भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ३/१९-२१ वे किसीके भी सेवक नहीं हैं; तभी भक्तभाव उनका स्वरूपानुबन्ध अथवा अपना भाव नहीं है, इसलिये उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करनेकी बात कही है। आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय-आचार्यके आदर्शके बिना कभी भी साधारण दुर्बल जीव शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है। कर्मराज्य हो अथवा भक्तिराज्य-दोनों क्षेत्रोंमें ही आदर्श आवश्यक है। जगत्में प्रत्येक व्यक्ति ही किसी-ना-किसीके आदर्शके द्वारा ज्ञात या अज्ञात रूपसे परिचालित होता है। कर्मी पुण्य-कार्य करनेके लिये जिस प्रकार किसी-ना-किसीको आदर्शके रूपमें अपने सम्मुख स्थापन करते हैं, उसी प्रकार पाप-कार्य करनेमें प्रवृत्त होनेपर भी किसी एक आदर्शको सम्मुख स्थापन करना होता है। पापी व्यक्ति भी आदर्शके बिना सुष्ठु-भावसे पापकर्म नहीं कर सकता। पृथ्वीपर स्थित वारवनिताएँ स्वर्गकी वेश्याओंको अपना आदर्श करके अधिकतर पाप कार्यमें लिप्त होती हैं। पृथ्वीपर राजा लोग देवेन्द्रके आदर्शको सामने स्थापित करते है। चार्वाक-पन्थियोंका जिस प्रकार आदर्श है, जैमिनीके अनुगतजनोंका भी उसी प्रकार आदर्श है। शिशु आदर्श प्राप्त नहीं करके कोई भी शिक्षा लाभ नहीं कर सकता-शिशु आदर्शका अनुकरण करके ही वाक्योंका उच्चारण तथा आहार-विहारादि करनेकी शिक्षा प्राप्त करता है। किसी नर शिशुका जन्मसे यदि बाघादि जन्तुके आदर्शमें पालन हो, तो उनके आदर्शको लेकर उसमें भी बाघके शावककी भाँति हिंसक स्वभाव, वैसे ही शब्दका अनुकरण और वैसी आहार-विहारकी प्रवृत्ति लक्षित होती है। शिशुको शब्दशास्त्रमें अथवा लिपिशिक्षामें शिक्षित करनेके लिये आदर्श-शब्द या आदर्श-लिपिकी आवश्यकता होती है; अन्यथा शिशु शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। जब हम तैरनेकी शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब हमें जलमें उतरने अथवा नदीके प्रवाहमें बहुत दूर जानेसे भय लगता है, किन्तु यदि हम किसी व्यक्ति या अनेक व्यक्तियोंको इस इस कार्यमें प्रवृत्त अथवा हमारे लिये आदर्श स्थापित करते देखें, तब हममें साहसका सञ्चार होगा और हम धीरे-धीरे आदर्शके द्वारा उत्साह प्राप्तकर तैरनेकी विद्यामें सनिपुण हो सकते हैं। इस प्रकार इस जगत्में अनेक दृष्टान्त हम नित्य ही प्रत्यक्ष देखते हैं। अधोक्षजके सेवाराज्यमें भी आदर्शकी एकान्त आवश्यकता है, परन्तु वह अन्तरनिष्ठा अन्य प्रकारकी है; यही मात्र पार्थक्य है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने लिखा है-वैष्णवोंको 'जगद्-गुरु' कहा जाता है। वैष्णव जिस प्रकार उच्च पदपर स्थित हैं, उनका चरित्र भी उसी प्रकार उच्च और अनुकरण-योग्य होना आवश्यक है। वैष्णवोंका चरित्र अगर मन्द होगा, तो अन्यान्य दुर्बल जीव किस प्रकारसे सत्चरित्रकी शिक्षा ग्रहण करेंगे? महाप्रभुने भी हमें इसी प्रकार उपदेश दिया है (मध्यलीला १२/५१,५३)- “शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय। संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय॥५१॥ प्रभु कहे,-“पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस। सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश॥५३॥” “श्वेत वस्त्रपर जैसे स्याहीका दाग छुपाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार संन्यासीके अल्प ११० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत