भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

३/१९-२३ ] दोषका भी सभी गान करते हैं। जैसे दूधके कलशमें एक बूँद मदिरा डाल दी जाय, तो उसको कोई स्पर्श नहीं करेगा।” साधु-शिक्षा दो प्रकारकी है अर्थात् वाक्यके द्वारा उपदेश देना और चरित्रके द्वारा दूसरोंको साधु-चरित्रकी शिक्षा देना। मध्यलीला (१२/११७)में महाप्रभुने और भी कहा है— “तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे। एइमत भाल कर्म सेइ येन करे॥” “हे वैष्णवगण! तुम साधु-चरित्रके द्वारा दूसरोंको शिक्षा दो। तुमने अच्छा कार्य किया है, यह उत्तम बात है। किन्तु जगत्के जीव तुम्हारे भ्रातागण हैं, तुम्हारे असत् कार्यके द्वारा उनका पतन होगा। तुम्हारा कर्तव्य यह है—अपना साधु-चरित्र दिखलाकर उनके द्वारा अपने चरित्रका अनुकरण करवाओ। तुम यदि गृहत्यागी वैष्णव हो, तब त्यागी वैष्णवके सम्बन्धमें मैंने जो सब उपदेश दिये हैं, वैसा आचरण करके अन्य गृहत्यागी वैष्णवोंको शिक्षा दो। तुम यदि वैष्णवगृहस्थ हो, तब गृही वैष्णवोंको मैंने जो उपदेश दिये है और अपने चरित्रके द्वारा जो आदर्श दिखलाये हैं, उसका आचरण करो और अन्यान्य गृहस्थोंको शिक्षा दो। वैष्णवोंका चरित्र निष्पाप होता है। उसमें कोई भी अंश गोपन करने योग्य नहीं है। सरलता ही वैष्णवोंका जीवन है। अपने चरित्रको सर्वत्र प्रकाश करके शिक्षा दो। चरित्र शुद्ध ना होनेपर कोई भी ‘वैष्णव’ पदवी प्राप्त करनेके योग्य नहीं होता। तुम्हारा शुद्ध चरित्र है, इसलिये सदा अच्छा आचरण करते रहना। और उसकी जगत्को शिक्षा देना। सभी वैष्णव ही जगत्के गुरुपदको प्राप्त हुए हैं। केवल कथाके द्वारा शिक्षा देना यथेष्ठ नहीं है, चरित्रके द्वारा शिक्षा देना ही प्रधान कार्य है। देखो, मेरे लिये कोई भी विधि नहीं है। मैं स्वेच्छामय ईश्वर हूँ। जो इच्छा हो, मैं वही कर सकता हूँ। तथापि मैं कलिकालमें जीवोंके चरित्रको पवित्र करनेके लिये श्रीशचीदेवीके गर्भसे जन्मग्रहण करके शिक्षा दे रहा हूँ। मैंने बाल्यचरित्रके द्वारा बालकोंको शिक्षा दी है। गृहस्थ चरित्रके द्वारा गृहीजनोंको शिक्षा दी है। संन्यास चरित्रके द्वारा गृहत्यागी लोगोंको शिक्षा दी है। तुम लोग मेरे चरित्रका अनुकरण करते हुए अन्यान्य जीवोंको शिक्षा दो। जब भी इस विषयमें कुछ भी सन्देह हो, तब मेरे चरित्रकी आलोचना करके अपने चरित्रका गठन करो।” श्रीमन्महाप्रभुके इस उपदेशका सभी वैष्णवोंको पालन करना उचित है॥१९-२१॥ अवतारकाल:— श्रीमद्भगवद्गीता (४/७-८)— यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ २२॥ अवतारका कार्य :— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ २३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२-२३॥ तीसरा अध्याय | १११