श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/६८-७४ श्लोक-भावानुवाद—पहले वर्णन किये गये अवतार पुरुषावतारके अंश अथवा अंशके अंश हैं, परन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। वे अंशावतार असुरोंके द्वारा पीड़ित भक्तोंको प्रति युगमें (यथाकाल) सुखी करते हैं॥ ६७॥ सब अवतारेर करि सामान्य-लक्षण। तार मध्ये कृष्णचन्द्रेर करिल गणन॥ ६८॥ तबे सूत-गोसाञि मने पाञा बड़ भय। यार ये लक्षण ताहा करिल निश्चय ॥ ६९॥ अवतार सब-पुरुषेर कला, अंश। स्वयं-भगवान् कृष्ण सर्व अवतंस ॥ ७०॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतमें श्रीसूत गोस्वामीने सभी अवतारोंके सामान्य लक्षण वर्णनकर श्रीकृष्णचन्द्रकी भी अवतारोंमें गणना की। तब उनके मनमें बड़ा भय हुआ कि कहीं लोग श्रीकृष्णको अवतार ना समझ लें, इसलिये उन्होंने सब अवतारोंके विशेष लक्षणका वर्णन किया। अन्य सभी अवतार पुरुषावतारके अंश अथवा कला हैं, किन्तु स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण सबके शिरोमणि हैं॥ ६८-७०॥ पूर्वपक्ष कहे, —तोमार भाल त' व्याख्यान। परव्योमे नारायण स्वयं-भगवान्॥ ७१॥ तेंह आसि' कृष्णरूपे करेन अवतार। एइ अर्थ श्लोके देखि—कि आर विचार॥ ७२॥ अनुवाद—पूर्वपक्ष कहनेवाले यदि यह आक्षेप करें कि आपने श्लोककी अच्छी व्याख्या की है, परन्तु उसका अन्य अर्थ नहीं हो सकता, ऐसा सिद्ध नहीं होता है। इस श्लोकका यह भी अर्थ हो सकता है कि परव्योमनाथ नारायण स्वयं भगवान् हैं और वे ही कृष्णरूपमें अवतार ग्रहणकर लीला करते हैं। इस विषयमें आपका और क्या विचार है?॥ ७१-७२॥ (ग) आलङ्कारिक-विचारमें श्रीकृष्णका नारायणके अंश होनेका खण्डन :— तारे कहे, केने कर कुतर्कानुमान। शास्त्रविरुद्धार्थ कभु ना हय प्रमाण ॥ ७३॥ अनुवाद—ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज उन्हें कहते हैं, तुम क्यों कुतर्क कर रहे हो और वास्तव वस्तुके विषयमें अनुमान लगा रहे हो? शास्त्रविरुद्ध अर्थ कभी भी प्रमाणके रूपमें स्वीकार नहीं किया जा सकता ॥ ७३॥ एकादशीतत्त्वमें १३ अङ्कमें धृत आलङ्कारिक न्याय :— अनुवादमनुक्त्वा तु न विधेयमुदीरयेत् । न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् कुत्रचित् प्रतितिष्ठति ॥ ७४॥ अनुवाद—किसी वाक्यमें अनुवाद (ज्ञात वस्तु) को ना कहकर विधेय (अज्ञात वस्तु) को पहले नहीं कहना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे उस वाक्यका कोई आधार नहीं होता है और उसकी कहीं भी अल्प प्रतिष्ठा भी नहीं होती ॥ ७४॥ ७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत