भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

[ २/५४-५६ अनुवाद-यद्यपि ये तीनों (पुरुष) मायाको लेकर सृष्टि कार्योंमें व्यवहार करते हैं, तथापि वे मायाको स्पर्श नहीं करते हैं और वे मायासे परे हैं॥५४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हिरण्यगर्भादि समष्टि (समस्त) और व्यष्टि (प्रत्येक) जीव मायाके वशीभूत हैं। उक्त तीनों पुरुषोंके द्वारा मायाको लेकर (सृष्टि कार्योंमें) व्यवहार करनेपर भी वे मायासे परे हैं। ये तीनों मायाधीश तत्त्व हैं। ये मायापर ईक्षण (दृष्टिपात) तो करते हैं, किन्तु मायाको संस्पर्श नहीं करते॥५४॥ प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर प्रपञ्चातीत रहना ही भगवत्ता :- श्रीमद्भागवत (१/११/३८)- एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥५५॥ अनुवाद-जिस प्रकार परम-भागवतजनोंकी भगवान्के प्रति शरणागत बुद्धि प्रकृतिमें स्थित होनेपर भी प्राकृत गुणोंसे लिप्त नहीं होती, उसी प्रकार श्रीभगवान् प्रकृतिके अन्तर्गत प्रपञ्चमें अवस्थित होकर भी सुख-दुःख आदि प्राकृत गुणोंसे कदापि लिप्त नहीं होते। परमेश्वर या उनकी वस्तुओंका यही ऐश्वर्य है॥५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृतिमें रहकर उसके गुणोंके द्वारा वशीभूत नहीं होना ही ईश्वरकी ईशिता है। मायाबद्ध जीवोंकी बुद्धि जब ईश्वरका आश्रय लेती है, तब वे भी मायाके समीप रहकर मायाके गुणोंसे संयुक्त नहीं होते॥५५॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण मायाकी गन्धसे सर्वथा रहित हैं, ऐसा श्रीसूत गोस्वामीने श्रीकृष्णका द्वारका नगरीमें अपने महलमें लौटकर महिषियोंके साथ समय व्यतीत करनेके प्रसङ्गमें वर्णन किया है- तदाश्रया (श्रीभगवदाश्रया) [परमभागवतानां] बुद्धिः यथा [प्रकृतिस्था कथञ्चित्तत्र पतितापि] न युज्यते तथा, (यद्वा, व्यतिरेकेण) तदाश्रया (प्रकृत्याश्रया) बुद्धिः (जीवज्ञानं) यथा युज्यते तथा न। प्रकृतिस्थोऽपि (त्रिगुणमये प्रपञ्चे तिष्ठन्नपि) सदा आत्मस्थैः गुणैः न युज्यते (प्राकृतगुणेष्वासक्तो न भवति) - एतत् [एव] ईशस्य (समर्थस्य मायातीतस्य भगवतः) ईशनं (ऐश्वर्यम्)। श्लोक-भावानुवाद-जब श्रीभगवान्का आश्रय ग्रहण करनेवाले परमभागवतोंकी बुद्धि प्रकृतिमें स्थित होते हुए भी जैसे उससे युक्त नहीं होती है, [अथवा व्यतिरेक रूपसे] प्रकृतिके आश्रित जीवकी बुद्धि जिस प्रकार युक्त होती है, उस प्रकार नहीं; तब भगवान्के विषयमें क्या कहा जाय। त्रिगुणमय प्रपञ्चमें स्थित होते हुए भी वे सदा आत्मस्वरूपमें स्थित रहकर प्राकृत गुणोंमें आसक्त नहीं होते, यही मायातीत भगवान्का ऐश्वर्य है॥५५॥ सेइ तिनजनेर तुमि परम आश्रय। तुमि मूल नारायण-इथे कि संशय ॥५६॥ अनुवाद-उन तीनों अवतारोंके आप परम आश्रय हैं, इसलिये आप मूल नारायण हैं, इसमें क्या संशय है ? ॥५६॥ अनुभाष्य-आप उन तीनोंके अर्थात् क्षीरोदकशायी, गर्भोदकशायी और कारणाब्धिशायी महाविष्णुके परमाश्रय हैं। आपकी विलासमूर्ति चतुर्व्यूह-वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, ६६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत