श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/१७-१८ अनुभाष्य- (भा: ३/२९/१३)- “सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥” अर्थात् “सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य मुक्तिको मेरे द्वारा दिये जानेपर भी मेरे भक्त मेरी सेवाको त्याग करके उन्हें ग्रहण नहीं करते।” (भा: ९/७/६७) भी द्रष्टव्य है॥ १८ ॥ अमृतानुक्रमणिका - यहाँ प्रश्न हो सकता है - ऐश्वर्य ज्ञानसे शिथिल प्रेममें श्रीकृष्णकी प्रीति नहीं है, तो क्या ऐश्वर्य ज्ञानसे वैधी भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंका भजन सम्पूर्णतया व्यर्थ है ? इसके उत्तरमें ग्रन्थकार कह रहे हैं- “नहीं उनका भजन व्यर्थ नहीं है। वे यद्यपि व्रजभावसे श्रीकृष्णकी सेवा लाभ नहीं कर सकते, तथापि वे चार प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे किसी एक प्रकारकी मुक्तिको प्राप्तकर वैकुण्ठमें विष्णुकी अपने रसके अनुरूप सेवा लाभ करते हैं। ऐश्वर्य-प्रधान भक्तोंकी ऐश्वर्य-प्रधान वैकुण्ठमें ही गति है।” (भःरःसिः पूर्व विभाग चतुर्थ लहरी-१४)- “महिमेज्ञानयुक्तः स्याद्विधिमार्गानुसारिणाम्।” अर्थात् “विधिमार्गके भजनमें भगवान्के माधुर्यका ज्ञान प्रधान ना होकर उनकी महिमाका ज्ञान ही प्रधान होता है।” (भःरःसिः पूर्व विभाग चतुर्थ लहरी-१२)- “माहात्म्यज्ञानयुक्तस्तु सुदृढ़ सर्वतोऽधिकः। स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया साष्ट्र्यादि नान्यथा ॥” अर्थात् “माहात्म्यज्ञानयुक्त, सुदृढ़ और सर्वतोभावसे अधिक जो स्नेह है, उसे प्रेम-भक्ति कहा जाता है। उससे सार्ष्टि आदि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है, उस मुक्तिको पानेका और कोई उपाय नहीं है।” बृहद्भागवतामृतम् (२/४/१३२) में श्रीनारदकी गोपकुमारके प्रति उक्ति- “स वै विनोदः सकलोपरिष्टाल्लोके क्वचिद्भाति विलोभयन् स्वान्। सम्पाद्य भक्तिं जगदीश-भक्त्या वैकुण्ठमेत्यात्र कथं त्वयेक्ष्यः ॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी वैसी क्रीड़ा समस्त लोकोंके ऊपर विराजमान किसी एक एकान्त स्थानपर अपने समस्त भक्तोंके मनका हरण करते हुए प्रकाशित रहती है। तुमने प्रभुके प्रति जगदीश बुद्धिसे भक्तिकर इस वैकुण्ठलोकको प्राप्त किया है, इसलिये यहाँपर वैसी क्रीड़ाका सुख किस प्रकार अनुभव करोगे?” अवश्य किसी शुद्धभक्त-वैष्णवकी कृपा होनेपर विधिमार्गके भजनमें भी ऐश्वर्यज्ञानहीना शुद्धभक्तिकी कृपा प्राप्त हो सकती है।” सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियोंके अतिरिक्त एक प्रकारकी मुक्ति है, जिसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं; उपास्यके स्वरूपके साथ मिलित होनेका नाम 'सायुज्य' है। वास्तवमें सायुज्य मुक्तिमें जीव उपास्य स्वरूपके साथ तादात्म मात्र ही प्राप्त करता है (अग्निके संयोगसे जैसे लोहा अग्नि-तादात्म्य प्राप्त करता है, उसी प्रकार); उपास्यके स्वरूपके साथ अभेदत्व प्राप्त नहीं करता है और कर भी नहीं सकता, क्योंकि जीव स्वरूपतः ब्रह्म अथवा ईश्वर नहीं हो सकता। किसीके भी स्वरूपका व्यतिक्रम कभी भी नहीं हो सकता। यह सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है-ब्रह्म-सायुज्य और ईश्वर-सायुज्य। निर्विशेष-ब्रह्मके साथ जो सायुज्य प्राप्त करते हैं, उनकी १०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत