श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/२२ ] (३) भगवद्विचार :- सेइत' गोविन्द साक्षाच्चैतन्य गोसाञि। जीव निस्तारिते ऐछे दयालु आर नाइ॥ २२॥ अनुवाद—वे श्रीगोविन्द ही साक्षात् श्रीचैतन्य महाप्रभु हैं, जीवोंका उद्धारके लिये उनके समान दयालु और कोई नहीं है॥ २२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँपर साक्षात् शब्दके प्रयोगके द्वारा ग्रन्थकार यह सिद्धान्त प्रकाश कर रहे हैं कि श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं श्रीगोविन्द ही हैं अर्थात् श्रीगोविन्दके कोई प्रकाश अथवा विलास विग्रह नहीं हैं॥ २२॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं श्रीगोविन्द ही हैं, इस बातके शास्त्रोंसे कुछ प्रमाण यहाँ उद्धृत किये जा रहे हैं। चैतन्योपनिषद्में कहा है— “गौरः सर्वात्मा महापुरुषो महात्मा महायोगी त्रिगुणातीतः सत्त्वरूपो भक्तिं लोके काश्यतीति।” अर्थात् “सर्वान्तर्यामी, महापुरुष महात्मा, महायोगी, त्रिगुणातीत, शुद्धसत्त्वस्वरूप श्रीगोविन्द गौर रूपमें अवतीर्ण होकर जीवोंमें भक्तिका प्रकाश करेंगे।” श्वेताश्वतर (६/७)— “तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमञ्च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥” अर्थात् “भक्तजन कहते हैं कि हम उन समस्त ब्रह्माण्डोंके नायक देवको जानते हैं जो शङ्कर, ब्रह्मादि ईश्वरोंके महेश्वर अर्थात् नियन्ता हैं, देवताओंके भी परम पूज्य देवता हैं, प्रजापतियोंके भी प्रजापति हैं और प्रकृतिसे परे हैं।” और श्वेताश्वतर (३/१२)— “महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैषः प्रवर्त्तकः। सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः॥” अर्थात् “सर्वान्तर्यामी श्रीमन्महाप्रभुजी ही सुनिर्मल अपनी भक्तिरूपी मणिकी प्राप्तिके लिये अपनी अहैतुकी कृपासे प्राणी मात्रको प्रवृत्त करनेवाले हैं।” (मुण्डक ३/१/३)— “यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्। तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति॥” अर्थात् “जिस समय जीव ईश्वरका दर्शन करता है, तब वह विद्वान् पुण्य और पापोंको छोड़कर प्रकृतिसे बने इस देह और प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर परम समता (मित्रता) को प्राप्त होता है। उस परमात्माका वर्ण सुवर्णके समान मनोहर है, वे सर्वान्तर्यामी प्रभु जगत्के कर्त्ता और ब्रह्माजीके भी जनक हैं।” श्रीमद्भागवत (११/५/३३-३४)— “ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चिनुतं शरण्यम्। भृत्यार्त्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥ त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्। मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावत् वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥” इति। अर्थात् “हे शरणागतजनोंके पालक! हे परम पुरुषोत्तम महाप्रभो! निरन्तर ध्यानयोग्य, श्रीकृष्णप्रेमप्रदाता, श्रीगौर-क्षेत्र-ब्रजमण्डलादि तीर्थोंके आश्रयस्वरूप, शिवावतार श्रीअद्वैताचार्य और ब्रह्मावतार श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा स्तुत्य, निजसेवक कुष्ठरोगी विप्रके आर्त्तिनाशक, दूसरा अध्याय | ५७