भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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३/२४-२६ ] अनुभाष्य—अर्जुनके इस प्रकार कर्मके विषयमें सन्देहात्मक प्रश्नके उत्तरमें भगवान् श्रीकृष्णने संसारकी भोग-वासनासे रहित अपने द्वारा कर्मका आचरण करनेका उद्देश्य कहा— चेत् (यदि) अहं कर्म न कुर्याम्, इमे लोकाः उत्सीदेयुः (मां दृष्टान्तीकृत्य भ्रंशयेयुः), सङ्करस्य च कर्त्ता स्याम्, इमाः प्रजाः उपहन्यां (मलिनाः कुर्याम्)। श्लोक-भावानुवाद—यदि मैं कर्म ना करूँ, तो ये सभी लोग मेरे दृष्टान्तको मानकर भ्रष्ट हो जायेंगे, इस प्रकार मैं वर्णसङ्करका प्रवर्तक बनकर इन सारी प्रजाओंको भ्रष्ट करनेवाला होऊँगा ॥ २४॥ आचार्यका आचरण सभी लोगोंका आदर्श :— श्रीमद्भगवद्गीता (३/२१)— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते ॥ २५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रेष्ठ पुरुष जिस प्रकारका आचरण करते हैं, उसीका ही अन्य लोग अनुकरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको 'प्रमाण' कहता है, सभी लोग उसीमें अनुरत होते हैं॥ २५ ॥ अनुभाष्य—श्रेष्ठः (महाजनः) यत् यत् आचरति, तत् तत् [कर्म] एव इतरः (अश्रेष्ठः) जनः [आचरति]; सः (श्रेष्ठः) यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः (इतरः जनः) तत् अनुवर्त्तते (अनुसरति)। श्लोक-भावानुवाद—श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, उस-उस कर्मका ही साधारण लोग आचरण करते हैं; वह श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको प्रमाणित करता है, अन्य व्यक्ति उसका अनुसरण करते हैं॥ २५॥ अमृताणुकणिका—उपरोक्त श्लोकमें बतलाया है कि भगवान् प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर क्यों कर्म करते हैं। साधारणतः श्रेष्ठ व्यक्ति जो करते हैं, अन्यान्य लोग उसका अनुकरण करते हैं। इसलिये भगवान् यदि जगत्में अवतीर्ण होकर कोई कर्म ना करें, तो उनका दृष्टान्त देखकर अन्य लोग भी धर्म-कर्मका अनुष्ठान नहीं करेंगे। इससे उनमें पाप-पुण्यका विचार नहीं रहेगा और स्वच्छन्द रूपसे स्त्री-पुरुष विवाहके बिना सङ्ग करके वर्णसङ्कर सन्तानें उत्पन्न करेंगे, जो अधर्ममें प्रवृत्त होंगी। इस प्रकार पाप कर्मोंमें रत होकर सभी लोग विनाशको (नरक और निम्न योनियोंको) प्राप्त होंगे॥ २४-२५॥ युगधर्म प्रचार—विष्णुका कार्य, किन्तु श्रीकृष्णके बिना अन्य विष्णुतत्त्वका कृष्णप्रेमदान असम्भव :— युगधर्म-प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥ २६ ॥ अनुवाद—युगधर्मका प्रवर्तन तो मेरे अंशोंके द्वारा हो सकता है, किन्तु व्रजप्रेमको मेरे अतिरिक्त और कोई भी नहीं दे सकता है॥ २६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नाम-सङ्कीर्तन रूप युगधर्म और व्रजप्रेम—इन दोनोंका प्रचार करनेके लिये मैं प्रकट होनेकी इच्छा कर रहा हूँ। यद्यपि युगधर्मके प्रचारका कार्य मेरे अंशावतारके द्वारा तीसरा अध्याय | ११३