भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ २/२०-२१ अथवा हे अर्जुन, बहुना (बाहुल्येन पृथक् पृथगुपदिश्यमानेन) ज्ञातेन किं [तव प्रयोजनम्—अलमित्यर्थः]। इदं (चिदचिदात्मकं) कृत्स्नं (समग्रं) जगत् एकांशेन (प्रकृत्याद्यन्तर्यामिना पुरुषाख्येन अंशेन) विष्टभ्य (अधिष्ठानत्वात् विधृत्य अधिष्ठातृत्वादधिष्ठाय, नियन्तृत्वात्रियम्य व्यापकत्वात् व्याप्य) अहं (भगवान्) स्थितः। श्लोक-भावानुवाद—अथवा हे अर्जुन, पृथक्-पृथक् बहुत उपदेशोंसे ज्ञानका तुम्हारा क्या प्रयोजन है? चित् और अचित्रूप समस्त जगत्में प्रकृतिके अन्तर्यामी रूपमें पुरुष नामक एक अंशसे (अधिष्ठानको विशेष भावसे धारणकर, अधिष्ठाता होनेके कारण अधिष्ठित होकर, नियन्ताके रूपमें इसे अधीनकर, व्यापकत्वके रूपमें व्याप्त होकर) मैं (भगवान्) स्थित हूँ॥२०॥ श्रीमद्भागवत (१/९/४२)— तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम्। प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ २१ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भीष्म बोले—“हे कृष्ण! एक ही सूर्य जिस प्रकार प्रत्येक आँखसे देखनेसे पृथक्-पृथक् वस्तु जैसे जाना जाता है, उसी प्रकार आपके एक अंशरूप परमात्माका प्रत्येक जीवके हृदयमें स्थित होनेसे उनका पृथक्-पृथक् तत्त्वरूपमें अनुमान होता है। किन्तु जब जीव स्वयंको आपका मानता है अर्थात् स्वयंको आपके दासके रूपमें जानता है, तब उसे वह भेदभ्रम नहीं रहता। मैंने भी परमात्माको आपका अंश जानकर उसी प्रकार भेदभ्रमसे मुक्त होकर आपके अजन्मा स्वरूपका ज्ञान प्राप्त किया है।”॥२१॥ अनुभाष्य—युधिष्ठिर जब भीष्मसे धर्मके विषयमें प्रश्न करनेकी इच्छासे उनके निकट गये, तो श्रीकृष्णने भी अर्जुनके रथमें बैठकर उनका अनुगमन किया। अन्यान्य देवर्षि-ब्रह्मर्षिगण भी भीष्मके दर्शनके लिये वहाँ उपस्थित थे। युधिष्ठिरके कुछ प्रश्नोंके उत्तर देनेके बाद भीष्मने अपना निर्याणकाल उपस्थित होनेपर सामने उपस्थित श्रीकृष्णकी अनेक श्लोकोंमें स्तव-स्तुति की; उन श्लोकोंमेंसे यह एक श्लोक है— [नानादेशावस्थितानां प्राणिनां] प्रतिदृशं (अवलोकनं प्रति) [यथा] एकं अर्कं इव नैकधा (अधिष्ठानभेदात् अनेकधा दृष्टं) [तथा] आत्मकल्पितानां (आत्मना स्वयमेव कल्पितानां) शरीरभाजां हृदि हृदि (प्रतिहृदयं) धिष्ठितम् (अधिष्ठितं) तम् इमं अजं (श्रीकृष्णं) विधूतभेदमोहः (विधूतो दूरीकृतो भेदरूपो मोहः भगवतः नामरूपगुणलीलाभेदरूपः भगवद्विग्रहस्य प्रकाशविलासमुर्तिभेदेन व्यापकत्व-संभावनाजनित-नानात्वप्रतीतिलक्षणः मोहः यस्य तथाभूतः) अहं समधिगतः (सम्यगधिगतः प्राप्तः अस्मि)। श्लोक-भावानुवाद—अलग-अलग स्थानोंमें स्थित प्राणियोंको जिस प्रकार एक ही सूर्य उनकी स्थितिके अनुसार अलग-अलग दिखलायी देता है, उसी प्रकार प्रत्येक देहधारीके हृदयमें स्थित आप वे परमात्मा पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं। परन्तु अजन्मा आप (भगवान् श्रीकृष्ण) के नाम-रूप-गुण-लीलामें भेदरूप अथवा आपके विग्रहका उनके प्रकाश और विलासमूर्तियोंसे भेदरूप अथवा आपके सर्वव्यापक होनेसे नाना प्रकारकी प्रतीतिरूप मोहको दूर करके, मैं पूर्णरूपसे आपके शरणागत हुआ हूँ॥२१॥ ५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत