भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 114

[ २/७९-८६

'एते'-शब्दे अवताररे आगे अनुवाद। 'पुरुषेर अंश' पाछे विधेय-संवाद॥८०॥ तैछे कृष्ण अवतार-भितरे हैल ज्ञात। ताँहार विशेष-ज्ञान सेइ अविज्ञात॥८१॥ अतएव 'कृष्ण'-शब्द आगे अनुवाद। 'स्वयं-भगवत्ता' पिछे विधेय-संवाद॥८२॥ कृष्णेर स्वयं भगवत्ता-इहा हैल साध्य। स्वयं-भगवानेर कृष्णत्व हैल बाध्य॥८३॥ सूत गोस्वामीके वाक्यकी विपरीत होनेकी सम्भावना :- कृष्ण यदि अंश हैत, अंशी नारायण। तबे विपरीत हैत सूतेर वचन॥८४॥ नारायण अंशी येइ स्वयं भगवान्। तँह श्रीकृष्ण-ऐछे करि ता' व्याख्यान॥८५॥ अनुवाद—इसी प्रकार इस श्लोकमें वर्णित ये सब 'अवतार' हैं, यह बात सभी जानते हैं। किन्तु वे किनके अवतार हैं, यह अभी अज्ञात है। पहले 'एते' शब्दसे अवतारके विषयमें कहा जा रहा है, इसलिये यह अनुवाद है। 'पुरुषके अंश' बादमें कहा गया है, इसलिये वह विधेय है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण अवतारोंमें सम्मिलित हैं, यह सभी जानते हैं, किन्तु उनका विशेष-ज्ञान अभी तक अज्ञात है। इसलिये 'कृष्ण' शब्द पहले कहनेसे उसे अनुवाद मानना होगा और 'स्वयं-भगवान्' बादमें कहनेसे वह विधेय है। इस प्रकार श्रीकृष्णकी स्वयं-भगवत्ता प्रमाणित हुई है और 'स्वयं-भगवान्का कृष्णत्व' कहना अनुचित है। यदि श्रीकृष्ण अंश और नारायण अंशी होते, तो सूत गोस्वामीजीका वाक्य विपरीत होता। तब सूत गोस्वामीजी ऐसी व्याख्या करते कि नारायण अंशी हैं और स्वयं भगवान् हैं एवं वे ही श्रीकृष्णके रूपमें अवतरित हुए हैं॥७९-८५॥ चार प्रकारके दोषोंसे रहित मुक्तपुरुषके वाक्योंके लक्षण और विशेषता— भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। आर्ष-विज्ञवाक्ये नाहि दोष एड्सब॥८६॥ अनुवाद—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव—ये चार दोष विद्वान ऋषियोंके वाक्योंमें नहीं होते हैं॥८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य— “एते चांशकलाः” श्लोकमें 'एते' शब्दसे 'अवतारगण' उनका अनुवाद हुआ है। वे पुरुषावतारके अंश हैं, यह पहले अज्ञात है, इसलिये इसे विधेयरूपमें बादमें कहा गया है। इस पदमें श्रीकृष्णको अवतारोंमें मध्य जाना गया, किन्तु श्रीकृष्णके विषयमें विशेष ज्ञान नहीं जाननेके कारण विधेयका वर्णन हुआ है। इसलिये 'कृष्ण' शब्द पहले 'अनुवाद' कहकर, श्रीकृष्ण 'स्वयं भगवान्' हैं, यह उसका 'विधेय' है। 'श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् हैं'—यहाँ विचारके द्वारा यह सिद्ध होगा। इसलिये 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयं' इस वाक्यमें 'श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् हैं' यही अर्थ होगा अर्थात् इस अर्थके अतिरिक्त दूसरा कोई अर्थ हो नहीं सकता।

७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत