भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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अर्थ सुनो और विचार करो। इस श्लोकमें एक मुख्यतत्त्व (अद्वयज्ञान-तत्त्व) और उसकी तीन प्रतीतियोंका वर्णन है। अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु ही श्रीकृष्णका स्वरूप है। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् उनके तीन रूप हैं। इस श्लोकके अर्थसे ही आपके सभी तर्क निरस्त हो गये हैं और आप कुछ अधिक कहनेमें असमर्थ हो गये हो। अब भागवतका और एक वचन सुनो॥६४-६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस पद्यमें अद्वयज्ञान शब्दसे कृष्णस्वरूपरूपी मूल तत्त्ववस्तुको समझना चाहिये॥६५॥ अमृताणुकणिका-परतत्त्वका श्रुतिविहित शृङ्खलाबद्ध विचार ब्रह्मसूत्रमें ही देखा जाता है। ब्रह्मसूत्रके वाक्य ही स्वतःप्रमाण वेदोंके वाक्य हैं। ब्रह्मसूत्रके प्रमाणके साथ जिसका ऐक्य नहीं है, ऐसा कोई भी प्रमाण श्रद्धा करने योग्य नहीं है। श्रीमद्भागवत उसी ब्रह्मसूत्रका भाष्य है। (हःभःविः १०/२८३ गरुड़ पुराणसे)— “अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः। गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिबृंहितः॥” अर्थात् “श्रीमद्भागवत ब्रह्मसूत्रका अर्थ, महाभारतका तात्पर्य-निर्णय, गायत्रीका भाष्य और समस्त वेदोंके तात्पर्यका संवर्द्धन है।” जिन्होंने ब्रह्मसूत्रका सङ्कलन किया, उन्हीं श्रीव्यासदेवने स्वयं ही ब्रह्मसूत्रके भाष्यरूपमें श्रीमद्भागवतको लिखा है। श्रीमद्भागवतमें ही ब्रह्मसूत्रका वास्तविक अर्थ और श्रीव्यासदेवके निज अभिप्रायको जाना जा सकता है, इसलिये श्रीमद्भागवत ही प्रमाण-शिरोमणि है। श्रीमद्भागवतके प्रमाणके साथ जिस युक्ति अथवा प्रमाणका ऐक्य नहीं है, वह प्रमाण अथवा युक्ति ग्राह्य नहीं हो सकती। कविराज गोस्वामीने श्रीमद्भागवतसे “वदन्ति” आदि श्लोक उद्धृत करके प्रमाणित किया है कि श्रीकृष्ण ही अद्वय-ज्ञान-तत्त्व-वस्तु हैं और परव्योमाधिपति नारायण उनके आविर्भाव-विशेष (विलास-रूप) हैं, इसलिये नारायण श्रीकृष्णके अवतारी नहीं हो सकते। यही जब प्रमाण-शिरोमणि श्रीमद्भागवतका सिद्धान्त है, तब इसके प्रतिकूल किसी प्रकारकी युक्ति अथवा प्रमाण ग्राह्य नहीं हो सकता॥६०-६६॥ श्रीकृष्णके अवतार अथवा अंश होनेका खण्डन :- श्रीमद्भागवत (१/३/२८)— एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे॥६७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राम-नृसिंहारि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं॥६७॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके अवतारोंकी गणना करके अन्तमें श्रीसूत गोस्वामीने यह श्लोक कहा- एते (पूर्वकथिताः अवतारादयः) पुंसः (पुरुषावतारस्य) अंशः, कलाश्च (अंशस्य अंशाः)। कृष्णस्तु स्वयं भगवान्। [ते अंशावताराः] इन्द्रारिव्याकुलं (असुरोपद्रुतं) लोकं (विश्वं) युगे युगे (प्रतियुगं यथाकाले) मृड़यन्ति (सुखिनं कुर्वन्ति)।