श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/२६-२७ हो सकता है, तो भी मुझ पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त व्रजप्रेमको अन्य कोई भी प्रदान नहीं कर सकता ॥ २६ ॥ लघुभागवत अन्तर्गत पूर्वखण्डमें (५/३७) बिल्वमङ्गल-वाक्य :- सन्त्ववतारा बहवः पङ्कजनाभस्य सर्वतो-भद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥ २७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके अंश पद्मनाभके सर्वमङ्गलमय विभिन्न प्रकारके अवतार रहनेपर भी एकमात्र श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कौन हैं, जो लताओंको भी प्रेम प्रदान कर सकें? अर्थात् अन्य कोई नहीं कर सकता ॥ २७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् पङ्कजनाभ (जिनकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति हुई) के अनेक मङ्गलमय अवतार क्यों ना हुए हों, श्रीकृष्णके अतिरिक्त लता अर्थात् आश्रितजनोंका प्रेमदाता और कौन है ? ॥ २७ ॥ अनुभाष्य—पङ्कजनाभस्य (पद्मनाभस्य भगवतः) सर्वतः भद्राः (मङ्गलप्रदाः) बहवः अवताराः सन्तुः अपि कृष्णात् अन्यः को वा लतासु (तदाश्रितासु) प्रेमदः (प्रेमभक्तिदाता) भवति ? श्लोक-भावानुवाद—भगवान् पद्मनाभके मङ्गल प्रदान करनेवाले बहुतसे अवतार हैं, तो भी श्रीकृष्णके अतिरिक्त कौन अपने आश्रित भक्तोंको प्रेमभक्ति देनेवाले हैं? ॥ २७ ॥ अमृतानुकणिका—स्वयं भगवान्के अनेक अवतार हैं और ये समस्त अवतार सभी प्रकारसे जीवको मङ्गलदान भी कर सकते हैं, किन्तु स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य कोई भी भगवत्-स्वरूप प्रेमदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। श्रीकृष्णने केवल मनुष्योंको ही प्रेमदान किया, ऐसा नहीं है, उन्होंने पशु, पक्षी, कीट-पतङ्ग, यहाँ तक कि लतादिको भी प्रेमदान किया। श्रीमद्भागवतमें इसका प्रमाण पाया जाता है। श्रीकृष्णके असमोर्द्ध रूप-माधुर्यका दर्शन करके पशु, पक्षी, वृक्षादि सभी प्रेममें पुलकित हो गये (भागवत १०/२९/४०)— “का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतवेणुगीत सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥” अर्थात् “हे कृष्ण! तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी रमणी है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तानको सुनकर तथा त्रिभुवनके सौभाग्यरूप तुम्हारे इस त्रिभङ्ग-ललित श्यामसुन्दर रूपको अपने नेत्रोंसे निहारकर सर्वथा मोहित हो अपनी आर्य-मर्यादासे विचलित ना हो जाय—नारीधर्म और लोक लज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त ना हो जाये ? स्त्रियोंकी बात ही क्या है, तुम्हारा त्रिभुवन-मोहन रूप तथा मुरली सङ्गीत ऐसा मोहक है कि इसे देख-सुनकर गौएँ, पक्षी, वृक्ष और मृगादि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो जाते हैं।” प्रश्न हो सकता है—श्रीरामचन्द्र जब वनमें गये, तब उनके लिये वृक्षादि भी रोदन कर रहे थे। इससे यह समझा जाता है कि श्रीरामचन्द्रने भी वृक्षोंको प्रेमदान किया था। यह तो सत्य ११४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत