भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ २/२२-२४ सार्वभौम-प्रतापरुद्रादिको मुक्तिकामी-भुक्तिकामीरूप भवसागरसे उत्तीर्ण (पार) करनेवाले जलपोत स्वरूप, आपके श्रीचरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ। ब्राह्मणका वचन (शाप) था कि तुम्हारा गृहस्थ सुख सब नष्ट हो जाय। उस वचनकी रक्षाके लिये प्राणोंसे भी दुस्त्यज, देवताओंके द्वारा भी अभिलषित राज्य और विष्णुप्रियारूप लक्ष्मीको भी त्यागकर जो (श्रीचैतन्य महाप्रभु) वनमें चले गये। वनमें कलत्र, पुत्र, धनादि रूप मायाको ढूँढनेवाले मृग अर्थात् संसारमें आसक्त लोगोंके पीछे (उनके कल्याणके लिये) दौड़ गये। अतिशय दयालु, अपने आलिङ्गनके छलसे संसाररूपी समुद्रमें गिरे जनको प्रेमरूपी समुद्रमें निमज्जित करनेमें समर्थ महाप्रभुके चरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ।” श्रीमद्भागवत (७/९/३८) प्रह्लाद वचन— “इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारैर्लोकान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान्। धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम्॥” अर्थात् “हे पुरुषोत्तम! इस प्रकार आप मनुष्य, पशु, पक्षी, ऋषि, देवता और मत्स्यादि अवतार लेकर लोकोंका पालन और विश्व-द्रोहियोंका संहार करते हैं। इन अवतारोंके द्वारा आप प्रत्येक युगमें युगानुरूप धर्मकी रक्षा करते हैं, परन्तु कलियुगमें तो आप छिपकर गूप्तरूपसे अवतार धारण करते हैं। अतः आपका एक नाम “त्रियुग' भी है।” यहाँपर गुप्त अवतारसे श्रीकृष्णचैतन्य अवतारका बोध होता है। कृष्णयामलमें— “पुण्यक्षेत्रे नवद्वीपे भविष्यामि शचीसुतः” अर्थात् “भविष्यमें मैं पुण्यक्षेत्र नवद्वीपमें शचीनन्दनके रूपमें आऊँगा।” ब्रह्मयामलमें— “अथवाहं धराधाम्नि भूत्वा मद्भक्तरूपधृक्। मायायां च भविष्यामि कलौ सङ्कीर्तनागमे॥” अर्थात् “कलिकालमें सङ्कीर्तनके आरम्भके समय मैं भूतपर अपने प्रिय भक्तोंका-सा वेष बनाकर श्रीमायापुरमें अवतीर्ण होऊँगा।” वायुपुराणमें— “कलौ सङ्कीर्तनारम्भे भविष्यामि शचीसुतः। स्वर्णद्युतिं समास्थाय नवद्वीपे जनाश्रये॥” अर्थात् “कलिकालमें सङ्कीर्तनको आरम्भ करनेके लिये नवद्वीप नामक पुरीमें सुवर्ण कान्ति ग्रहणकर शचीपुत्ररूपमें प्रकट होऊँगा।” अनन्त-संहितामें— “य एव भगवान् कृष्णो राधिकाप्राणवल्लभः। सृष्ट्यादौ स जगन्नाथो गौर आसीन्महेश्वरि॥” अर्थात् श्रीशङ्करजी पार्वतीसे बोले—“हे महेश्वरी! सृष्टिके आदिमें जिन प्रभुका नाम श्रीजगन्नाथ था और जो द्वापरमें श्रीराधिकाप्राणवल्लभ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्ररूपमें अवतीर्ण हुए थे, वे ही पुराण पुरुषोत्तम प्रभु प्रेमलक्षणा भक्ति प्रदान करनेके लिये गौराङ्गरूपमें अवतरित होंगे।” आदि। यहाँपर इसी ग्रन्थ (चैतन्यचरितामृत) में उद्धृत प्रमाणोंका समावेश करनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, इसलिये उन्हें यहाँ नहीं दिया जा रहा है॥ २२॥ परव्योमपति नारायण ही सभी शास्त्रोंमें वर्णित :- परव्योमेते कैसे नारायण नाम। षडैश्वर्यपूर्ण लक्ष्मीकान्त भगवान् ॥ २३॥ वेद, भागवत, उपनिषद्, आगम। 'पूर्णतत्त्व' याँरे कहे, नाहि याँर सम ॥ २४॥ ५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत