३१॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'कल्मष' - पाप, 'द्विरद' - हस्ती (हाथी) ॥ ३१॥ अनुभाष्य- [“क्रमात् कृतयुगादीनां षष्ठांशः संध्ययोः स्वकः"- श्रीसूर्यसिद्धान्त अन्तर्गत मध्यमाधिकारमें १७वाँ श्लोक] युगके आरम्भमें प्रथम भाग और युगके समाप्त होनेसे पूर्व अन्तिम भाग, इन दोनों भागोंको 'संध्या' कहा जाता है और इनका कुल समय युगके छठे भागके बराबर होता है। युगकी प्रथम और अन्तिम संध्या, दोनोंका परिमाण युगके कालका बारहवाँ भाग होता है। इसलिये कलिकालकी प्रथम संध्याका परिमाण छत्तीस हजार वर्ष है। श्रीगौरसुन्दर कलिकालके ४,५८६ वर्ष व्यतीत होनेपर प्रथम संध्यामें श्रीमायापुर नवद्वीपमें जन्म ग्रहणकर प्रकट होते हैं॥ २९॥ अभिधेयाधिदेवताका नाम "विश्वम्भर' है :- प्रथमलीलाय ताँर विश्वम्भर नाम। भक्तिरसे भरिल, धरिल भूतग्राम ॥ ३२॥ अनुवाद- प्रथम लीला अर्थात् आदिलीलामें उनका नाम 'विश्वम्भर' था। उन्होंने भक्तिरसके द्वारा समस्त जीवोंका पोषण किया और उन्हें इस (भक्तिरस) में स्थिर रखा॥ ३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भूतग्राम' - जीवसमूह ॥ ३२ ॥