भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ २/५९-६६ वाक्य प्रमाण-शिरोमणिरूप उक्त ब्रह्मवाक्यका अतिक्रम नहीं कर सकता। परिभाषा रूपमें इस ब्रह्म-वाक्यका ही सर्वत्र अधिकार है और जहाँ भी इसका विरोधाभास उपस्थित हो, वहाँ इसके अनुकूल अर्थके द्वारा उसका सामञ्जस्य करना होगा ॥ ५९ ॥ ब्रह्म, आत्मा, भगवान्—कृष्णेर विहार। ए अर्थ ना जानि' मूर्ख अर्थ करे आर ॥ ६० ॥ कृष्णको अंशी-नारायणके अंशरूपमें स्थापनका खण्डन :- अवतारी नारायण, कृष्ण-अवतार। तेंह चतुर्भुज, इँह मनुष्य-आकार ॥ ६१ ॥ एइमते नानारूप करे पूर्वपक्ष। ताहारे निर्जिते भागवत-पद्य दक्ष ॥ ६२ ॥ अनुवाद—ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—ये सभी श्रीकृष्णके प्रकाश हैं, किन्तु इसका यह अर्थ ना जानकर मूर्ख लोग दूसरा-दूसरा अर्थ करते हैं। वे कहते हैं कि नारायण अवतारी हैं और श्रीकृष्ण अवतार हैं, क्योंकि नारायण चतुर्भुज हैं और श्रीकृष्ण मनुष्य रूपमें हैं। इस प्रकार वे नाना प्रकारसे तर्क करते हैं, परन्तु भागवतके श्लोक उनके मतोंका खण्डन करनेमें दक्ष हैं ॥ ६०-६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विहार'—इसका तात्पर्य प्रकाशरूप विहारसे है। मूर्ख लोग इस प्रकार अर्थ ना समझकर अन्य अर्थ करते हैं, जैसे—“अवतारी नारायण, कृष्ण अवतार।” पूर्वपक्षरूपमें खड़े इस प्रकारके सभी सिद्धान्तोंको भागवतके श्लोक पराजित करनेमें विशेष दक्ष हैं ॥ ६०-६२॥ (ख) कृष्ण और नारायणमें भेदविचारका खण्डन :- श्रीमद्भागवत (१/२/११)— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ६३ ॥ अनुवाद—जो अद्वयज्ञान अर्थात् एक अद्वितीय वास्तव वस्तु है, उसीको तत्त्वज्ञानीजन परमार्थ कहते हैं। वही तत्त्ववस्तु ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीनों नामोंसे जानी जाती है ॥ ६३ ॥ अनुभाष्य—आदिलीला २/११ द्रष्टव्य है॥६३॥ शुन भाइ, ए श्लोकार्थ करह विचार। एक मुख्यतत्त्व, तिन ताहार प्रचार ॥ ६४ ॥ अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु कृष्णेर स्वरूप। ब्रह्म, आत्मा, भगवान्—तिन ताँर रूप ॥ ६५ ॥ एइ श्लोकेर अर्थे तुमि हैला निर्वचन। आर एक शुन भागवतेर वचन ॥ ६६ ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज कह रहे हैं)—मेरे प्रिय भाइयों! इस श्लोकका ६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत