श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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गोस्वामीकी यह उक्ति भ्रान्त है, ऐसा महाप्रभुने नहीं कहा। महाप्रभुके सभी पार्षदोंने इस श्लोककी उक्तिका अनुमोदन किया था। महाप्रभु और उनके परिकरोंके द्वारा अनुमोदित महाप्रभुके अवतारके इस कारणका श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें उल्लेख किया है। प्रसङ्गानुसार सङ्गत मानकर श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको ही यहाँपर उद्धृत किया है। इस श्लोकमें महाप्रभुको श्रीकृष्णचैतन्य ना कहकर शचीनन्दन कहा गया है, वे श्रीशचीदेवीके गर्भसे प्रकट हुये हैं। सन्तानके प्रति माताका जैसा वात्सल्य रहता है, जीवोंके प्रति महाप्रभुका वैसा वात्सल्य है। माताके गुण सन्तानमें भी सञ्चारित होते हैं, इसलिये शचीमाता जो वात्सल्यकी परावधि हैं, उनकी सन्तान श्रीचैतन्यमें भी यह वात्सल्य प्रेम अत्यधिक होगा—ऐसा स्वाभाविक ही है। माताके नामसे इनका परिचय देनेपर उनके माताके गुणोंके समान या उनसे अधिक वात्सल्य ही यहाँ सूचित हो रहा है। 'अनर्पितचरीं चिरात्'—सहस्र चतुर्युग पर्यन्त ब्रह्माके एक दिनमें एक बार द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अवतार ग्रहण करते हैं। उसी द्वापरके परवर्ती कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण होते हैं। पूर्वकल्पमें जब स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य रूपमें अवतीर्ण हुए थे, तब एक बार यह उन्नत-उज्ज्वल रस दिया गया था। उसके बाद सैंकड़ों-सैंकड़ों अवतार रूपोंमें वे जगत्में अवतीर्ण हुए, किन्तु तब इस वस्तुको कभी भी नहीं दिया। यहाँ तक, द्वापरके श्रीकृष्णावतारमें भी इस असाधारण वस्तुको उन्होंने दान नहीं किया। स्वभावतः ही परम आस्वादनीय भक्ति वस्तुको एक अनिर्वचनीय आस्वादन चमत्कारिताके रसरूपमें सराबोर करके श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति करुणावश होकर कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभुने इस उन्नत-उज्ज्वल रसका पात्र-अपात्रका विचार किये बिना यहाँ-तहाँ वितरण किया। हम लोग उनके चरणकमलोंमें एकान्त भावसे शरणागत होकर अनर्थ निवृत्तिके पश्चात् स्वरूपमें स्थित होकर इस रसका आस्वादन कर सकते हैं। महाप्रभुके आनेके पूर्व पाँच रसोंमें वैकुण्ठमें शान्त, दास्य और गौरवमिश्रित सख्य (निम्न-अर्द्ध)—इन अढ़ाई रसोंका विषय भगवद्भक्तोंको ज्ञात था। आत्माकी स्वाभाविक वृत्ति श्रीकृष्णका नित्य दास्य है। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं। जागतिक विचार-प्रणालीका अवलम्बन करके पहले भगवान्की सेवा होती थी, किन्तु जीवन्मुक्त पुरुष किस प्रकार भगवान्में अहैतुकी भक्ति विधान करते हैं, वह जगत्में अज्ञात था। उन्नत उज्ज्वल रसमें भगवान् हमारे निजजन हैं, इस विषयमें पहले नहीं जानकर भक्त लोग भगवान्की गौरव और मन्त्रोंके साथ सेवा करते थे। भगवान्की सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें सेवा की जाती है, यह श्रीगौरसुन्दरके आविर्भावके पूर्व अज्ञात था। विश्रम्भ-सख्य (उच्च-अर्द्ध), वात्सल्य और मधुररसमें भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका किस प्रकारसे भली-भाँति रूपसे अनुशीलन करना चाहिये, उसका श्रीगौरसुन्दरने स्वयं आचरण करके सेवाभिलाषी जीवोंको शिक्षा प्रदान की है। मधुररसमें सेवाका उत्कर्ष एकमात्र श्रीगौरसुन्दरकी शिक्षामें ही प्राप्त होता है। भगवान्के मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन और राम अवतारोंमें जो सेवा प्रचलित है, उसके मूलमें गौरव मिश्रित सम्भ्रम सेवा है। इसलिये उसमें आत्माका सीमाबद्ध विकास ही है।
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३/४ ] चिन्मय धामके विकृत प्रतिफलन इस जड़-जगत्में भी पाँच रसोंमें पाँच प्रकारकी सेवा देखी जाती है, किन्तु यह असम्पूर्ण और हेय अर्थात् तुच्छ है। श्रीकृष्ण ही सभी रसोंके मूल हैं। हम इन पाँच रसोंमें किसी रसमें अपने सिद्ध स्वरूपसे उनकी सेवा कर सकते हैं। किन्तु श्रीकृष्णके अन्य अवतारोंकी उस प्रकार विश्रम्भ सेवा सम्भवपर नहीं है। 'उन्नत-उज्ज्वल रस'—चित्-जगत्में भक्तोंका श्रीकृष्णके साथ पाँच भावोंमें सम्बन्ध है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर अथवा शृङ्गार। इन्हें स्थायी भाव कहा जाता है। स्थायीभावके ऊपर सामग्रीका संयोग होनेपर कृष्णभक्तिरस होता है। साधारणतः भावरूपा भक्ति ही कृष्णरति है, जो भक्तोंके पूर्व और आधुनिक संस्कारोंके द्वारा हृदयमें उदित होकर स्वयं आनन्दरूपा होनेपर भी रसावस्थाको प्राप्त करती है। सामग्री चार प्रकारकी होती है—(१) विभाव, (२) अनुभाव, (३) सात्त्विक और (४) व्यभिचारी या सञ्चारी। रस एक अतुलनीय तत्त्व है। इसे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णका लीला-विकाशरूप चन्द्रोदय कहा जा सकता है। जिस समय कृष्णभक्ति पूर्ण शुद्ध होनेपर क्रियाकारता लाभ करती है, उस समय उसे भक्तिरस कहा जाता है। उन्नतका अर्थ है—उच्च। परन्तु किससे उन्नत, यह नहीं कहा गया है। इसलिये व्यापक अर्थमें ही उन्नत शब्दका अर्थ करना होगा अर्थात् जो सर्वापेक्षा उन्नत है, उसकी ही बात इस श्लोकमें कही गयी है। सर्वापेक्षा उन्नत यह रस क्या है? शान्तरसमें इष्टके प्रति ऐश्वर्य बुद्धिसे निष्ठा होती है, परन्तु ममता नहीं होती। वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका और मथुरामें शान्तरस है, परन्तु ब्रजमें शान्तरसकी स्थिति नहीं है। दास्यरस वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका, मथुरा एवं ब्रजमें निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, परन्तु इन धामोंके सभी प्रकोष्ठोंमें एक विशेष प्रकारका तारतम्य है। ऐश्वर्य-परम्परामें वैकुण्ठसे अयोध्या, अयोध्यासे द्वारका और द्वारकासे ब्रजमें आते-आते ऐश्वर्यभाव क्षीण होता जाता है अर्थात् वैकुण्ठके दास्यभक्तोंमें जो ऐश्वर्य है, वह ब्रज तक आते-आते धूमिल हो जाता है। परन्तु प्रेम-माधुर्य और ममता अभिवर्द्धित होते जाते हैं। ब्रजके दास्यभक्तोंके मनको श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त कुछ भी आकर्षित नहीं कर सकता, जब कि वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका एवं मथुराके दास्यभक्त ब्रजवासी दास्यभक्तोंकी सेवा देखकर लालायित हो उठते हैं। ऐसा भी नहीं कह सकते कि ब्रजमें ऐश्वर्य ही नहीं है, ब्रजमें अपितु सर्वाधिक ऐश्वर्य है, परन्तु असीम माधुर्यके द्वारा वह आच्छादित रहता है। ब्रजके दास्यभक्तों रक्तक-पत्रकादिमें शुद्ध दास्य होता ही नहीं, उसमें सख्य या वात्सल्यभाव मिश्रित रहता है। ब्रजके दास्यभक्तोंका एक वैशिष्ट्य यह भी है कि उनमें अन्य स्थानोंके दासोंकी भाँति शुद्ध सम्भ्रम नहीं रहता। ऐश्वर्य भावापन्न दास्यभक्त सेवा-अपराधका विचार करते हैं—अतः प्रेमकी बाढ़ वहाँ नहीं होती। दास्यप्रेममें सेवाका सम्यक् विकास नहीं होता। अयोध्याके सभी भक्तोंमें प्रायः दास्यभाव है, परन्तु इन दासोंमें हनुमानजी सर्वश्रेष्ठ हैं। जब अहिरावण छलकपटसे श्रीराम-लक्ष्मणकी बलि देनेके लिये उन्हें पातालमें ले आया, तब हनुमानजी उसका वहीं वधकर अपने प्रभुको अपने कन्धोंपर बिठाकर ले आये। परन्तु ब्रजके दास्यभक्तोंके समान वे अपने प्रभुको ना तो गोदीमें ले सकते हैं, ना ही उनका चुम्बन कर सकते हैं। द्वारकाके दास्यभक्तोंको अयोध्याके दास्यभक्तोंसे श्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु इनमें भी सख्यताकी गन्ध भी नहीं होती। तीसरा अध्याय | ९३
[ ३/४ जो भक्त प्रेमकी अधिकतामें श्रीकृष्णको अपने समान समझते हैं, किसी भी प्रकार श्रीकृष्णको अपनेसे श्रेष्ठ नहीं मानते, वे श्रीकृष्णके सखा कहे जाते हैं। शान्तकी निष्ठा, दास्यभावकी ममतायुक्त सेवा और सख्यभावकी विश्रम्भ सेवा इस सख्यप्रेममें विद्यमान है। तुलनात्मक दृष्टिसे दास्यप्रेममें ममता होनेपर भी यह सम्भ्रम बना रहता है कि वे प्रभु हैं-मैं उनका सेवक हूँ और श्रीकृष्णमें भी प्रभुता बनी रहती है। वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका, मथुरा आदिमें सभी सखागण श्रीकृष्ण और श्रीरामको भगवान् मानते हैं। जब कि व्रजके सख्यप्रेममें भक्तका यह विश्रम्भ भाव रहता है कि कृष्ण मेरे समान ही एक गोप बालक है, वह किसी भी प्रकार मुझसे श्रेष्ठ नहीं। सखा उनकी शय्यापर चढ़कर उन्हें जगा देते हैं और कहने लगते हैं-'कन्हैया ! तू अभी तक सो रहा है, देख गोचारणका समय निकला जा रहा है।' यही विश्रम्भ सख्यके समभावका प्रतीक है। सखा तो द्वारकामें अर्जुन आदि भी हैं, परन्तु वे ऐसा कभी नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण जैसे ही अपना विराट् स्वरूप दिखलाते हैं, अर्जुन काँप जाते हैं, हाथ जोड़ने लगते हैं। इसी प्रकार अयोध्यामें सुग्रीव, विभीषण, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सखा और भाई होनेपर भी श्रीरामके साथ ऐसा कभी नहीं कर सकते। भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न श्रीरामके साथ एक आसनपर भी नहीं बैठ सकते, श्रीरामके प्रति सम्भ्रम एवं गौरवबुद्धिके कारण उनमें व्रजके सखाओं जैसा आत्मीयतापूर्ण विश्रम्भ भाव सम्भव ही नहीं है। व्रजमें सख्य है, प्रीति है, ममता है, माधुर्य है। शान्त एवं दास्यभक्त भगवान्के अधीन होते हैं, परन्तु सख्यरससे भगवान् भक्तके अधीन होने लगते हैं। नित्यसिद्ध-परिकरोंमें माता-पिताके रूपमें जो परिकर स्वयंको श्रीकृष्णसे बड़ा मानते हैं और श्रीकृष्णको अपना लाल्य या अनुग्रहका पात्र समझते हैं—उनके इसी लाल्य-भावको वात्सल्यप्रेम कहा जाता है। इसमें सख्यरससे भी अधिक ममता होती है। वात्सल्यमें शान्तकी निष्ठा, दास्यकी सेवा और सख्यका निःसङ्कोच सख्यभाव तो रहता ही है, अधिकन्तु श्रीकृष्णको पाल्य और अपनेमें पालकका ज्ञान भी रहता है, जो ताड़न-भर्त्सन-बन्धन तक भी पहुँच जाता है। सर्वैश्वर्य पूर्ण स्वयं भगवान् होनेपर भी श्रीकृष्णने माँ यशोदाके बन्धनको स्वीकार किया था-केवल माँ यशोदाके प्रेमके वशीभूत होकर। जो विभु वस्तु हैं, जिनका बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे कुछ भी नहीं—उन्हें कौन बाँध सकता है? परन्तु ममता बुद्धिकी अत्यधिकतासे श्रीकृष्णको अपना लाल्य और अपनेको लालक-पालक समझकर पुत्र कृष्णके मङ्गलके लिये उसे बाँध दिया। अथवा नहीं, वात्सल्यप्रेमके द्वारा वे स्वयं बँध गये। यही यशोदाके प्रति उनका अनुग्रह है। अपनी अगणित लीलाओंमें श्रीकृष्ण कहीं नहीं बँधे। जब वे शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर गये थे, तब दुर्योधनने उन्हें पाशमें बाँधनेका प्रयत्न किया था, परन्तु श्रीकृष्णका विराट् विश्वरूप देखकर वह स्वयं तथा सभी सभासद भयभीत हो गये। देवकी, कौशल्यादिके द्वारा भी भगवान्का बन्धन दिखायी नहीं देता। किन्तु माँ यशोदाके हाथोंसे रस्सीसे उनका बँध जाना यह सूचित करता है कि नन्द-यशोदा जैसा लौकिक सद्बन्धुवत् सम्बन्ध कहीं भी नहीं है। शान्तमें ममताका अभाव, दास्यमें विश्रम्भ या विश्वासका अभाव, सख्यमें लालन-पालनका ९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/४ ] अभाव और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच सर्वाङ्गसे सेवाभावका अभाव होनेके कारण प्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। मधुररसमें जब श्रीकृष्णके प्रति कान्ताभाव हृदयमें उदित हो जाता है, तब सारे अभावोंका अभाव हो जाता है अर्थात् सारे अभाव पूर्ण हो जाते हैं, और अखण्ड प्रेमतत्त्वका स्रोत अहर्निश बहने लगता है। कान्ताप्रेमसे तात्पर्य है-व्रजगोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति प्रेम। शान्तका गुण श्रीकृष्ण-निष्ठा, दास्यादिकी भाँति सेवा, सख्यकी विश्रम्भ सेवा एवं वात्सल्यकी मङ्गलकामना एवं प्रेमाधीन होकर कृष्णका लालन-पालन आदि सभी गुण तो इसमें होते ही हैं, अधिकन्तु मधुरभावसे युक्त होकर सर्वांगके द्वारा सेवाका अवसर इसी रसके द्वारा उपलब्ध हो सकता है। इन सब कारणोंसे दास्यकी अपेक्षा सख्य और सख्यकी अपेक्षा वात्सल्य और वात्सल्यकी अपेक्षा मधुररसमें रसास्वादनकी चमत्कारिता और प्रेमवशियता अधिक है, इसलिये मधुररस सर्वोन्नत है। इस कान्ताप्रेमके मध्य श्रीराधाका प्रेम सर्वशिरोमणि है जिसकी महिमा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें वर्णित है। साधकोंके लिये इस मुकुटमणि राधाप्रेमको ग्रहण करना असम्भव है, लेकिन इसके अनुगत कृष्णप्रेमके अत्युच्च भावको जीव सिद्धावस्थामें प्राप्त करने योग्य हो जाता है। इसी भावको इस श्लोकमें 'स्वभक्तिश्रियं' कहा गया है। स्वभक्तिश्रियं - निज भक्तिकी शोभा। निजभक्ति अर्थात् श्रीराधिकाकी श्रीकृष्णके प्रति प्रेमरूपी लता। पत्ते-मञ्जरियाँ आदि रहनेसे ही लताकी शोभा होती है। इसी प्रकार ही जो सदा श्रीराधिकाका श्रीकृष्णसे मिलनकी चेष्टापरायण हैं और उनके मिलनमें सभी प्रकारसे निसङ्कोच सेवारत हैं, ऐसी सखियाँ (मञ्जरियाँ) ही श्रीराधिका प्रेमकी शोभा हैं। साधनावस्थामें राधिकाकी सखियाँ (मञ्जरीभाव) ही अनुसरणीय है। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है। आनुगत्यमयी सेवामें ही दासका अधिकार है, स्वातन्त्र्यमयी सेवामें दासका अधिकार नहीं है। श्रीराधिकादि व्रजसुन्दरियोंकी श्रीकृष्णसेवा स्वातन्त्र्यमयी है; इस प्रकार सेवामें जीवका अधिकार नहीं है। तो भी श्रीकृष्णकी कान्ताभाववती व्रजसुन्दरियोंके आनुगत्यमें-उनकी अनुगत दासीरूपमें श्रीकृष्णकी प्रीति विधानोपयोगी लीलाको आनुकूल्य करके जीव श्रीकृष्णकी सेवा कर पाता है। इस जातीय सेवाके अनुकूल उन्नत-उज्ज्वल-रसस्वरूपा जो प्रेमभक्ति है, उसे ही श्रीकृष्णचैतन्यने जीवोंको प्रदान किया। इस आनुगत्यमयी सेवामें जो सुख है, उसकी कहीं भी तुलना नहीं है। श्रीकृष्णके साथ व्रजसुन्दरियोंके सङ्गम-सुखकी अपेक्षा भी श्रीकृष्ण सेवाका सुख अनेक गुणा लोभनीय है। (अन्त्य २०/६०)- “कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम हैते सुमधुर, ताते साक्षी-लक्ष्मी ठाकुराणी। नारायण-हृदि स्थिति, तबु पादसेवाय मति, सेवा करे 'दासी'-अभिमानी॥” अर्थात् “कान्तकी सेवामें ही पूर्ण आनन्द है। सङ्गमसे भी यह अति सुमधुर है, इस बातकी साक्षी स्वयं लक्ष्मी ठाकुरानी हैं। यद्यपि नारायणका उनसे अपार प्रेम होनेके कारण उनकी स्थिति सदा नारायणके हृदयमें है, तथापि उनकी रति-मति नारायणके पादसेवनमें ही है और वे सदा दासी अभिमानसे उनकी सेवा करती हैं।” इस श्लोकमें ग्रन्थकारके आर्शीवादका मर्म इस प्रकार है- श्रीकृष्णचैतन्य सभीके हृदयमें तीसरा अध्याय | ९५
[ ३/४-७ स्फुरित होकर ब्रजसुन्दरियोंके आनुगत्यमें श्रीकृष्ण-सेवा करनेके निमित्त सभीकी लालसा जागृत करें ॥४॥ अवतारकाल वर्णन :- पूर्ण भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रकुमार। गोलोके ब्रजेर सह नित्य विहार ॥५॥ ब्रह्मार एकदिने तिँहो एकबार। अवतीर्ण हञा करेन प्रकट विहार ॥६॥ अनुवाद-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही पूर्ण भगवान् हैं। व्रजधाम समन्वित गोलोकमें वे नित्य विहार करते हैं। ब्रह्माके एक दिनमें वे एक बार इस जगत्में अवतीर्ण होकर प्रकट-लीला करते हैं॥५-६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिन व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णको पिछले अध्यायमें पूर्ण भगवान् कहकर प्रमाणित किया गया है, वे गोकुलके वैभवरूप गोलोकमें व्रजरस (दास्य-सख्य-वात्सल्य-शृङ्गाररस) के सभी उपकरणों (धाम-परिकरादि) के साथ नित्य विहार करते हैं। इसीका नाम अप्रकट-विहार है, क्योंकि यह बद्धजीवोंको दृष्टिगोचर नहीं है। जगत्में अवतीर्ण होकर प्रतिकल्पमें अर्थात् ब्रह्माके एक-एक दिनमें वे एक बार प्रकट-विहार करते हैं॥५-६॥ अमृतानुकणिका-स्वयं भगवान् श्रीगोविन्दका सर्वोपरि-स्थित, नित्यानन्द-लीलापूर्ण परमधाम गोलोक है। इस स्वधाम गोलोकमें वे स्वयंरूप, स्वयंप्रकाश और परिकरोंके साथ सतत विविध प्रेमलीलामें मग्न होकर परमानन्दसे विराज करते हैं। इस गोलोकके अन्य नाम-श्वेतद्वीप, श्रीवृन्दावन, श्रीगोकुल और व्रजधाम हैं (आदि ५/१७)। गोलोक और गोकुलमें कोई भी भेद नहीं है। श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिसे गोलोक जब प्रपञ्चमें प्रकटित होता है, तब उसे ही भौम-गोकुलादि कहते हैं। प्रपञ्चमें प्रकाशित होनेपर भी गोकुल चिन्मयधामरूपमें वर्तमान होता है। वह किसी प्रकारसे जड़-देश-कालादिके द्वारा कुण्ठित होकर अपने वैकुण्ठ-तत्त्व-रूप अविकुण्ठ अवस्थासे च्युत नहीं होता। किन्तु मायिक जीव जड़ेन्द्रियोंसे उसके उस अविकुण्ठ स्वरूपका दर्शन नहीं कर पाते, उसको भी सदोष प्रपञ्चके समान ही देखते हैं। इसलिये प्रपञ्चागत गोकुल-नायक श्रीकृष्णको भी वे साधारण मनुष्य रूपमें देखते हैं। किन्तु विज्ञानयुक्त बुद्धिमान् महात्मा दोनोंको एक समान प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं। श्रील रूपगोस्वामीने लघुभागवतामृतम्में कहा है- “यत्त गोलोकनाम स्यात् तच्च गोकुल-वैभवम्।” अर्थात् गोलोक गोकुलका वैभव है। किन्तु ऐसा होनेपर भी, बद्धजीवके पक्षमें भौम-गोकुलकी उपयोगिता ही अधिक है। उसका प्रभाव साक्षात् सम्बन्धसे हमारे जैसे जीवोंके ऊपर अधिक कार्यकारी है। भूलोक-अवतरित गोकुल-वृन्दावन ही हमारा परम आशा-स्थल है॥५-६॥ सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि-चारियुग जानि। सेइ चारियुगे दिव्य एकयुग मानि ॥७॥ ९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/७-१० ] एकात्तर चतुर्युगे एक मन्वन्तर। चौद्द मन्वन्तर ब्रह्मार दिवस भितर ॥८॥ अनुवाद—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, ये चार युग होते हैं। ये चारों युग मिलकर एक दिव्य-युग कहलाते हैं। इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर होता है और ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं॥७-८॥ अनुभाष्य—[“चतुर्युगमुदाहृतम्। सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः। युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरमिहोच्यते॥ ससन्ध्यस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाचतुर्दश। कृतप्रमाणः कल्पादौ सन्धिः पञ्चदशः स्मृतः॥ इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः। कल्पो ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती॥”—सूर्यासिद्धान्ते मध्यमाधिकारः] अर्थात् “चार लाख बत्तीस हजार (४,३२,०००) सौरवर्षोंका एक कलियुग होता है। कलियुगसे दो गुणा द्वापरयुगका [८,६४,००० सौरवर्षोंका], तीन गुणा त्रेतायुगका [१२,९६,००० सौरवर्षोंका] और चार गुणा सत्ययुगका [१७,२८,००० सौरवर्षोंका] काल है। इसलिये चतुर्युग (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग) का कुल परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार (४३,२०,०००) सौरवर्ष है; इसीको एक महायुग कहा जाता है। इस महायुगको दिव्ययुग भी कहते हैं। इकहत्तर महायुगोंका एक मन्वन्तर होता हैं। चौदह मन्वन्तरोंका काल (१४x७१=) नौ सौ चौरानवे (९९४) महायुग है। इन चौदह मन्वन्तरोंके अन्तर्गत पन्द्रह सत्ययुगके परिमाणका सन्धिकाल होता है। यह सन्धिकाल अर्थात् पन्द्रह सत्ययुगोंके परिमाणका काल [१५x१७,२८,०००=२,५९,२०,००० सौरवर्ष] छह महायुगोंके काल [६x४३,२०,०००=२,५९,२०,००० सौरवर्ष] के बराबर होता है। इस प्रकार चौदह मन्वन्तरों और तदन्तर्गत सन्धिकालको मिलाकर एक हजार महायुगोंके कालके बराबर ब्रह्माका एक दिन अथवा एक कल्प होता है और इतने ही कालके बराबर ब्रह्माकी रात्रि होती है॥”७-८॥ ‘वैवस्वत’-नाम एइ सप्तम मन्वन्तर। साताइश चतुर्युग गेले ताहार अन्तर ॥९॥ अनुवाद—वर्तमान सप्तम मन्वन्तरका नाम ‘वैवस्वत’ है और इसके सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं॥९॥ अनुभाष्य—वैवस्वत-नामके सातवें मनुके मन्वन्तरमें श्रीमन्महाप्रभुका आविर्भाव होता है। “स्वायम्भुवाख्यो मनुराद्य आसीत्, स्वारोचिषश्चोत्तम-तामसाख्यौ। जातौ ततो रैवतचाक्षुषौ च वैवस्वतः सम्प्रति सप्तमोऽयम्॥ सावर्णिर्दक्षसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिकस्ततः। धर्मसावर्णिको रुद्रपुत्रो रौच्यश्च भौत्यकः॥” (१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिष, (३) उत्तम, (४) तामस, (५) रैवत, (६) चाक्षुष, (७) वैवस्वत, (८) सावर्णि, (९) दक्षसावर्णि, (१०) ब्रह्मसावर्णि, (११) धर्मसावर्णि, (१२) रुद्रपुत्र (सावर्णि), (१३) रौच्य (देवसावर्णि) और (१४) भौत्यक (इन्द्रसावर्णि)—ये चौदह मनु हैं। प्रत्येक मनुका भोगकाल इकहत्तर महायुग है॥९॥ अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे। व्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे ॥१०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०॥ तीसरा अध्याय | ९७
[ ३/१०-१३ अमृतप्रवाह भाष्य-वैवस्वत-मन्वन्तरके अट्ठाइसवें चतुर्युगमें द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अपने ब्रजतत्त्वके समस्त उपकरणों (धाम-परिकरादि) को लेकर प्रकट होते हैं॥१०॥ अनुभाष्य-वैवस्वत मन्वन्तरके इकहत्तर महायुगोंमें सत्ताइस महायुग पूर्ण होनेके बाद अट्ठाइसवें चतुर्युगमें सत्य और त्रेतायुगके बाद द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्णका आविर्भाव होता है। उस समय तक ब्रह्माका दिन प्रारम्भ होनेसे लेकर सन्धिसहित छह मनुओंके पूर्ण भोगकाल और वैवस्वत मनुके सत्ताईस महायुग तथा सत्य, त्रेता एवं द्वापरयुगके अन्ततक कुल (सृष्टिकालको छोड़कर) सौरवर्षकी संख्यासे एक अरब सत्तानवे करोड़ तिरपन लाख बीस हजार (१,९७,५३,२०,०००) वर्ष व्यतीत हो चुके होते हैं॥१०॥ शान्तरसके अतिरिक्त चार प्रकारके मुख्यरस :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, शृङ्गार-चारि रस। चारि भावे भक्त यत, कृष्ण तार वश ॥ ११॥ अनुवाद-दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार-ये चार प्रकारके रस हैं। इन चार भावोंके जितने भक्त हैं, श्रीकृष्ण उनके द्वारा वशीभूत होते हैं॥११॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रस ही कृष्णलीलाके प्रकरण (मूल आधार) हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार नामक पाँच प्रकारके रस हैं। उसमेंसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररस-इन चार प्रकारके रसोंके भक्तोंके द्वारा ही श्रीकृष्ण सम्पूर्णरूपसे वशीभूत होते हैं॥११॥ अनुभाष्य-यहाँपर 'शान्त' रसका उल्लेख नहीं करनेका कारण यह है-यद्यपि जड़जगत्में शान्तरस सबसे उच्चस्थानमें अवस्थित है, तथापि चित् जगत्में इसका स्थान सबसे निम्न है। शान्तरस अप्राकृत होनेपर भी इस रसके आलम्बन विषय (भगवान्) और आश्रय (भक्त) में परस्पर ज्ञेय और ज्ञातृ-भावका विनिमय नहीं है। इसलिये दास्यसे सख्यमें, सख्यसे वात्सल्यमें और वात्सल्यसे मधुर रसमें श्रीकृष्णप्रीतिके उत्कर्षका तारतम्य विद्यमान है॥११॥ दास-सखा-पिता-माता-प्रेयसीगण लञा। व्रजे क्रीड़ा करे कृष्ण प्रेमाविष्ट हञा॥१२॥ अनुवाद-व्रजमें श्रीकृष्ण प्रेममें आविष्ट होकर अपने दास, सखा, पिता-माता तथा प्रेयसियोंके साथ लीलाएँ करते हैं॥१२॥ अमृतानुकणिका-'दास'-श्रीकृष्णके दास्यभावके भक्त नन्द महाराजके सेवक रक्तक-पत्रकादि; 'सखा'-सख्यभावके भक्त सुबल-मधुमङ्गलादि; 'पिता-माता'-वात्सल्य भावके भक्त, नन्द महाराज श्रीकृष्णके नित्य पिता और यशोदा उनकी नित्य माता; 'प्रेयसीगण'-मधुर भावके भक्त, श्रीराधादि व्रजसुन्दरियाँ ॥ १२ ॥ औदार्यप्रधान गौर-अवतारकी सूचना :- यथेष्ट विहरि' कृष्ण करे अन्तर्धान। अन्तर्धान करि' मने करे अनुमान ॥ १३ ॥ ९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१३-१६ ] चिरकाल नाहि करि प्रेमभक्ति दान। भक्तिबिना जगतेर नाहि अवस्थान॥१४॥ जगत् वैधीभक्तिके द्वारा ही परिचालित; इसलिये श्रीकृष्णप्रेमसे अनभिज्ञ :- सकल जगते मोरे करे विधि भक्ति। विधि-भक्त्ये व्रजभाव पाइते नाहि शक्ति॥१५॥ ऐश्वर्य-ज्ञाने सब जगत् मिश्रित। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत॥१६॥ अनुवाद- श्रीकृष्ण प्रकटलीलामें यथेष्ट विहार करके जब अन्तर्धान हो गये, तब वे मनमें कुछ विचार करने लगे, - “मैंने चिरकालसे इस प्रेमभक्तिका दान जगत्में नहीं किया है, भक्तिके बिना जगत्के अस्तित्त्वका कोई प्रयोजन नहीं है, अर्थात् भक्तिके बिना जीवोंका इस संसारसे उद्धार नहीं होगा। सारा जगत् मेरी वैधी अर्थात् शास्त्रके शासनानुसार भक्ति करता है, किन्तु वैधी-भक्तिसे व्रजभावको प्राप्त करना सम्भव नहीं है। सारे जगत्की भक्ति मेरे ऐश्वर्य-ज्ञानसे मिश्रित है, किन्तु इस ऐश्वर्यज्ञानसे शिथिल प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥१३-१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं]- अभी तक मैंने जगत्को अपनी प्रेमभक्तिका दान नहीं किया है। शास्त्रोंका अध्ययनकर जगत्में सभी लोग वैधीभक्तिके द्वारा मेरा भजन करते हैं। किन्तु मेरा परमभाव जो व्रजभाव है, उसे वैधीभक्तिके द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। वैधीभक्तिमें ऐश्वर्यज्ञान ही प्रबल है। ऐश्वर्यभावसे प्रेम शिथिल हो जाता है अर्थात् प्रेममें गाढ़ता नहीं रहती। इसलिये ऐसे प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥१४-१६॥ अमृताणुकणिका- अप्रकट गोकुलका ही एक प्रकाश मायिक-ब्रह्माण्डमें जब लोगोंके दृष्टिगोचर होता है, तब उसे प्रकट-प्रकाश कहते हैं। इस प्रकट प्रकाशमें सभी लीलाएँ करनेके बाद श्रीकृष्ण जब अप्रकट-प्रकाशके साथ प्रकट-प्रकाशको एकीभूत करते हैं, तब मायिक ब्रह्माण्डमें लीला दिखायी नहीं देती; यही प्रकट-लीलाका अन्तर्धान होना है। श्रीकृष्ण जब ब्रह्माण्डमें लीला प्रकट करते हैं, तब भी अप्रकट गोकुलमें एक स्वरूपसे नित्य परिकरोंके साथ लीला करते हैं। परिकर भी एक स्वरूपसे अप्रकट गोकुलमें और एक स्वरूपसे प्रकट लीलामें रहते हैं। बृहद्भागवतामृतम् (२/५/५२, २/५/५४) में श्रीसनातन गोस्वामीने भी श्रीनारदकी उक्तिमें यह प्रकाश किया है- “यथा हि भगवानेकः श्रीकृष्णो बहुमूर्त्तिभिः। बहुस्थानेषु वर्त्तत तथा तत्सेवका वयम्॥५२॥ सर्वेऽपि नित्यं किल तस्य पार्षदाः, सेवापराः क्रीड़नकानुरूपाः। प्रत्येकमेते बहुरूपवन्तोऽ- प्यैक्यं भजामो भगवान् यथासौ ॥” ५४॥ अर्थात् “जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण एक होते हुए भी भिन्न-भिन्न स्थानोंपर भिन्न-भिन्न मूर्तियोंमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार उनके सेवक हम भी अनेक स्थानोंपर अनेक स्वरूपोंसे रहते हैं। हम सभी भगवान्के नित्य पार्षद हैं और सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहते हैं। प्रभु तीसरा अध्याय | ९९
[ ३/१३-१६
जब जैसी क्रीड़ा करनेकी इच्छा करते हैं, हम भी प्रभुकी उस क्रीड़ाके अनुरूप स्वरूप धारण करते हैं। इसलिये भगवान्की भाँति हमारा भी एक स्वरूप होते हुए भी हम अनेक स्वरूप धारण करते हैं।” एक ही पार्षदकी इस प्रकार बहुमूर्ति होनेपर भी ऐक्यकी हानि नहीं होती। प्रकट-व्रजके परिकरोंका अप्रकट-गोकुलमें स्थित उस-उस स्वरूपके साथ एकीभूत हो जाना ही प्रकट-लीलाका अन्तर्धान है। 'भक्तिबिना जगतेर नाहि अवस्थान' - मायिक वस्तुओंमें अभिनिवेशके कारण ही जीव नाना योनियोंमें भ्रमण करते हुए अनेक दुःख भोग करता है। इसलिये किसी भी एक अवस्थामें तब तक जीव नित्य अवस्थान नहीं कर पाता। केवल ज्ञान-कर्म-योगादिसे अनावृत शुद्धभक्तिके द्वारा ही मायिक अभिनिवेश दूर होनेपर जीव अपने स्वरूपमें अवस्थित हो सकता है। भक्तिकी सहायतासे योग-ज्ञानादिके द्वारा मोक्ष प्राप्त करने पर भी जीवका आत्यन्तिक कल्याण नहीं होता। मुक्त होनेपर भी जीवकी तब प्रेमभक्तिसहित श्रीकृष्ण सेवाकी भावना उत्पन्न हो सकती है, क्योंकि उसे अपनी उस मुक्तावस्थामें भी परितृप्ति नहीं होती। श्रीकृष्ण सेवाके निमित्त मुक्त जीवोंमें वे किसी-किसीकी भजन करनेकी बात सुनी जाती है। 'मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते'। - नृसिंहतापनी २/५/१६का शङ्करभाष्य। इसलिये अपनी-अपनी अवस्थामें मुक्त पुरुषोंका भी ऐकान्तिक अवस्थान नहीं दिखायी देता है। (भागवत १०/८९/५९) कारणोदशायी विष्णु-वचन-'द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षुणा मयोपनीता' अर्थात् 'श्रीकृष्ण और अर्जुन ! मैं तुम दोनोंके दर्शनके लिये ही ब्राह्मणके बालक अपने पास लाया था।' और (भागवत १०/१६/३६) नागपत्नियोंके वचन- 'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत् तपो, विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता' अर्थात् 'हे देव ! जिस पद-रेणुकी प्राप्तिकी आशासे ललना लक्ष्मीजीने समस्त विषय-भोगोंका परित्याग करके बहुत दिनोंतक व्रत-नियमोंको धारण करते हुए तपस्या की थी'; इन श्लोकोंसे यह समझा जाता है कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णका सर्वचित्तहारी माधुर्य परव्योममें स्थित भगवत्-स्वरूपों और उनकी लक्ष्मियोंको भी आकर्षित करता है। तब जिन्होंने ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा भक्तिके साधनसे सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करके परव्योममें वास करनेका सौभाग्य प्राप्त किया है, श्रीकृष्ण-माधुर्यकी कथा सुनकर उसके आस्वादनका लोभ उनके भी चित्तको चञ्चल करेगा, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। किन्तु जिन्होंने व्रजके श्रीकृष्णकी प्रेमसेवाका अधिकार प्राप्त किया है, उनकी भगवान्के अन्य किसी भी स्वरूपकी सेवा अथवा अन्य किसी भी धाममें अवस्थानके निमित्त उनकी कोई भी वासना जाग्रत होती देखी नहीं जाती। व्रजमें श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा प्राप्त होनेपर जीवकी आत्यन्तिकी स्थिरता सिद्ध होती है॥१३-१४॥ शास्त्रोंमें जीवोंके लिये जो कर्त्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उसे विधि कहते हैं और जिन्हें करनेके लिये मना किया गया है, उसे निषेध कहते हैं। विधिको पालन और निषेधका त्याग ही जीवोंके लिये वैध धर्म है। भगवान् विष्णुको सर्वदा स्मरण करना चाहिये - यही मूलविधि है। वर्ण और आश्रमकी समस्त विधियाँ इस मूलविधिके अनुगत हैं। भगवान्को कभी मत भूलो - यही मूल निषेध है। पापोंका निषेध, विमुखताका वर्जन, पापोंका प्रायश्चित्तादि उक्त मूल निषेध-विधिके अनुगत हैं। इन विधि-निषेधोंका पालन करना ही शास्त्रोंका शासन मानना है।
१०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
शास्त्र-विहित कर्मोंको करनेसे और साथ ही शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंके त्यागसे जीवका कल्याण होता है; इसका विपरीत आचरण जीवके लिये नरकके मार्गको प्रशस्त करता है। शास्त्रोंके इस शासन-भयसे भक्तिमें जीवोंकी प्रवृत्ति होनेपर उसे वैधीभक्ति कहते हैं। भगवान्को चित्-अचित् जगत्का स्वामी और नियन्ता जानकर उनके ऐश्वर्यज्ञानके कारण जीव स्वयंको अति क्षुद्र मानता है। इस कारण उसका भगवान्के प्रति सम्भ्रम भाव और अपराधकी सम्भावनाका भय उसके हृदयमें रहता है। इस कारण उसका प्रेम सङ्कुचित हो जाता है। (भागवत १०/४४/५०-५१)—कंसके वधके पश्चात् देवकी-वसुदेवको कारागारसे मुक्त कराकर जब श्रीकृष्ण-बलरामने उनके चरणोंमें प्रणामकर वन्दना की, तब देवकी और वसुदेव उन प्रणत पुत्रोंको जगदीश्वर जानकर शङ्कित होकर उनको आलिङ्गन नहीं कर सके, परन्तु हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े रहे। इस प्रकार देवकी-वसुदेवका वात्सल्य भाव सङ्कुचित हो गया था। (गीता ११/४१-४२)—कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके विश्वरूपके दर्शन करके श्रीकृष्णसखा अर्जुनका सख्यभाव सङ्कुचित हो गया और वे श्रीकृष्णसे क्षमा याचना करने लगे—'आपकी इस महिमाको नहीं जानकर मैंने सखा मानकर प्रमादवश अथवा प्रणयवश हठपूर्वक आपको जो हे कृष्ण! हे यादव ! हे सखे ! आदिसे सम्बोधित किया है तथा हे अच्युत ! परिहासके लिये एकान्तमें अथवा अन्यान्य बन्धुओंके समक्ष विहार, शयन, आसन, भोजनादिके समय आप मेरे द्वारा जो असम्मानित हुए हैं, उन सबके लिये मैं आपसे अपरसीम क्षमा-याचना करता हूँ।' (भागवत १०/६०/१०-२४)—एक समय द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णने परिहासमें रुक्मिणीजीसे कहा—“राजकुमारी! बड़े-बड़े राजा, जिनके पास लोकपालोंके समान ऐश्वर्य है, सुन्दरता और बलमें भी बहुत आगे बढ़े हुए हैं, तुमसे विवाह करना चाहते थे और तुम्हारे पिता-भ्राताने उनके साथ विवाहके लिये वाग्दान भी कर दिया था। तुमने उनको छोड़कर मेरे जैसे व्यक्तिको, जो किसी प्रकारसे तुम्हारे समान नहीं है, अपना पति स्वीकार किया। सुन्दरी! मैं तो सदासे अकिञ्चन हूँ। ऐसे ही अकिञ्चन लोगोंसे मैं प्रेम भी करता हूँ और वे लोग भी मुझसे प्रेम करते हैं। जिनका धन, कुल, ऐश्वर्य, सौन्दर्य अपने समान होता है, उन्हींसे विवाह और मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षत्रियका वरण कर लो।” जब रुक्मिणीजीने अपने परम प्रियतम पतिकी यह अप्रिय वाणी सुनी—जो पहले कभी नहीं सुनी थी, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गयीं और वियोगकी सम्भावनासे वे तत्क्षण इतनी दुबली हो गयीं कि उनकी कलाईका कङ्कन खिसक गया, हाथका चँवर गिर गया और वे एकाएक अचेत हो गयीं। अर्थात् उनका कान्ताप्रेम भी शिथिल हो गया। इसलिये जब भी कुछ सङ्कोच, भय अथवा गौरव-बुद्धि आकर भक्तके हृदयमें उपस्थित होती है, तभी श्रीकृष्णका आनन्द भी सङ्कुचित हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेमाभक्तिमें ही प्रीति होती है। उस प्रेमाभक्तिको पाकर भक्तगण सालोक्य, तीसरा अध्याय | १०१
सार्ष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्तियोंका भी आदर नहीं करते हैं, वे श्रीकृष्णके सेवासुखको ही चरम प्राप्य मानते हैं। यह प्रेमाभक्ति रागमार्गमें ही साध्य है। श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यके द्वारा रागमार्गमें रुचि सिद्ध होती है; इसमें ऐश्वर्य ज्ञानका कोई स्थान नहीं है। इसलिये प्राक्तन और आधुनिक, दोनों प्रकारके लोभविशिष्ट भक्तजन जब श्रीकृष्णके नित्य परिकरोंके भाव-प्राप्ति हेतु उपाय जाननेके लिये जिज्ञासु होते हैं, तब उसी अवस्थामें शास्त्र और तदनुकूल युक्तिकी अपेक्षा देखी जाती है; क्योंकि केवल शास्त्र-प्रतिपादित युक्तिके द्वारा निर्दिष्ट उपायसे ही उक्त लोभनीय भावकी प्राप्ति हो सकती है। इसके अतिरिक्त उक्त भावको पानेके लिये कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उदाहरण स्वरूप कह रहे हैं— “जैसे किसी व्यक्तिको दूध पीनेके लिये लोभ हुआ, तब दूध कैसे मिले? इसके लिये उपाय जाननेके लिये इच्छा होती है। उसी समय दूध-लोभी व्यक्तिको एक ऐसे विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशकी आवश्यकता होती है, जिससे वह सहज ही दूध प्राप्त कर सके। तदनन्तर गाय खरीद करे, उसे खिलाये-पिलाये, फिर बच्चा होनेपर गायका दूध दोहन करे और फिर उस दूधको पिये। इस प्रकार उस विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशानुसार लोभी व्यक्तिको गाय खरीदने, घास-भूसा खिलाने तथा गो-दोहन आदिके विषयमें विविध प्रकारकी शिक्षाओंको सीखना होता है। इसी प्रकार लोभ-विशिष्ट साधकको शिक्षा लाभ करनी होती है। उपदेश श्रवणके बिना स्वतः ज्ञान लाभ नहीं होता। श्रीमद्भागवतम् (८/६/१२ श्लोक)में ब्रह्माजीने ऐसा ही कहा है—मनुष्य जैसे उपाय परम्पराके द्वारा लकड़ीसे अग्नि, गायसे दूध, पृथ्वीसे अन्न और जल, वाणिज्य-व्यवसायसे अपनी जीविका प्राप्त करता है, उसी प्रकार हे विष्णो! पण्डितगण बुद्धिके द्वारा सत्त्वादि गुणोंसे आप निर्गुणको प्राप्त होते हैं।” उसी प्रकार हरिभजनमें लोभोत्पत्ति होनेपर उसके लिये उपाय जाननेके लिये शास्त्रोंके उपदेशोंकी और साधु-गुरु पदाश्रयकी अपेक्षा दिखलायी देती है। साधुमार्गका अनुसरण एकान्त आवश्यक है, उसका उल्लङ्घन करनेसे हरिभजनका उपाय नहीं जाना जा सकता। कोई-कोई व्यक्ति साधुमार्गका उल्लङ्घन करके कहते हैं कि मुझे अनुराग हो गया है और वे नयी-नयी प्रणाली प्रवर्तन करके उसके द्वारा प्रतिष्ठा अर्जनमें तत्पर हो जाते हैं। वे अपने अनुगत लोगोंको कहते है कि वे सिद्ध हो गये हैं और ऐसा प्रचार करके सरल लोगोंको भ्रान्त पथमें ले जाते है। अपनी (पुरुष) जड़देहको स्त्री रूपमें सजाकर निजभजन-प्रणालीको उदाहरण स्वरूपमें निर्देश करते हैं। ऐसे साधुमार्गके उल्लङ्घनकारियोंको लक्ष्य करके शास्त्रमें उपदेश दिया गया है (भक्तिसन्दर्भ २८४)— “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातयैव केवलं॥” अर्थात् “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” ऐकान्तिकी हरिभक्ति ही तो प्रार्थनीय वस्तु है, तो शास्त्रोंमें इसे किस प्रकार उत्पातका कारण बतलाया गया है? इस श्लोकका उद्दिष्ट मर्म इस प्रकार है—यदि कोई शास्त्रशासन ना मानकर
३/१३-१८ ] लोभमें ही प्रवृत्त होकर शुद्धभजन-प्रणालीका उल्लङ्घन करके नयी प्रणालीका अवलम्बन और प्रवर्त्तन करे, तब उसके फलस्वरूप उत्पात ही प्राप्त होगा, हरिभक्ति प्राप्त नहीं होगी। ऐसा रागात्मिका भक्तिके रसाचार्य स्वयं श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तीपादने इस प्रकार हठात् भक्तोंको सावधान किया है। जो स्वयंको गौड़ीय सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त मानते हैं, वे कभी भी श्रील चक्रवर्त्तीपादके उपदेशका उल्लङ्घन करके अपने स्वतन्त्र मतकी बुद्धि पोषण नहीं करते हैं। जो इस प्रकार करते हैं, वे गौड़ीय भक्त नहीं है, अथवा चारों सत्सम्प्रदायोंमें किसी भी सम्प्रदायके भक्त नहीं हैं। इसलिये वे भक्त ही नहीं हैं, क्योंकि सम्प्रदाय-भिन्न शुद्धभक्त नहीं होते, “सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते विफला मताः।” श्रीरूपगोस्वामीने श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (श्लोक १/२/२९५)में स्पष्ट कहा है- “सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावालिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः ॥” रागानुगा भक्तिका अनुष्ठान दो प्रकारसे किया जाता है-साधकरूपसे अर्थात् यथावस्थित देह (बाह्यदेह) के द्वारा, सिद्धरूपसे अर्थात् अपने अभिलषित प्रेमसेवाके उपयोगी अन्तश्चिन्तित देहके द्वारा व्रजस्थित अपने अभीष्ट श्रीकृष्णके और श्रीकृष्णके प्रियकरोंके भाव या श्रीकृष्ण-विषयक रति प्राप्त करनेके लिये लुब्ध होकर उन व्रजलोकके परिकरों, श्रीकृष्णके अत्यन्त प्रियजनों, श्रीराधिका-ललिता-विशाखा-श्रीरूपमञ्जरी आदि एवं उनके अनुगत श्रीरूपगोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी आदिके अनुसार करना होता है। सिद्धरूपसे मानसी-सेवा श्रीराधा-ललिता- विशाखा-श्रीरूपमञ्जरी आदि व्रजवासियोंके अनुसार करनी होगी तथा साधकरूपसे कायकी सेवा श्रीरूप-सनातनादि व्रजवासी महानुभावोंके अनुसार करनी होगी। लोभनीय-भावप्राप्तिकी आकाङ्क्षावाले व्यक्ति रागमार्गमें व्रजवासियोंके अर्थात् शुद्ध मधुररसके उपासकजनोंके अनुसरणमें साधक रूपमें और यहाँ तक कि सिद्धावस्थामें भी सेवारत होंगे, स्वयं कोई नयी प्रणालीका आविष्कार नहीं करेंगे ॥ १३-१६॥ गौरव-भावमयी वैधीभक्तिके फलसे चतुर्विध मुक्ति और वैकुण्ठमें नारायण-प्राप्ति :- ऐश्वर्यज्ञाने विधि भजन करिया। वैकुण्ठके याय चतुर्विध मुक्ति पाञा ॥ १७॥ सार्ष्टि, सारूप्य आर सामीप्य, सालोक्य। सायुज्य ना लय भक्त याते ब्रह्म-ऐक्य ॥ १८ ॥ अनुवाद-ऐश्वर्य-ज्ञानसे वैधी-भक्ति करके भक्तलोग चार प्रकारकी मुक्तियोंमें किसी एक प्रकारकी मुक्तिको पाकर वैकुण्ठमें जाते हैं। सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्य, इन चार प्रकारकी मुक्तियोंको तो भक्त ग्रहण करते हैं, किन्तु वे 'जीव-ब्रह्म-ऐक्य' कहलानेवाली सायुज्य मुक्तिको कभी स्वीकार नहीं करते ॥ १७-१८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सार्ष्टि'-विष्णुके समान ऐश्वर्यकी प्राप्ति; 'सारूप्य'-विष्णुकी भाँति चतुर्भुजादि रूप और वर्णकी प्राप्ति; 'सामीप्य'-विष्णुके निकट अवस्थिति; 'सालोक्य'-विष्णुलोकमें वास करना ॥ १८॥ तीसरा अध्याय | १०३
[ ३/१७-१८ अनुभाष्य- (भा: ३/२९/१३)- “सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥” अर्थात् “सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य मुक्तिको मेरे द्वारा दिये जानेपर भी मेरे भक्त मेरी सेवाको त्याग करके उन्हें ग्रहण नहीं करते।” (भा: ९/७/६७) भी द्रष्टव्य है॥ १८ ॥ अमृतानुक्रमणिका - यहाँ प्रश्न हो सकता है - ऐश्वर्य ज्ञानसे शिथिल प्रेममें श्रीकृष्णकी प्रीति नहीं है, तो क्या ऐश्वर्य ज्ञानसे वैधी भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंका भजन सम्पूर्णतया व्यर्थ है ? इसके उत्तरमें ग्रन्थकार कह रहे हैं- “नहीं उनका भजन व्यर्थ नहीं है। वे यद्यपि व्रजभावसे श्रीकृष्णकी सेवा लाभ नहीं कर सकते, तथापि वे चार प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे किसी एक प्रकारकी मुक्तिको प्राप्तकर वैकुण्ठमें विष्णुकी अपने रसके अनुरूप सेवा लाभ करते हैं। ऐश्वर्य-प्रधान भक्तोंकी ऐश्वर्य-प्रधान वैकुण्ठमें ही गति है।” (भःरःसिः पूर्व विभाग चतुर्थ लहरी-१४)- “महिमेज्ञानयुक्तः स्याद्विधिमार्गानुसारिणाम्।” अर्थात् “विधिमार्गके भजनमें भगवान्के माधुर्यका ज्ञान प्रधान ना होकर उनकी महिमाका ज्ञान ही प्रधान होता है।” (भःरःसिः पूर्व विभाग चतुर्थ लहरी-१२)- “माहात्म्यज्ञानयुक्तस्तु सुदृढ़ सर्वतोऽधिकः। स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया साष्ट्र्यादि नान्यथा ॥” अर्थात् “माहात्म्यज्ञानयुक्त, सुदृढ़ और सर्वतोभावसे अधिक जो स्नेह है, उसे प्रेम-भक्ति कहा जाता है। उससे सार्ष्टि आदि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है, उस मुक्तिको पानेका और कोई उपाय नहीं है।” बृहद्भागवतामृतम् (२/४/१३२) में श्रीनारदकी गोपकुमारके प्रति उक्ति- “स वै विनोदः सकलोपरिष्टाल्लोके क्वचिद्भाति विलोभयन् स्वान्। सम्पाद्य भक्तिं जगदीश-भक्त्या वैकुण्ठमेत्यात्र कथं त्वयेक्ष्यः ॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी वैसी क्रीड़ा समस्त लोकोंके ऊपर विराजमान किसी एक एकान्त स्थानपर अपने समस्त भक्तोंके मनका हरण करते हुए प्रकाशित रहती है। तुमने प्रभुके प्रति जगदीश बुद्धिसे भक्तिकर इस वैकुण्ठलोकको प्राप्त किया है, इसलिये यहाँपर वैसी क्रीड़ाका सुख किस प्रकार अनुभव करोगे?” अवश्य किसी शुद्धभक्त-वैष्णवकी कृपा होनेपर विधिमार्गके भजनमें भी ऐश्वर्यज्ञानहीना शुद्धभक्तिकी कृपा प्राप्त हो सकती है।” सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियोंके अतिरिक्त एक प्रकारकी मुक्ति है, जिसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं; उपास्यके स्वरूपके साथ मिलित होनेका नाम 'सायुज्य' है। वास्तवमें सायुज्य मुक्तिमें जीव उपास्य स्वरूपके साथ तादात्म मात्र ही प्राप्त करता है (अग्निके संयोगसे जैसे लोहा अग्नि-तादात्म्य प्राप्त करता है, उसी प्रकार); उपास्यके स्वरूपके साथ अभेदत्व प्राप्त नहीं करता है और कर भी नहीं सकता, क्योंकि जीव स्वरूपतः ब्रह्म अथवा ईश्वर नहीं हो सकता। किसीके भी स्वरूपका व्यतिक्रम कभी भी नहीं हो सकता। यह सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है-ब्रह्म-सायुज्य और ईश्वर-सायुज्य। निर्विशेष-ब्रह्मके साथ जो सायुज्य प्राप्त करते हैं, उनकी १०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१७-१९ ] मुक्तिको ब्रह्म-सायुज्य कहते हैं। और भगवान्के किसी भी एक सविशेष स्वरूप (नारायण-नृसिंहादिके) साथ जो सायुज्य प्राप्त करते हैं, उनके सायुज्यको ईश्वर-सायुज्य कहते हैं। जो सायुज्य-मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे ब्रह्मके अथवा ईश्वरके आनन्दमें ही निमग्न रहते हैं। इसलिये उनके स्वतन्त्र अस्तित्वका ज्ञान अथवा स्वरूपानुबन्धि कर्त्तव्य-भगवत्-सेवाका अनुसन्धान भी उनके चित्तमें प्राधान्य लाभ नहीं कर पाता; अथवा साधारणतः उदित भी नहीं हो पाता। किन्तु जो भक्त हैं, वे अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखकर भगवान्की सेवाकी ही कामना करते हैं। इसलिये कोई भी भक्त सायुज्य-मुक्तिकी कामना नहीं करते हैं, भगवान्के देनेकी इच्छा होनेपर भी उसे ग्रहण नहीं करते। साधारणतः वैकुण्ठमें विष्णुके समान ऐश्वर्य प्राप्तिको 'सार्टि' मुक्ति कहा जाता है। किन्तु पार्षदोंका ऐश्वर्य भगवान्के समान कभी भी नहीं हो सकता। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृतम् (२/४/१९९) की टीकामें लिखा है— “एवं पार्षदेभ्यस्तेभ्योऽपि सकाशाद्भगवत्ताभिधेय-स्वाभाविक-परमैश्वर्यविशेषापेक्षया, तथानन्यसाधारण- मधुरमधुरविचित्र-सौन्दर्यादि-महिमविशेष-दृष्ट्या भगवतो महान् विशेषः सिध्यत्येव; अन्यथा सदा परमभावेन तेषां तस्मिन् विचित्रभजनरसानुपपत्तेरिति दिक्।” अर्थात् “सच्चिदानन्दघन रूपमें पार्षदों और भगवान्में समानता रहनेपर भी पार्षदोंकी तुलनामें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका प्रतिपादन करनेवाले स्वाभाविक परम-ऐश्वर्य विशेष तथा अनन्य (अर्थात् जिस सौन्दर्य-माधुर्यका एकमात्र स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त भगवान्के अन्य किसी स्वरूपमें प्रकाश नहीं है) और असाधारण, मधुरसे भी मधुर नाना-प्रकारके सौन्दर्य आदि विशेष महिमाओंको देखकर श्रीकृष्णकी महान विशेषता स्वतः ही सिद्ध होती है। अन्यथा उनके पार्षदोंके द्वारा सर्वदा ही परम भावोंके साथ श्रीकृष्णके नाना-प्रकारके भजनरसरूप सुखका अनुभव करना सम्भव नहीं होता।” उपर्युक्त सालोक्यादि जो चार प्रकारकी मुक्तियाँ हैं, उन्हें प्राप्तकर मुक्तजीव पार्षद देह धारणकर वैकुण्ठमें वास करते हैं। उनको उपास्यदेवके धामके स्वरूपगत धर्मके कारण वहाँके सुख और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। सालोक्यादि चार मुक्तियाँ सुखैश्वर्योत्तरा और प्रेम-सेवोत्तरा दो प्रकारकी होती हैं (भःरःसिः पूर्व विभाग २/५६)। जिनके चित्तमें अपने उपास्यके धामके सुख और ऐश्वर्यको प्राप्त करनेकी वासना ही प्रधानरूपमें रहती है, उनकी मुक्तिको 'सुखैश्वर्योत्तरा' कहा गया है। जिनके चित्तमें प्रेमके स्वभाववशतः उपास्यकी सेवा करनेकी वासनाकी प्रधानता रहती है, उनकी मुक्तिको 'प्रेम-सेवोत्तरा' कहा जाता है। वैकुण्ठकी जो प्रेम-सेवा है, वह केवल ऐश्वर्य-ज्ञान मिश्रित प्रेममयी-सेवा होती है। वह उपास्यको स्वजन जानकर उनके सुख विधान करनेवाली प्रेममयी सेवा नहीं होती; मदीयता-भावमयी सेवा नहीं होती, तदीयता-भावमयी सेवा रहती है। जो सेवा चाहते हैं, वे सुखैश्वर्योत्तरा मुक्तिको ग्रहण नहीं करते॥ १७-१८॥ अपने भजनकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं श्रीकृष्णकी इच्छा :— युगधर्म प्रवर्त्तामु नाम-सङ्कीर्त्तन। चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन॥ १९॥ तीसरा अध्याय | १०५
[ ३/१९-२१ उसके लिये ही भक्त और गुरुरूपमें अवतार, प्रचार और आचार :- आपनि करिमु भक्तभाव अङ्गीकारे। आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे॥२०॥ आचार बिना प्रचार निरर्थक :- आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय। एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते गाय॥२१॥ अनुवाद—मैं स्वयं नाम-सङ्कीर्तन रूपी कलियुगधर्मका प्रवर्तन करूँगा और चार प्रकारके भावोंसे युक्त प्रेमाभक्ति देकर इस जगत्को नचाऊँगा। मैं स्वयं भक्तका भाव ग्रहण करके अपने आचरणके द्वारा सभीको भक्तिकी शिक्षा दूँगा। स्वयं आचरण नहीं करनेसे धर्मकी शिक्षा नहीं दी जाती, इसी सिद्धान्तका गीता-भागवतादि गान करते हैं॥१९-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ऐश्वर्यज्ञानसे विधिमार्गमें जो लोग भजन करते हैं, वे साष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्यरूप चार प्रकारकी मुक्तियोंको प्राप्त करके वैकुण्ठलोकमें जाते हैं। ब्रह्मके साथ एक्यरूप (एक हो जाना) सायुज्य मुक्ति है, इसके लिये वैधीभक्ति करनेवाले भी प्रार्थना नहीं करते हैं। किन्तु प्रेमभक्ति पाकर पूर्व चार प्रकारकी मुक्तियोंका भी परित्याग करके मेरे भक्त मेरी सेवाके सुखको ही स्वीकार करते हैं। ऐसी वैधीभक्तिसे श्रेष्ठ प्रेमभक्तिको जगत्में प्रचार करना ही मेरा अभीष्ट है। मैं कलियुगका धर्म, जो नाम-सङ्कीर्तन है, उसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररसके साथ जगत्को देकर सभी लोगोंको नचाऊँगा और स्वयं भी भक्तभावको ग्रहण करके अपने आचरणके द्वारा जगत्के जीवोंको शिक्षा प्रदान करूँगा॥१७-२०॥ अमृतानुकणिका—'युगधर्म प्रवर्त्तामु नाम-सङ्कीर्तन'—पूर्व-पूर्व शास्त्रकारोंने मानव हृदयमें भगवद्भाव (श्रद्धा) उदयकालसे अबतक जो सब क्रम-उन्नतिको लक्ष्य किया है, उसकी आलोचनापूर्वक युगभेदसे तारकब्रह्म नामके ही क्रम-विकासका दर्शन किया है। सत्ययुगका तारकब्रह्म नाम— “नारायण परावेदाः नारायण पराक्षराः। नारायण परामुक्तिः नारायण परागतिः ॥” इसका तात्पर्य यह है—विज्ञान, भाषा, मुक्ति और चरम गति, इन समस्त विषयोंके आस्पद नारायण हैं। ऐश्वर्यगत परब्रह्मका नाम नारायण है। वैकुण्ठमें जितने भी पार्षदोंका वर्णन है, उनमें नारायणरूप भगवद्भाव सम्पूर्ण रूपसे उपलब्ध होता है। इस अवस्थामें शुद्ध शान्तभाव देखा जाता है। त्रेतायुगका तारकब्रह्म नाम— “रामनारायणानन्त मुकुन्द मधुसूदन। कृष्ण केशव कंसारे हरे वैकुण्ठ वामन ॥” इसमें जो सब नामोंका उल्लेख है, उनमें ऐश्वर्यगत नारायणके सभी विविध विक्रम सूचित होते हैं। यह शान्त और दास्य भावपर है। द्वापरयुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे मुरारे मधुकैटभारे गोपाल गोविन्द मुकुन्द शौरे। यज्ञेश नारायण कृष्ण विष्णो निराश्रयं मां जगदीश रक्ष।” १०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१९-२१ ] इसमें जिन सब नामोंका उल्लेख है, उनसे निराश्रित व्यक्तियोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णको ही लक्ष्य किया गया है। इसमें शान्त, दास्य, गौरव-सख्य भावका प्राबल्य दिखायी देता है। कलियुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” इसको ही सर्वापेक्षा अधिक ममता विश्रम्भभाव व्यञ्जक नाममन्त्र कहा जायेगा। इसमें कोई प्रार्थना नहीं है। ममतायुक्त सभी रसोंकी उद्दीपकता इसमें दिखायी देती है। भगवान्का किसी प्रकारका विक्रम अथवा मुक्तिदाता होनेका परिचय नहीं है। केवल आत्मा जो परमात्माके द्वारा किसी अनिर्वचनीय प्रेमसूत्रसे आकृष्ट होती है, वही मात्र इसमें व्यक्त हुआ है। इसलिये माधुर्याश्रित विश्रम्भ-सेवाप्रार्थीजनोके सम्बन्धमें यह नाम एकमात्र मन्त्रस्वरूप हुआ है। इसकी अनुक्षण आलोचना ही एक मात्र उपासना है। सारग्राही व्यक्तियोंकी पूजा, व्रत, अध्ययनादि समस्त पारमार्थिक अनुशीलन इसी नामके अनुगत हैं। इसमें देश-काल-पात्रका भी विचार नहीं है। घोर पापसे आच्छादित इस कलियुगमें मनुष्यको अल्पायु, मन्दबुद्धि और बलहीन देखकर कलिकल्मषहारी पतितपावन श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रने नवद्वीपधाममें श्रीगौराङ्गरूपमें अवतीर्ण होकर कलियुगमें एकमात्र आश्रय श्रीहरिनामको महापापियोंतक सभी श्रेणीके मनुष्योंके द्वार-द्वार जाकर प्रचार किया। उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करके नामरसका आस्वादन करके जीवोंको उसका आस्वादन करनेका उपदेश दिया। कलियुगमें जीव जिस प्रकार सर्वदोष-निधि हैं, हरिनाम उसी प्रकार सभी गुणोंके मूल हैं; जीव जिस प्रकार अत्यन्त शक्तिहीन हैं, हरिनाम उसी प्रकार सर्वशक्तिमान् हैं; जीव जिस प्रकार कठिन भव-महारोगसे पीड़ित हैं, हरिनाम भी उस रोगकी एकमात्र अमोघ औषधि हैं। इसलिये शास्त्रोंमें कलियुगके जीवोंके लिये युगधर्म एकमात्र हरिनामकी व्यवस्था की है। दोषोंकी निधि कलिमें एक महत्वपूर्ण गुण है, उससे शुकदेव गोस्वामीने महाराज परीक्षितसे कहा (भागवत १२/३/५१-५२)— “कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥५१॥ कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतोमखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥५२॥” अर्थात् “हे राजन्! कलियुगको दोषोंका सागर कहकर स्वीकार करनेपर भी उसमें एक प्रधान गुण है, जिसके द्वारा कलियुगको अन्यान्य युगोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि कलियुगमें भगवान् वासुदेवका गुण-कीर्तन करनेसे ही जीव संसार-बन्धनसे मुक्ति लाभकर परमपदको प्राप्त करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें प्राणायामादि योगानुष्ठानसे भगवान्का ध्यान करनेका जो फल प्राप्त होता था, त्रेतायुगमें जो बड़े भव्य आयोजनोंके द्वारा बहुकाल और बड़े परिश्रमके द्वारा साध्य ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंका सम्पादन करनेसे जो फल प्राप्त होता था तथा द्वापरमें विविध आयोजनोंमें अर्चनके द्वारा जो सिद्धि लाभ की जाती थी, कलियुगमें श्रीहरिके सङ्कीर्तनसे वही फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।” तीसरा अध्याय | १०७
[ ३/१९-२१ इस वर्तमान कलियुगमें परम दयालु पतितपावन श्रीगौराङ्गदेवके श्रीचरणयुगलका आश्रय करना प्रत्येक मनुष्यका कर्त्तव्य है। श्रीगौराङ्गदेवकी कृपाके बिना भवसागरसे पार होनेका अन्य कोई भी उपाय नहीं है। वे ही इस कलियुगके एकमात्र पतित उद्धारक अवतार हैं। उनमें जाति, धन, कुल, मान, विद्या, यश, स्त्री-पुरुष, अपाहिज, बहरे, अन्धे, विकलांग और आश्रमादिका कोई विचार नहीं है। जो एकान्त भावसे उनके अभय चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करेंगे, वे सहज ही इस दुस्तर असीमित भवसमुद्रको गोखुरके समान पार कर जायेंगे। ऐसे पतितपावन अवतार श्रीगौराङ्गमें जिनकी रति नहीं उत्पन्न होती, उनकी करोड़ों युगोंमें भी उद्धार प्राप्त करनेकी कोई आशा नहीं है। एक दिन कलिके जीवोंको उपदेश देनेके छलसे परम दयालु महाप्रभुने स्वरूप दामोदर और रायरामानन्दको सम्बोधन करते हुए कहा- “ओहे स्वरूपदामोदर ! ओहे रायरामानन्द ! कलियुगका धर्म एकमात्र हरिनाम सङ्कीर्तन है। हरि सङ्कीर्तनसे ही जीवकी सर्वसिद्धि होती है। जो सुमेधा-सम्पन्न हैं, वे हरि सङ्कीर्तन यज्ञके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना करते हैं।” श्रीचैतन्यचरितामृत (अन्त्यलीला २०वाँ अध्याय) - “हर्षे प्रभु कहेन, - “शुन स्वरूप-रामराय । नाम सङ्कीर्त्तन-कलौ परम उपाय ॥ ८ ॥ सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन । सेई त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण ॥ ९ ॥ नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ-नाश । सर्व-शुभोदय, कृष्णे प्रेमेर उल्लास ॥ ११ ॥ सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार नाशन । चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन-उद्गम ॥ १३॥” साक्षात् अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दन होनेपर भी श्रीगौरहरिने हमारे जैसे कलिहत जीवोंकी जिस प्रकार हरिनाममें दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न हो, वैसा उपदेश देनेके लिये स्वयंमें जीव अभिमान करके निम्नलिखित श्लोक पाठ किया (शिक्षाष्टक द्वितीय श्लोक) - “नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति- स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः । एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनी नानुरागः ॥ ” “हे भगवन् ! आपके नाम ही जीवोंके लिये सर्वमङ्गलप्रद हैं, अतः जीवोंके कल्याण हेतु आप अपने राम, नारायण, कृष्ण, मुकुन्द, माधव, गोविन्द, दामोदर आदि अनेक नामोंके रूपमें नित्य प्रकाशित हैं। आपने उन नामोंमें उन-उन स्वरूपोंकी सर्वशक्तियोंको स्थापित किया है। अहैतुकी कृपा हेतु आपने उन नामोंके स्मरणमें सन्ध्या-वन्दना आदिकी भाँति किसी निर्दिष्टकाल आदिका विचार भी नहीं रखा है अर्थात् दिन-रात किसी भी समय भगवन्नामका स्मरण-कीर्त्तन किया जा सकता है- ऐसा विधान भी बना दिया है। हे प्रभो ! आपकी तो जीवोंपर ऐसी अहैतुकी कृपा है, तथापि मेरा तो नामापराधस्वरूप ऐसा दुर्देव है कि आपके ऐसे सर्वफलप्रद सुलभ नाममें भी अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ।” १०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१९-२१ ] जिस प्रकार नाम लेनेसे प्रेम हृदयमें उपजेगा, उसका लक्षण इस श्लोकमें कह रहे हैं (शिक्षाष्टक तृतीय श्लोक)— “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥” “सर्वपद-दलित अत्यन्त तुच्छ तृणसे भी अपनेको दीन-हीन नीच समझकर, वृक्षसे भी अधिक सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरोंको यथायोग्य मान देनेवाला बनकर सदा सर्वदा निरन्तर श्रीहरिनामसङ्कीर्तन करता रहे।” अन्यान्य कलियुगोंमें भी युगावतार कलियुग धर्म नाम-सङ्कीर्तनकी स्थापना करते हैं, परन्तु अवतारी श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित नाम-सङ्कीर्तनका उनसे वैशिष्ट्य है। सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीमुखसे निर्गत होनेके कारण श्रीहरिनाम भी सर्वशक्तिपूर्ण होकर जगत्में प्रचारित होता है। प्रेममय श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीमुखसे निःसृत नाम-सङ्कीर्तन ऐसा प्रेम-विमण्डित और अमृतसे भी सुमधुर है कि वह व्रजप्रेमतक प्रदान करता है। अन्य कलियुगोंका नाम-सङ्कीर्तन इस प्रकार प्रेम-मण्डित, मधुर, सर्वशक्तिसम्पन्न और प्रेम प्रदान करनेवाला नहीं है। चारि भाव-भक्ति दिया—प्रेमभक्ति श्रीकृष्णकी ह्लादिनी-शक्तिकी वृत्ति-विशेष है। श्रीकृष्णका सङ्कल्प यह है—उनके द्वारा प्रवर्तित श्रीनाम-सङ्कीर्तन करते-करते जीवका चित्त जब निर्मल होता है, तब वह ह्लादिनीको ग्रहण करनेके योग्य होता है। उस समय वे इस शुद्धचित्तमें अपनी ह्लादिनी शक्तिको निक्षेप करते हैं। भक्त-हृदयमें आकर यह ह्लादिनी प्रेमभक्तिके रूपमें परिणत होती है। यह प्रेमदानकी साधारण व्यवस्था है। किन्तु श्रीकृष्णचैतन्यरूपमें प्रकटकालमें अनेक समय, विशेषतः संन्यास ग्रहण करनेके बाद, महाप्रभुने श्रीमुखसे एक बार हरिनामका उपदेश देकर, किंवा केवलमात्र दर्शनदानसे असंख्य लोगोंको कृष्णप्रेम दान किया। इस लीलामें महाप्रभुने ऐसी अचिन्त्य महाशक्तिको प्रकट किया, जिसके प्रभावसे प्रेमदान और जीवके चित्तमें सञ्चित कल्मषादिका विनाश एक ही साथ सङ्घटित हुआ। तेजके घन विग्रह सूर्यदेवके आविर्भावसे उनके तेजरूप किरणजालके स्पर्शसे जैसे पृथ्वीका अन्धकार, चोर-डाकूका भय और शीतादि शीघ्र ही दूर हो जाते हैं और जीवोंके चित्तमें धर्म-कर्मादिके अनुष्ठानकी वासना जाग्रत हो जाती है तथा देहकी जड़ता दूर हो जाती है, उसी प्रकार प्रेमघन-विग्रह महाप्रभुके दर्शनसे उनके श्रीअङ्गसे निकली प्रेमकिरणपुञ्जके द्वारा ग्रथित और परिसिञ्चित होकर जीव भी एक अपूर्व प्रेमसम्पद लाभ करके कृतार्थ हुए और साथ-ही-साथ उनके पूर्व सञ्चित अपराध, दुर्वासनाजनित कल्मष भी अन्तर्हित हो गये तथा श्रीकृष्ण-सुखैकतात्पर्यमयी सेवावासनाने जाग्रत होकर उनके चित्तको समुज्ज्वल कर दिया। महाप्रभु जहाँ भी गये, वहाँ प्रेमकी बाढ़ ले आये और उस बाढ़में केवल मनुष्य ही नहीं अपितु पशु-पक्षी-कीट-पतङ्गादि, यहाँतक कि वृक्ष-गुल्म-तृणादि भी डूबकर कृतार्थ हो गये। झारिखण्डपथसे वृन्दावन जाते हुए महाप्रभुने अपने इस अपूर्व प्रभावको प्रकट किया था। आपनि करिमु भक्तभाव अङ्गीकारे—जीव स्वरूपसे श्रीकृष्णका दास है, इसलिये भक्तभाव अथवा सेवकभाव साधक-जीवका अपना भाव है। किन्तु श्रीकृष्ण स्वरूपतः सेव्य हैं, स्वरूपसे तीसरा अध्याय | १०९
[ ३/१९-२१ वे किसीके भी सेवक नहीं हैं; तभी भक्तभाव उनका स्वरूपानुबन्ध अथवा अपना भाव नहीं है, इसलिये उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करनेकी बात कही है। आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय-आचार्यके आदर्शके बिना कभी भी साधारण दुर्बल जीव शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है। कर्मराज्य हो अथवा भक्तिराज्य-दोनों क्षेत्रोंमें ही आदर्श आवश्यक है। जगत्में प्रत्येक व्यक्ति ही किसी-ना-किसीके आदर्शके द्वारा ज्ञात या अज्ञात रूपसे परिचालित होता है। कर्मी पुण्य-कार्य करनेके लिये जिस प्रकार किसी-ना-किसीको आदर्शके रूपमें अपने सम्मुख स्थापन करते हैं, उसी प्रकार पाप-कार्य करनेमें प्रवृत्त होनेपर भी किसी एक आदर्शको सम्मुख स्थापन करना होता है। पापी व्यक्ति भी आदर्शके बिना सुष्ठु-भावसे पापकर्म नहीं कर सकता। पृथ्वीपर स्थित वारवनिताएँ स्वर्गकी वेश्याओंको अपना आदर्श करके अधिकतर पाप कार्यमें लिप्त होती हैं। पृथ्वीपर राजा लोग देवेन्द्रके आदर्शको सामने स्थापित करते है। चार्वाक-पन्थियोंका जिस प्रकार आदर्श है, जैमिनीके अनुगतजनोंका भी उसी प्रकार आदर्श है। शिशु आदर्श प्राप्त नहीं करके कोई भी शिक्षा लाभ नहीं कर सकता-शिशु आदर्शका अनुकरण करके ही वाक्योंका उच्चारण तथा आहार-विहारादि करनेकी शिक्षा प्राप्त करता है। किसी नर शिशुका जन्मसे यदि बाघादि जन्तुके आदर्शमें पालन हो, तो उनके आदर्शको लेकर उसमें भी बाघके शावककी भाँति हिंसक स्वभाव, वैसे ही शब्दका अनुकरण और वैसी आहार-विहारकी प्रवृत्ति लक्षित होती है। शिशुको शब्दशास्त्रमें अथवा लिपिशिक्षामें शिक्षित करनेके लिये आदर्श-शब्द या आदर्श-लिपिकी आवश्यकता होती है; अन्यथा शिशु शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। जब हम तैरनेकी शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब हमें जलमें उतरने अथवा नदीके प्रवाहमें बहुत दूर जानेसे भय लगता है, किन्तु यदि हम किसी व्यक्ति या अनेक व्यक्तियोंको इस इस कार्यमें प्रवृत्त अथवा हमारे लिये आदर्श स्थापित करते देखें, तब हममें साहसका सञ्चार होगा और हम धीरे-धीरे आदर्शके द्वारा उत्साह प्राप्तकर तैरनेकी विद्यामें सनिपुण हो सकते हैं। इस प्रकार इस जगत्में अनेक दृष्टान्त हम नित्य ही प्रत्यक्ष देखते हैं। अधोक्षजके सेवाराज्यमें भी आदर्शकी एकान्त आवश्यकता है, परन्तु वह अन्तरनिष्ठा अन्य प्रकारकी है; यही मात्र पार्थक्य है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने लिखा है-वैष्णवोंको 'जगद्-गुरु' कहा जाता है। वैष्णव जिस प्रकार उच्च पदपर स्थित हैं, उनका चरित्र भी उसी प्रकार उच्च और अनुकरण-योग्य होना आवश्यक है। वैष्णवोंका चरित्र अगर मन्द होगा, तो अन्यान्य दुर्बल जीव किस प्रकारसे सत्चरित्रकी शिक्षा ग्रहण करेंगे? महाप्रभुने भी हमें इसी प्रकार उपदेश दिया है (मध्यलीला १२/५१,५३)- “शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय। संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय॥५१॥ प्रभु कहे,-“पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस। सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश॥५३॥” “श्वेत वस्त्रपर जैसे स्याहीका दाग छुपाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार संन्यासीके अल्प ११० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१९-२३ ] दोषका भी सभी गान करते हैं। जैसे दूधके कलशमें एक बूँद मदिरा डाल दी जाय, तो उसको कोई स्पर्श नहीं करेगा।” साधु-शिक्षा दो प्रकारकी है अर्थात् वाक्यके द्वारा उपदेश देना और चरित्रके द्वारा दूसरोंको साधु-चरित्रकी शिक्षा देना। मध्यलीला (१२/११७)में महाप्रभुने और भी कहा है— “तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे। एइमत भाल कर्म सेइ येन करे॥” “हे वैष्णवगण! तुम साधु-चरित्रके द्वारा दूसरोंको शिक्षा दो। तुमने अच्छा कार्य किया है, यह उत्तम बात है। किन्तु जगत्के जीव तुम्हारे भ्रातागण हैं, तुम्हारे असत् कार्यके द्वारा उनका पतन होगा। तुम्हारा कर्तव्य यह है—अपना साधु-चरित्र दिखलाकर उनके द्वारा अपने चरित्रका अनुकरण करवाओ। तुम यदि गृहत्यागी वैष्णव हो, तब त्यागी वैष्णवके सम्बन्धमें मैंने जो सब उपदेश दिये हैं, वैसा आचरण करके अन्य गृहत्यागी वैष्णवोंको शिक्षा दो। तुम यदि वैष्णवगृहस्थ हो, तब गृही वैष्णवोंको मैंने जो उपदेश दिये है और अपने चरित्रके द्वारा जो आदर्श दिखलाये हैं, उसका आचरण करो और अन्यान्य गृहस्थोंको शिक्षा दो। वैष्णवोंका चरित्र निष्पाप होता है। उसमें कोई भी अंश गोपन करने योग्य नहीं है। सरलता ही वैष्णवोंका जीवन है। अपने चरित्रको सर्वत्र प्रकाश करके शिक्षा दो। चरित्र शुद्ध ना होनेपर कोई भी ‘वैष्णव’ पदवी प्राप्त करनेके योग्य नहीं होता। तुम्हारा शुद्ध चरित्र है, इसलिये सदा अच्छा आचरण करते रहना। और उसकी जगत्को शिक्षा देना। सभी वैष्णव ही जगत्के गुरुपदको प्राप्त हुए हैं। केवल कथाके द्वारा शिक्षा देना यथेष्ठ नहीं है, चरित्रके द्वारा शिक्षा देना ही प्रधान कार्य है। देखो, मेरे लिये कोई भी विधि नहीं है। मैं स्वेच्छामय ईश्वर हूँ। जो इच्छा हो, मैं वही कर सकता हूँ। तथापि मैं कलिकालमें जीवोंके चरित्रको पवित्र करनेके लिये श्रीशचीदेवीके गर्भसे जन्मग्रहण करके शिक्षा दे रहा हूँ। मैंने बाल्यचरित्रके द्वारा बालकोंको शिक्षा दी है। गृहस्थ चरित्रके द्वारा गृहीजनोंको शिक्षा दी है। संन्यास चरित्रके द्वारा गृहत्यागी लोगोंको शिक्षा दी है। तुम लोग मेरे चरित्रका अनुकरण करते हुए अन्यान्य जीवोंको शिक्षा दो। जब भी इस विषयमें कुछ भी सन्देह हो, तब मेरे चरित्रकी आलोचना करके अपने चरित्रका गठन करो।” श्रीमन्महाप्रभुके इस उपदेशका सभी वैष्णवोंको पालन करना उचित है॥१९-२१॥ अवतारकाल:— श्रीमद्भगवद्गीता (४/७-८)— यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ २२॥ अवतारका कार्य :— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ २३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२-२३॥ तीसरा अध्याय | १११