श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/३५-३९ प्रथम प्रमाण :- ब्रह्मा बलेन,-"तुमि किना हओ नारायण। तुमि नारायण-शुन ताहार कारण ॥ ३५ ॥ प्राकृताप्राकृत-सृष्ट्ये यत जीव रूप। ताहार ये आत्मा तुमि मूल-स्वरूप ॥ ३६ ॥ पृथ्वी यैछे घटकुलेर कारण आश्रय। जीवेर निदान तुमि, तुमि सर्वाश्रय ॥ ३७ ॥ 'नार'-शब्दे कहे सर्वजीवेर निश्चय। 'अयन'-शब्देते कहे ताहार आश्रय ॥ ३८ ॥ अतएव तुमि हओ मूल नारायण। एइ एक हेतु, शुन द्वितीय कारण ॥ ३९ ॥ अनुवाद-पुनः ब्रह्माजी बोले-“आप क्या नारायण नहीं हैं? आप नारायण ही हो, इसके कारण सुनिये। प्राकृत और अप्राकृत जगत्में जितनी भी जीवात्माएँ हैं, वास्तवमें वे सभी आपसे ही उत्पन्न हुई हैं, उन जीवोंके आप ही मूल-स्वरूप हैं। जिस प्रकार पृथ्वी मिट्टीके घड़ोंका कारण और आश्रय है, उसी प्रकार आप भी सभी जीवोंका निदान (कारण) और आश्रय हैं। 'नार' शब्दका अर्थ है-सभी जीवोंका समूह और 'अयन' शब्दका अर्थ है उनका आश्रय। इसलिये आप मूल (नार+अयन) नारायण हैं और अब दूसरा कारण श्रवण कीजिये॥ ३५-३९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह प्राकृत सृष्टि माया-प्रकृतिके अन्तर्गत है। “भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥” इति-गीता (७/४) श्लोकके अनुसार मन, बुद्धि और अहङ्काररूप लिङ्गजगत् एवं भूमि आदि पञ्चमहाभूतरूप, ये सभी मायिक अथवा प्राकृत हैं। शुद्धजीव और चित्-जगत् अप्राकृत हैं। प्राकृत और अप्राकृत, इन दोनों जगत्में बद्ध और शुद्ध दो प्रकारके जीवोंकी आप आत्मा हैं, इसलिये आप सभीके मूलस्वरूप हैं। पृथ्वी जैसे मिट्टीके घड़ेका कारण (मिट्टी पृथ्वीका अंश है) और आश्रय (रहनेका स्थान) है, उसी प्रकार आप भी सभी जीवोंका एकमात्र निदान अर्थात् कारण और आश्रय हैं॥ ३६-३७॥ अनुभाष्य-जो भी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा उत्पन्न विभिन्न प्रकारकी वस्तुएँ हैं, वे सभी प्राकृत हैं। परन्तु अप्राकृत जगत्में जहाँ नित्य चित्-विलास विचित्रता विद्यमान रहती है, वहाँ प्रकृतिके गुणोंका कोई भी प्रभाव नहीं होता। अप्राकृत जगत्में मुक्त जीव श्रीकृष्णसेवा परायण हैं। कालके अधीन तीन गुणोंके अन्तर्गत बद्धजीव प्राकृत सृष्टिमें स्थित हैं। अप्राकृत जगत्में मुक्तजीव निरन्तर श्रीकृष्णसेवाके आनन्दमें लीन हैं और प्राकृत जीव सदा सुख-दुःखरूपी भोगोंके अधीन हैं। सङ्कर्षण ही मुक्त और बद्ध जीवोंके मूलस्वरूप हैं अर्थात् उनकी तटस्था शक्तिसे प्रकटित विभिन्न जीव सेवोन्मुख और सेवाविमुख, इन दो अवस्थाओंमें विभिन्न रूपोंमें अवस्थित हैं। मुक्त होकर जीव अप्राकृत राज्यमें पाँच प्रकारके विभिन्न रसों (शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर) का आश्रयकर भगवत्सेवामें तत्पर रहते हैं। अविद्याग्रस्त बद्धजीव भोगमय राज्यमें भोक्ताका अभिमान करके सभी वस्तुओंमें भोगबुद्धि रखते हैं। बद्ध और ६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत