भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

२/४८-५४ ] हिरण्यगर्भर आत्मा गर्भोदकशायी। व्यष्टिजीव-अन्तर्यामी क्षीरोदकशायी ॥ ५१ ॥ ए सबार दर्शनेते आछे मायागन्ध। तुरीय कृष्णेर नाहि मायार सम्बन्ध ॥ ५२ ॥ अनुवाद-यह सुनकर ब्रह्माजी बोले- “जलमें और जीवोंके हृदयमें जो नारायण वास करते हैं, वे सभी आपके अंश हैं-यही सत्य वचन है। कारणाब्धिशायी, गर्भोदकशायी और क्षीरोदकशायी नारायण मायाके द्वारा सृष्टि करते हैं, इसलिये ये मायाके अधीश्वर हैं। ये तीनों जलशायी अर्थात् पुरुषावतार सभी जीवोंके अन्तर्यामी हैं। प्रथम पुरुष समस्त ब्रह्माण्डोंके अन्तर्यामी कारणाब्धिशायी नारायण हैं। द्वितीय पुरुष हिरण्यगर्भकी आत्मा गर्भोदकशायी नारायण हैं और प्रत्येक जीवके हृदयमें वास करनेवाले अन्तर्यामी क्षीरोदकशायी नारायण तृतीय पुरुष हैं। इन सभीको (तटस्थ रूपसे) देखनेपर लगता है कि इनमें मायाकी गन्ध (मायासे सम्बन्ध) है, किन्तु इनसे श्रेष्ठ तुरीय (चतुर्थ) वस्तु श्रीकृष्णका मायाके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है॥४८-५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'ताते सब मायी - वे मायाके द्वारा सृष्टि करते हैं, इसलिये ये तीनों पुरुष मायी अर्थात् माया-सम्बन्धी जगत्के अधीश्वर हैं। ये पुरुष नामी अर्थात् जिनका नाम 'पुरुष' है। 'हिरण्यगर्भ'- समस्त जीवसमूह और उनके अन्तर्यामी गर्भोदकशायी हैं। 'व्यष्टि'-पृथक्-पृथक् जीवोंके अन्तर्यामी पुरुष क्षीरोदकशायी हैं। इन तीनों पुरुषोंसे अतीत जो (श्रेष्ठ) पुरुष तुरीय अर्थात् चतुर्थ पुरुष हैं, वे श्रीकृष्णचन्द्रकी विलासमूर्ति परव्योमनाथ नारायण हैं। वे सम्पूर्ण रूपसे मायागन्धशून्य हैं॥४९-५२॥ श्रीमद्भागवत ११/१५/१६ श्लोककी भावार्थ-दीपिकामें- विराड्ढिरण्यगर्भश्च कारणं चेत्युपाधयः। ईशस्य यत्त्रिभिर्हीनं तुरीयं तत् प्रचक्षते ॥ ५३ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५३॥ अमृतप्रवाह भाष्य - विराट्, हिरण्यगर्भ और कारण-ये सभी मायासम्बन्धी उपाधियाँ हैं। उपाधिशून्य तत्त्व (मायाकी गन्धसे रहित) ही तुरीय (चतुर्थ) हैं॥५३॥ अनुभाष्य - श्रीधरस्वामीने अपनी टीकामें 'तुरीय' शब्दकी व्याख्या करनेके लिये इस श्लोककी रचना की है- विराट् (स्थूलं) हिरण्यगर्भः (सूक्ष्मं) कारणं (अविद्या, प्रकृतिर्वा) इति [एते] ईशस्य (महत्स्रष्टुः पुरुषावतारस्य) उपाधयः (प्रकाशविशेषाः)। यत् त्रिभिः (एतैः उपाधिभिः) हीनं (तत्सम्बन्धवर्जितं) तत् (पदं) तुरीयं (चतुर्थं, पुरुषत्रयातीतं वैकुण्ठं) प्रचक्षते। श्लोक-भावानुवाद-स्थूल, सूक्ष्म, अविद्या और प्रकृति, ये इन महत् तत्त्वकी सृष्टि करनेवाले पुरुषावतारकी उपाधियाँ (प्रकाशविशेष) हैं। इन उपाधियोंसे सम्बन्धहीनको तुरीय (तीनों पुरुषोंसे अतीत वैकुण्ठ स्थित चतुर्थ पुरुष) कहते हैं॥ ५३ ॥ यद्यपि तिनेर माया लइया व्यवहार। तथापि तत्स्पर्श नाइ, सबे माया पार ॥ ५४ ॥ दूसरा अध्याय | ६५