भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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अनुवाद—जो श्रीनारायण नामसे परिचित हैं, वे छह ऐश्वर्योंसे पूर्ण लक्ष्मीपति भगवान् परव्योम (वैकुण्ठ) में रहते हैं। वेद, भागवत, उपनिषद्, आगम शास्त्रोंमें जिनको 'पूर्णतत्त्व' कहा जाता है, उनके समान कोई अन्य नहीं है॥२३-२४॥ अनुभाष्य—ऋक्संहिता (१/२२/२०)—“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्” आदि। श्रीमद्भागवत (११/३/३४-३५)—“नारायणाभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः। निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमाः॥ स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य, यत् स्वप्न-जागर-सुषुप्तिषु सद्बहिश्च। देहेन्द्रियासु हृदयानि चरन्ति येन, सञ्जीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र ॥” नारायणाथर्वशिर-उपनिषद्—“नारायणादेव समुत्पद्यन्ते नारायणात् प्रवर्त्तन्ते नारायणे प्रलीयन्ते। अथ नित्यो नारायणः। नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित्।” नारायणोपनिषद्—“यतः प्रसूता जगतः प्रसूता।” हयशीर्षपञ्चरात्र—“परमात्मा हरिर्देवः।” अर्थात् ऋक्संहितामें— “आकाशमें सूर्य उदित होनेसे आँख जिस प्रकार सर्वत्र देखनेकी योग्यता प्राप्त करती है, उसी प्रकार ज्ञानी लोग उन श्रीविष्णुके परमपदका सदा प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।” श्रीमद्भागवतमें महाराज निमिने नवयोगेन्द्रोंसे प्रश्न किया—“हे मुनिगण ! आप लोग ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं, इसलिये नारायण-नामक वस्तु, ब्रह्म और परमात्माके स्वरूपका वर्णन करनेमें समर्थ हैं।” ऋषि पिप्पलायनने कहा— “हे राजन! जो इस विश्वकी सृष्टि-स्थिति-प्रलयके कारण, किन्तु स्वयं कारणरहित हैं, वे नारायण हैं। जो स्वप्न, जाग्रत, गहन निद्रा और समाधि अवस्थामें भी सर्वत्र सत्-रूपमें नित्य वर्तमान रहते हैं, वे ब्रह्म हैं। शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण और हृदय जिनके बलसे सञ्जीवित होकर कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं, वे परमात्मा रूपमें जाने जाते हैं।” अथर्ववेदके अन्तर्गत श्रीनारायणोपनिषद्में कहा गया है— “श्रीनारायणसे ही सभीकी सृष्टि होती है, उनसे ही सब कुछ परिचालित होता है और सभी उनमें ही विलीन हो जाते हैं। इसलिये नारायण नित्य हैं। ये समस्त ब्रह्माण्ड जिनकी सृष्टि हुई है अथवा जिनकी सृष्टि होगी, वे सभी नारायणमय हैं। विशुद्धसत्त्वमय देवता नारायण एक ही हैं अर्थात् वे अद्वितीय हैं, उनके समान दूसरा कोई और नहीं है।”॥ २४॥ द्रष्टाभेदसे दर्शनभेद और उपायभेदसे उपेय-प्रतीतिभेद— भक्तियोगे भक्त पाय याँहार दर्शन। सूर्य येन सविग्रह देखे देवगण ॥ २५ ॥ अनुवाद—जैसे देवता लोग सूर्यको साक्षात् विग्रहके रूपमें देखते हैं, वैसे ही केवल भक्त ही भक्तियोगके द्वारा नारायणके चतुर्भुज रूपके दर्शन करते हैं॥ २५ ॥ ज्ञानयोगमार्गे ताँरे भजे येइ सब। ब्रह्म-आत्मरूपे ताँरे करे अनुभव ॥ २६ ॥ अनुवाद-ज्ञान मार्गमें जो उनका भजन करते हैं, वे केवल उनके निर्विशेष ब्रह्मरूपका और योगमार्गमें जो उनका भजन करते हैं, वे केवल उनके परमात्मारूपका ही अनुभव करते हैं॥ २६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जड़ इन्द्रियों अथवा ज्ञानमार्गकी चेष्टाके द्वारा भगवान्‌के नित्यविग्रहका दर्शन सम्भव नहीं है। केवल भक्तियोग अर्थात् भक्तिकी वृत्तिके द्वारा भक्तगण ही उनका दर्शन