भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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२/५६-५९ ] उन तीनोंकी मूल हैं। सङ्कर्षणके प्रकाश कारणजलमें प्रथम पुरुषावतार अखिल ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करनेवाले कारणाब्धिशायी हैं, प्रद्युम्नके प्रकाश द्वितीय पुरुषावतार गर्भोदकशायी और अनिरुद्धके प्रकाश तृतीय पुरुषावतार क्षीरोदकशायी हैं। इस प्रकार वे तीनों नारायणके ही आश्रित हैं॥५६॥ सेइ तिनेर अंशी परव्योम नारायण। तेंह तोमार प्रकाश, तुमि मूल-नारायण॥”५७॥ अनुवाद—कारणाब्धिशायी, गर्भोदकशायी, क्षीरोदकशायी—इन तीनोंके अंशी परव्योमनाथ नारायण हैं। और वे नारायण आपकी विलासमूर्ति हैं, इसलिये आप ही मूल-नारायण हैं॥”५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अंशी'—जिनके अंश हैं, वे अंशी हैं। 'परमव्योम नारायण'—वे पुरुषावतारोंके अंशी हैं। वे आप श्रीकृष्णके विलासरूप गौणप्रकाश हैं॥५७॥ अतएव ब्रह्मवाक्ये—परव्योम-नारायण। तेंहो कृष्णेर प्रकाश—एइ तत्त्व-विवरण॥५८॥ अनुवाद—इसलिये ब्रह्माजीके कथनानुसार यह तत्त्व स्थापित होता है कि परव्योमनाथ नारायण श्रीकृष्णका ही विलास हैं॥५८॥ एइ श्लोक तत्त्व-लक्षण भागवत-सार। परिभाषारूपे इहार सर्वत्राधिकार॥५९॥ अनुवाद—इस श्लोकका तत्त्व लक्षण ही श्रीमद्भागवतका सार है और यह परिभाषारूपमें भागवतमें इसका सर्वत्र अधिकार है॥५९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परिभाषा'—सूत्र। 'सर्वत्राधिकार'—भागवतमें सर्वत्र यह लक्षण पाओगे॥५९॥ अनुभाष्य—'एइ श्लोक' का तात्पर्य पूर्वोक्त संख्या ३० में उद्धृत “नारायणस्त्वं” श्लोक है॥५९॥ अमृतानुकणा—'नारायणस्त्वं' (भाः १०/१४/१४)— श्रीब्रह्माके मुखःनिःसृत यह श्लोक श्रीमद्भागवतमें भगवत्-तत्त्व-प्रतिपादक सभी श्लोकोंके मध्य सार अर्थात् श्रेष्ठ है। इसलिये ‘परिभाषा’ रूपमें इसकी मर्यादा है। “परिभाषा ह्येकदेशस्था सकलं शास्त्रमभिप्रकाशयति यथा वेश्मप्रदीप इति” (भाः १०/८/४५ श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकृत टीका) अर्थात् “जिस प्रकार दीपक कक्षमें एक स्थानपर रहकर सम्पूर्ण कक्षको आलोकित करता है, उसी प्रकार शास्त्रके एक स्थानमें अवस्थित होकर जो समस्त शास्त्रको प्रकाशित करती है, वह ‘परिभाषा’ कही जाती है।” तात्पर्य यह है कि ब्रह्माजीके द्वारा कहे गये इस श्लोकके अनुसार श्रीकृष्ण ही मूल-नारायण हैं और परव्योमनाथ श्रीनारायण उनके अंश-विशेष हैं, यह प्रमाणित हुआ है। कल्पके प्रारम्भमें श्रीकृष्णने स्वयं ही ब्रह्माजीको भगवत्-तत्त्वविज्ञान-मूलक वेदवाणीको कहा था,—“कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता। मयाऽऽदौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मकः।” (भाः ११/१४/३)। इसलिये ब्रह्माजीके वाक्यकी प्रमाणिकता सर्वोपरि है। इसी कारणसे यदि श्रीमद्भागवतमें किसी स्थानपर (१०/२/९, १०/४३/२३ आदि) या अन्य किसी श्लोकमें श्रीकृष्ण श्रीनारायणके अंशरूपमें कभी भी आपात अर्थात् किसी प्रसङ्ग विशेषमें वर्णित हों, तो भी वह दूसरा अध्याय | ६७