भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

[ २/४३-५० तोमार दर्शने सर्व जगतेर स्थिति। तुमि ना देखिले कार नाहि स्थिति गति ॥ ४५ ॥ नारेर अयन याते कर दरशन। ताहातेओ हओ तुमि मूल नारायण ॥” ४६ ॥ अनुवाद-हे श्रीभगवान् ! अब आप तीसरा कारण सुनिये। इस जगत्में अनन्त ब्रह्माण्डों और चित्जगत्में अनेक वैकुण्ठ-धामोंमें जितने भी जीव हैं, आप साक्षीके रूपमें उनके त्रैकालिक (भूत, वर्तमान और भविष्यत्) कर्मोंको देखते हैं और उन सबके अभिप्रायको भी जानते हैं। आपके दृष्टि डालनेसे ही समस्त जगत्की स्थिति रहती है, आपके नहीं देखनेसे किसीका भी अस्तित्व अथवा गति नहीं होगी। सभी जीवोंके त्रैकालिक कर्मोंके साक्षीरूप आप उनके प्रति दृष्टिपात करते हैं, इसलिये आप मूल नारायण हैं॥ ४३-४६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'इथे'—प्राकृत ब्रह्माण्डसमूहमें और अप्राकृत वैकुण्ठादि धाममें। 'साक्षी'—बद्ध और शुद्ध जीवोंके भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालके सभी कर्मोंके आप एकमात्र द्रष्टा हैं॥ ४४ ॥ 'याते'—जीवोंके द्रष्टा होनेके कारणसे आप नारके अयनरूप नारायण हैं। ब्रह्माजी तीन युक्तियोंके द्वारा श्रीकृष्णको मूलनारायण स्थिर कर रहे हैं— १) समस्त जीवोंके निदान (आदिकारण) और आश्रय श्रीकृष्ण ही मूल नारायण हैं। २) सभी जीवोंके ईश्वर कारणाब्धिशायी पुरुष, समस्त जीवोंके अर्थात् हिरण्यगर्भके आत्मा गर्भोदशायी पुरुष और प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी आत्मा क्षीरोदशायी पुरुष—इन तीन पुरुषोंके और भगवदावतारादिके मूल शक्ति-प्रदातारूपमें नार (पुरुष और उनके अवतारों) के अयन (प्रवर्तक) होनेसे श्रीकृष्ण ही मूल नारायण हैं। ३) अनन्त ब्रह्माण्ड और वैकुण्ठादिमें बद्ध और शुद्ध जीवोंके त्रिकालिक कर्मोंके साक्षीरूपमें नारके अयन (जीवोंको जाननेवाले) होनेके कारण श्रीकृष्ण ही मूल नारायण है॥ ४६ ॥ कृष्ण कहेन—"ब्रह्मा, तोमार ना बुझि वचन। जीव-हृदि, जले बैसे सेइ नारायण ॥"४७ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने कहा— "हे ब्रह्मा ! मैं तुम्हारी बातोंको नहीं समझ पा रहा हूँ। जो जीवोंके हृदयमें रहते हैं और जलमें वास करते हैं, वे ही तो नारायण हैं॥”४७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जीव-हृदि'— प्रत्येक जीव और समस्त जीवोंके अन्तर (हृदय) में। 'जले'—कारणाब्धिमें, गर्भोदकमें और क्षीरोदकमें ॥ ४७ ॥ तीन पुरुषावतारोंके लक्षण :— ब्रह्मा कहे—"जले, जीवे येइ नारायण। से-सब तोमार अंश—ए सत्य वचन ॥ ४८ ॥ कारणाब्धि-गर्भोदक-क्षीरोदकशायी। मायाद्वारा सृष्टि करे, ताते सब मायी ॥ ४९ ॥ सेइ तिन जलशायी सर्व-अन्तर्यामी। ब्रह्माण्डवृन्देर आत्मा ये पुरुष-नामी ॥ ५० ॥ ६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत