श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/२२-२४ अमृतप्रवाह भाष्य- हे अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि होती है और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं इस जगत्में प्रकट होता हूँ। साधुओंके परित्राण (रक्षा), दुष्कृतिजनोंके विनाश और धर्मकी संस्थापनाके लिये मैं प्रत्येक युगमें प्रकट होता हूँ॥ २२-२३ ॥ अनुभाष्य-पूर्वकालकी बात बताते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे बोले कि मैंने इस योगशास्त्रको पहले सूर्यको दिया था और समयके प्रभावसे इसके नष्ट हो जानेपर मैं तुम्हें पुनः यह ज्ञान प्रदान कर रहा हूँ। अर्जुनके विश्वासको दृढ़ करनेके लिये भगवान् अपने आविर्भावके प्रसङ्गमें कह रहे हैं- हे भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः (हानिः) अधर्मस्य अभ्युत्थानं (वृद्धिः) भवति, तदा [अहं द्वे सोढुमशक्नुवन् तयोर्वैपरीत्यं कर्त्तुं] आत्मानं सृजामि। साधूनां (मदनुशीलनपराणां) परित्राणाय (सेवनविघ्ननिवृत्तये) दुष्कृतां (भक्तद्रोहिणां मदन्यैरवध्यानां रावण-कंस-केश्यादीनां) विनाशाय, धर्मसंस्थापनार्थाय च (परिचर्यासाङ्कीर्त्तनलक्षण-भगवत्सेवनपर-निर्मत्सरधर्मस्य सम्यगाचरणार्थाय प्रचारार्थाय च) युगे युगे (तत्तत्काले) सम्भवामि। श्लोक-भावानुवाद-हे भरतवंशी! जब-जब भी धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, मैं उसे सहन नहीं कर सकता, इसलिये उसे विपरीत (शोधन) करनेके लिये स्वयंको प्रकट करता हूँ। (मेरे अनुशीलन परायण) साधुओंके मेरी सेवामें आनेवाले विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये और (भक्तोंके द्रोही एवं मेरे अतिरिक्त किसी अन्यके द्वारा ना मारे जा सकनेवाले रावण, कंस, केशी आदि) असुरोंके विनाश तथा (परिचर्या और सङ्कीर्त्तनादि लक्षणोंसे युक्त भगवत्-सेवापरायण निर्मत्सर) धर्मके सम्यक् रूपसे आचार-प्रचारके लिये उस-उस उपयुक्त समयपर मैं स्वयंको प्रकट करता हूँ॥ २२-२३॥ अमृतानुकणिका- एक प्रश्न हो सकता है-भगवान्का निरपेक्ष होना स्वाभाविक है, किन्तु जब वे भक्तोंकी रक्षा करते हैं और असुरोंका संहार करते हैं, तब क्या वे पक्षपात करते नहीं दिखलायी देते? इसका समाधान यह है-भगवान्का असुरोंके प्रति जो निग्रह दिखलायी देता है, वह वास्तवमें उनका अनुग्रह ही है। भक्तविद्वेषी असुरोंके लिये भगवान्के शासनके अनुसार अनन्त नरक यातना भोगनेकी व्यवस्था है। भगवान् 'हतारिगतिदायक' (जिसका संहार करते हैं, उसे गति प्रदान करनेवाले) हैं, इसलिये उनके हाथों मारे जानेपर असुरोंको मुक्तिकी प्राप्ति होती है, और पापकर्मोंके फलस्वरूप उन्हें जो नरकादि भोग करना था, उससे उनका छुटकारा हो जाता है। इस प्रकारसे वे असुरोंपर भी अनुग्रह करते हैं॥ २२-२३ ॥ आचारके बिना प्रचारकी व्यर्थता और विषममय फल :- श्रीमद्भगवद्गीता (३/२४)— उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्त्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदि मैं अपने कर्म-आचरणके द्वारा कर्म व्यवस्थाकी रक्षा नहीं करूँ, तो इन लोकोंका विनाश हो जायेगा और वर्णसङ्करका कारण होकर मैं ही प्रजाका विनाशक बन जाऊँगा॥ २४॥ ११२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत