भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

२/७४-७९ ] अमृतप्रवाह भाष्य—आलङ्कारिक विचारके अनुसार पूर्व अज्ञात विषयको ‘विधेय’ और पूर्व ज्ञात वस्तुको ‘अनुवाद’ कहा जाता है। उदाहरणके लिये—‘ये विप्र पण्डित हैं’, इस वाक्यमें ‘ये व्यक्ति विप्र (ब्राह्मण) हैं’ इस तथ्यको सभी जानते हैं, इसलिये यह अनुवाद है। किन्तु ‘विप्र पण्डित हैं’ यह सभी नहीं जानते हैं, इसलिये यह विधेय है। अनुवाद ना कह कर जो विधेय पहले कहते हैं, उनके वाक्यका कोई आश्रय ना रहनेके कारण उसकी प्रतिष्ठा नहीं होती ॥ ७४ ॥ अनुभाष्य—अनुवादं (उद्देश्यं, ज्ञातं वस्तु) अनुक्त्वा (न कथयित्वा) विधेयं (अज्ञातं वस्तु) न उदीरयेत् (न कथयेत्)। हि अलब्धास्पदं (न लब्धं प्राप्तं आस्पदं स्थानं येन तथाभूतं) किञ्चित् कुत्रचित् [अपि] न प्रतितिष्ठति (प्रतिष्ठां न लभते)। श्लोक-भावानुवाद—अनुवाद (ज्ञात वस्तु) ना कहकर पहले विधेय (अज्ञात वस्तु) नहीं कहनी चाहिये। इस प्रकार उस वाक्यको यथायोग्य जो स्थान है, वह नहीं मिलता और उसे अल्प भी कहीं प्रतिष्ठा नहीं मिलती ॥ ७४ ॥ अनुवाद और विधेयके प्रयोगकी विधि :— अनुवाद ना कहिया ना कहि विधेय। आगे अनुवाद कहि, पश्चात् विधेय ॥ ७५ ॥ अनुवाद और विधेयकी संज्ञा :— ‘विधेय’ कहिये तारे, ये वस्तु अज्ञात। ‘अनुवाद’ कहि तारे, येइ हय ज्ञात ॥ ७६ ॥ अनुवाद—अनुवाद कहनेसे पूर्व विधेय नहीं कहा जाता है। पहले अनुवाद कहकर बादमें विधेय कहा जाता है। जो वस्तु अज्ञात है, उसे ‘विधेय’ कहते हैं और जो वस्तु ज्ञात है, उसे ‘अनुवाद’ कहते हैं ॥ ७५-७६ ॥ दृष्टान्त :— यैछे कहि,—एइ विप्र परम पण्डित। विप्र—अनुवाद, इहार विधेय—पाण्डित्य ॥ ७७ ॥ विप्र बलि’ जानि, तार पाण्डित्य अज्ञात। अतएव विप्र आगे, पाण्डित्य पश्चात् ॥ ७८ ॥ अनुवाद—जैसे उदाहरण स्वरूप—‘यह विप्र परम पण्डित हैं’, इसमें विप्र ‘अनुवाद’ है और पाण्डित्य ‘विधेय’ है। यह व्यक्ति विप्र (ब्राह्मण) हैं, यह तथ्य लोग पहलेसे जानते हैं, किन्तु इनके पाण्डित्यका उन्हें ज्ञान नहीं है। इसलिये पहले विप्र और बादमें पाण्डित्य कहना ही उचित है ॥ ७७-७८ ॥ अनुवाद और विधेय-विचारमें “एते चांशकलाः” श्लोक या कृष्णके अवतारी होनेकी व्याख्या :— तैछे इँह अवतार, सब ताँर ज्ञात। कार अवतार—एइ वस्तु अविज्ञात ॥ ७९ ॥ दूसरा अध्याय | ७१