श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/३६-४४ ] मुक्त—दोनों प्रकारके तटस्था-शक्तिके प्रकाश जीव शक्तिमान् तत्त्व (नारायण) के आश्रित हैं। जिस प्रकार पृथ्वीपर व्यापक मिट्टी अनेकों घड़ोंका उपादान-कारण है, उसी प्रकार अद्वयज्ञान भगवत्-वस्तुसे समस्त जीव नित्य प्रकटित हैं। सभी कारणोंके कारण भगवान् जीवोंके कारण रूपमें सर्वदा अधिष्ठित हैं। “नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां”—यह श्रुति वाक्य परतत्त्वको ही सभी वस्तुओंके आश्रयरूपमें निर्देश करता है। विशिष्टाद्वैतवादी लोग वेदान्तकी प्रतिपाद्य वस्तुका निरूपण करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सूक्ष्म और स्थूलशरीरके देही जीवका तीन प्रकारसे अवस्थान दिखायी देता है (सूक्ष्मशरीर, स्थूलशरीर और स्वयं जीवात्मा), उसी प्रकार भगवत् स्वरूपसे स्वतन्त्र रूपमें चित् और अचित्, दोनों जगत् प्रकाशित होकर भगवान्का ही अद्वयवैशिष्ट्य स्थापित कर रहे हैं। मुक्तजीव भगवत्-पार्षदके रूपमें चित्जगत्में निवास करते हैं और अचित्जगत् भगवत्-विमुख बद्धजीवोंका भोग्य स्थान है। भगवान्की अन्तरङ्गाशक्ति उनके परिकरोंके वैशिष्ट्यका कारण है और भगवान्की बहिरङ्गाशक्ति प्राकृत गुणोंवाले जगत्की सृष्टि करती है। प्राकृत जगत् भगवान्का स्थूल बाह्य अङ्ग है और जीवजगत् भगवान्के सूक्ष्म अङ्ग हैं। भगवान् इन दोनों प्रकारके अङ्गोंके अङ्गी हैं। गौड़ीय दर्शनमें शक्तिमान् तत्त्वका उनकी चित् और अचित्शक्तिके परिणाम दोनों जगत्का युगपत् (एक साथ) कारण और कार्योंमें अचिन्त्यभेदाभेद स्थापित किया गया है॥ ३६-३७॥ द्वितीय प्रमाण :- जीवेर ईश्वर-पुरुषादि अवतार। ताँहा सबा हैते तोमार ऐश्वर्य अपार॥ ४०॥ अतएव अधीश्वर तुमि सर्व पिता। तोमार शक्तिते ताँरा जगत्-रक्षिता॥ ४१॥ नारेर अयन याते करह पालन। अतएव हओ तुमि मूल नारायण॥४२॥ अनुवाद—पुरुषादि अवतार सभी जीवोंके ईश्वर हैं, किन्तु आपका ऐश्वर्य इन सबसे अधिक है। इसलिये आप अधीश्वर अर्थात् ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं और सभीके पिता हैं। आपकी शक्तिसे ही वे लोग जगत्की रक्षा करते हैं। आप पुरुषावतारों और सभी भगवदावतारोंको शक्ति प्रदान करते हैं जिसके द्वारा वे जगत्का पालन करते हैं, इसलिये आप मूल नारायण हैं॥ ४०-४२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पुरुषादि अवतार अर्थात् कारणाब्धिशायी, गर्भोदकशायी और क्षीरोदकशायी, ये तीन पुरुषावतार हैं।॥ ४०॥ तृतीय प्रमाण :- तृतीय कारण शुन, श्रीभगवान्। अनन्त ब्रह्माण्ड बहु वैकुण्ठादि धाम॥ ४३॥ इथे यत जीव, तार त्रिकालिक कर्म। ताहा देख, साक्षी तुमि, जान सब मर्म॥ ४४॥ दूसरा अध्याय | ६३