भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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३/१३-१८ ] लोभमें ही प्रवृत्त होकर शुद्धभजन-प्रणालीका उल्लङ्घन करके नयी प्रणालीका अवलम्बन और प्रवर्त्तन करे, तब उसके फलस्वरूप उत्पात ही प्राप्त होगा, हरिभक्ति प्राप्त नहीं होगी। ऐसा रागात्मिका भक्तिके रसाचार्य स्वयं श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तीपादने इस प्रकार हठात् भक्तोंको सावधान किया है। जो स्वयंको गौड़ीय सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त मानते हैं, वे कभी भी श्रील चक्रवर्त्तीपादके उपदेशका उल्लङ्घन करके अपने स्वतन्त्र मतकी बुद्धि पोषण नहीं करते हैं। जो इस प्रकार करते हैं, वे गौड़ीय भक्त नहीं है, अथवा चारों सत्सम्प्रदायोंमें किसी भी सम्प्रदायके भक्त नहीं हैं। इसलिये वे भक्त ही नहीं हैं, क्योंकि सम्प्रदाय-भिन्न शुद्धभक्त नहीं होते, “सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते विफला मताः।” श्रीरूपगोस्वामीने श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (श्लोक १/२/२९५)में स्पष्ट कहा है- “सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावालिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः ॥” रागानुगा भक्तिका अनुष्ठान दो प्रकारसे किया जाता है-साधकरूपसे अर्थात् यथावस्थित देह (बाह्यदेह) के द्वारा, सिद्धरूपसे अर्थात् अपने अभिलषित प्रेमसेवाके उपयोगी अन्तश्चिन्तित देहके द्वारा व्रजस्थित अपने अभीष्ट श्रीकृष्णके और श्रीकृष्णके प्रियकरोंके भाव या श्रीकृष्ण-विषयक रति प्राप्त करनेके लिये लुब्ध होकर उन व्रजलोकके परिकरों, श्रीकृष्णके अत्यन्त प्रियजनों, श्रीराधिका-ललिता-विशाखा-श्रीरूपमञ्जरी आदि एवं उनके अनुगत श्रीरूपगोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी आदिके अनुसार करना होता है। सिद्धरूपसे मानसी-सेवा श्रीराधा-ललिता- विशाखा-श्रीरूपमञ्जरी आदि व्रजवासियोंके अनुसार करनी होगी तथा साधकरूपसे कायकी सेवा श्रीरूप-सनातनादि व्रजवासी महानुभावोंके अनुसार करनी होगी। लोभनीय-भावप्राप्तिकी आकाङ्क्षावाले व्यक्ति रागमार्गमें व्रजवासियोंके अर्थात् शुद्ध मधुररसके उपासकजनोंके अनुसरणमें साधक रूपमें और यहाँ तक कि सिद्धावस्थामें भी सेवारत होंगे, स्वयं कोई नयी प्रणालीका आविष्कार नहीं करेंगे ॥ १३-१६॥ गौरव-भावमयी वैधीभक्तिके फलसे चतुर्विध मुक्ति और वैकुण्ठमें नारायण-प्राप्ति :- ऐश्वर्यज्ञाने विधि भजन करिया। वैकुण्ठके याय चतुर्विध मुक्ति पाञा ॥ १७॥ सार्ष्टि, सारूप्य आर सामीप्य, सालोक्य। सायुज्य ना लय भक्त याते ब्रह्म-ऐक्य ॥ १८ ॥ अनुवाद-ऐश्वर्य-ज्ञानसे वैधी-भक्ति करके भक्तलोग चार प्रकारकी मुक्तियोंमें किसी एक प्रकारकी मुक्तिको पाकर वैकुण्ठमें जाते हैं। सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्य, इन चार प्रकारकी मुक्तियोंको तो भक्त ग्रहण करते हैं, किन्तु वे 'जीव-ब्रह्म-ऐक्य' कहलानेवाली सायुज्य मुक्तिको कभी स्वीकार नहीं करते ॥ १७-१८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सार्ष्टि'-विष्णुके समान ऐश्वर्यकी प्राप्ति; 'सारूप्य'-विष्णुकी भाँति चतुर्भुजादि रूप और वर्णकी प्राप्ति; 'सामीप्य'-विष्णुके निकट अवस्थिति; 'सालोक्य'-विष्णुलोकमें वास करना ॥ १८॥ तीसरा अध्याय | १०३