श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/२५-३० करनेके योग्य होते हैं। उदाहरण स्वरूप-जैसे सूर्यदेवका भी एक विग्रह (देह) है, किन्तु साधारण चर्मचक्षुओं या आसुरिक नेत्रोंके द्वारा उनके उस विग्रहका दर्शन नहीं होता। देवताओंके दिव्यनेत्र सूर्यके किरणरूपी जालको भेदकर उसका दर्शन करते हैं। जो मनुष्य ज्ञानमार्ग या योगमार्गमें भगवान्का अनुसन्धान करते हैं, वे उनके नित्यविग्रहके किरणजालरूप ब्रह्म और अंशरूपमें परमात्माका ही अनुसरण कर पाते हैं। किन्तु वे लोग भगवान्के चिन्मय नित्यविग्रहका दर्शन करनेके योग्य नहीं होते ॥ २५-२६ ॥ उपासना-भेदे जानि ईश्वर-महिमा । अतएव सूर्य ताँर दियेत उपमा ॥ २७ ॥ अनुवाद-उपासनाके भेदसे ईश्वरकी महिमाको जाना जाता है, इसे स्पष्ट करनेके लिये सूर्यका उदाहरण दिया गया है ॥ २७ ॥ (क) श्रीकृष्ण और नारायणके अभेद होनेपर भी उनमें लीलागतभेद है :- सेइ नारायण कृष्णेर स्वरूप अभेद । एकइ विग्रह, किन्तु आकार विभेद ॥ २८ ॥ इहोँ त' द्विभुज, तिँहो धरे चारि हाथ । इहोँ वेणु धरे, तिँहो चक्रादिक साथ ॥ २९ ॥ अनुवाद-वे नारायण और श्रीकृष्ण स्वरूपतः अभेद हैं अर्थात् अभिन्न हैं, दोनों एक ही विग्रह हैं, किन्तु उनका आकार अलग-अलग है। ये श्रीकृष्ण तो द्विभुज हैं और अपने हाथोंमें वंशी धारण करते हैं, किन्तु वे नारायण चतुर्भुज हैं और अपने हाथोंमें शंख, चक्रादि धारण करते हैं ॥ २८-२९ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/१४)- नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी । नारायणोऽङ्गं नरभू-जलायना- त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया ॥ ३० ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ३० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा]-हे अधीश ! आप सभी लोकोंके साक्षी हैं। जब आप प्रत्येक जीवकी आत्मा अर्थात् अत्यन्त प्रिय वस्तु हैं, तब क्या आप मेरे पिता नारायण नहीं हैं? 'नरजात जल' अर्थात् नरसे जलकी सृष्टि हुई, इसलिये उसे नार कहा जाता है और उसमें जो अयन अर्थात् शयन करते हैं, वे नारायण हैं। वे आपके अङ्ग अर्थात् अंश हैं। आपके अंश स्वरूप कारणाब्धिशायी, क्षीरोदशायी और गर्भोदशायी कोई भी मायाके अधीन नहीं हैं। वे सब मायाधीश और मायासे अतीत परमसत्य वस्तु हैं ॥ ३० ॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने बछड़ोंको हरण करनेके पश्चात् श्रीकृष्णके तत्त्वसे अवगत होकर जो स्तुति की, उनमेंसे यह एक श्लोक है- हे अधीश (पुरुषावतारत्रयादधिकैश्वर्यसम्पन्न), न हि [किं] त्वं नारायणः (नारस्य अयनं प्रवृत्तिर्यस्मात् सः); ६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत