श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें$$२/३०-३४ ]$$
सर्वदेहिनां (सर्वप्राणिनाम्) आत्मा त्वं नारायणः (नारं जीवसमूहः अयनं आश्रयो यस्य सः तृतीय पुरुषावतारः क्षीरोदकस्थः) असि (भवसि); अखिललोक-साक्षी (समष्ट्यन्तर्यामी) त्वं नारायणः (नारं अयसे जानासि द्वितीयपुरुषावतारः गर्भोदकस्थः) असि; नरभूजलायनात् (नरात् परमात्मनः उद्भूताः ये अर्थाः चतुर्विंशतितत्त्वानि, तथा नरात् जातं यत् जलं तदयनात् यः प्रसिद्धः आदिपुरुषावतारः कारणोदकस्थः) नारायणः सः अपि तव अङ्गं (अंशः)। तच्च अपि सत्यम् [एव], न तु माया (न मायिकवदनित्यम्)। [अवतारॆऽपि त्वयि तव चिन्मयकलेवरस्य स्पर्शने माया असमर्था। हे कृष्ण! त्वं मूलनारायणः, पुरुषाद्यवतारास्ते अंशा, त्वमेव अंशीति। तेऽवतारा अङ्गाः, त्वमेवाङ्गीति मे मतिः]। श्लोक-भावानुवाद-हे अधीश! तीनों पुरुषावतारोंसे अधिक ऐश्वर्य सम्पन्न क्या आप पुरुषावतारोंके प्रवर्तक नारायण नहीं हो? आप सभी प्राणियोंके आत्मा अर्थात् जीवसमूहके आश्रय तृतीय पुरुषावतार क्षीरोदकशायी नारायण हो; आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके अन्तर्यामी अर्थात् समष्टि जीवोंके साक्षी द्वितीय पुरुषावतार गर्भोदकशायी नारायण हो; आप नर अर्थात् परमात्मा जिनसे प्राकृत जगत्के आधारस्वरूप जल-पृथ्वी आदि चौबीस तत्त्व प्रकट होते हैं और नरसे उत्पन्न जलमें शयन करनेवाले प्रसिद्ध प्रथम पुरुषावतार कारणोदकशायी हो; अथवा वे नारायण भी आपके अंश हैं। वे भी सत्य ही हैं, मायिक वस्तुकी भाँति अनित्य नहीं हैं। [आपके अवतारोंके चिन्मय कलेवर (विग्रह) को भी माया स्पर्श करनेमें असमर्थ है। हे श्रीकृष्ण ! आप मूल नारायण हैं। पुरुषादि अवतार आपके अंश हैं और आप ही अंशी हैं। वे अवतार आपके अङ्ग हैं और आप ही उनके अङ्गी हैं, यह मेरा मत है] ॥ ३० ॥ श्लोककी व्याख्या :- शिशु वत्स हरि' ब्रह्मा करि अपराध। अपराध क्षमाइते मागेन प्रसाद ॥ ३१ ॥ अनुवाद-ब्रह्माजीने ग्वालबालों और बछड़ोंको हरण करके जो अपराध किया था, उस अपराधको क्षमा करनेके लिये वे श्रीकृष्णसे कृपा याचना कर रहे हैं ॥ ३१ ॥ श्रीकृष्ण मूल नारायण होनेके कारण सभी पुरुषावतार उनके अन्तर्भुक्त :- “तोमार नाभिपद्म हैते आमार जन्मोदय। तुमि पिता-माता, आमि तोमार तनय ॥ ३२॥ पिता-माता बालकेर ना लय अपराध। अपराध क्षम, मोरे करह प्रसाद ॥” ३३ ॥ अनुवाद-ब्रह्माजीने कहा- “आपके नाभिकमलसे मेरा जन्म हुआ है, इस कारणसे आप मेरे पिता-माता हैं और मैं आपका पुत्र हूँ। पिता-माता कभी भी बालक (पुत्र) का अपराध नहीं लेते हैं, अतः आप मेरे अपराधोंको क्षमा करके मुझपर कृपा करें ॥” ३२-३३॥ कृष्ण कहेन- “ब्रह्मा, तोमार पिता नारायण। आमि गोप, तुमि कैछे आमार नन्दन ॥” ३४॥ अनुवाद-ब्रह्माजीकी बातोंको सुनकर श्रीकृष्ण बोले- “हे ब्रह्मा ! तुम्हारे पिता नारायण हैं, मैं तो गोप हूँ, तुम कैसे मेरे पुत्र हो सकते हो?” ॥३४॥
$$दूसरा अध्याय \quad|\quad ६१$$