भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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२/१९-२० ]

प्रकाशित होते हैं। “द्वा सुपर्णा सयुजा” आदि तीन मन्त्रोंमें एक वृक्षमें सेव्य-सेवकके रूपमें अवस्थित जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षियोंके विषयमें उल्लेख है। परमात्मा जीवात्माको कर्मफल भोग कराते हैं, किन्तु उसके समान फलके भोक्ता नहीं होते। जब जीव स्वयंको कर्मफलके भोक्ता माननेका अभिमान त्यागकर सेव्य-परमात्माकी महिमाको समझ पाता है, तब वह निर्दोष होकर परम समता वैकुण्ठधामको प्राप्त करता है॥१९॥ अमृतानुकणिका—श्रीगोविन्दके अंश परमात्मा एक वस्तु हैं, वे दो नहीं हैं, किन्तु जीव अनन्त हैं। एक ही सूर्य जैसे अनन्त स्फटिक खण्डोंमें प्रत्येकमें प्रतिबिम्बरूपमें प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा अनन्त कोटि जीवोंमें व्यष्टिजीव-अन्तर्यामी रूपमें प्रकाशित होते हैं। यहाँपर एक ही वस्तुका भिन्न-भिन्न स्थानोंमें प्रकाशत्वांश ही दृष्टान्तके द्वारा प्रयोज्य है; सम्पूर्ण रूपसे दृष्टान्तकी प्रयोजनीयता नहीं है। अनन्त स्फटिक खण्डोंमें सूर्यका प्रतिबिम्ब प्रकाशित होता है, प्रतिबिम्ब वास्तविक वस्तु नहीं है। किन्तु जीवके हृदयमें परमात्मा प्रतिबिम्ब रूपमें प्रकाशित नहीं होते—वास्तविक रूपमें ही प्रकाशित होते हैं। वे अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे एक होकर भी अनन्त कोटि जीवोंके प्रत्येकके हृदयमें भिन्न-भिन्न मूर्तिके रूपमें अवस्थान करते हैं। परमात्माका प्रतिबिम्ब सम्भवपर नहीं है, क्योंकि परमात्मा अपरिछिन्न विभु वस्तु हैं। परिछिन्न (ढकी अथवा सीमित) वस्तुका ही प्रतिबिम्ब सम्भव है, विभु वस्तुका प्रतिबिम्ब सम्भव नहीं हैं। देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग आदि अनन्त प्रकारके अनन्त जीव हैं। सृष्टि लीलाके अनुरोधसे एक ही परमात्मा इन समस्त जीवोंके प्रत्येकके भीतर अन्तर्यामीके रूपमें विराजमान हैं। इसे देखकर कोई-कोई आशङ्का कर सकते हैं कि विभिन्न जीवोंके अन्तर्यामी परमात्मा भी विभिन्न हैं। इसी आशङ्काको दूर करनेके लिये इस पयारमें कहा गया है—परमात्मा एक ही वस्तु हैं, अनेक नहीं। अपने कर्मफलोंसे जीव मायिक देहका आश्रय करता है, किन्तु जीवकी देहमें परमात्माकी अवस्थिति उनके कर्मफलके कारण नहीं, अपितु उनकी लीलामात्र ही है। परमात्माका कोई कर्म नहीं है, वे मायातीत हैं। जीवकी देहके साथ परमात्माका कोई सम्बन्ध भी नहीं है। वे निर्लिप्त भावसे जीवके अन्तर्यामीरूपमें जीवकी देहमें अवस्थित होते हैं॥१९॥ श्रीमद्भगवद्गीता (१०/४२)— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥२०॥ अनुवाद—अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्‌को धारणकर अवस्थित हूँ॥२०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन! मैं अधिक क्या कहूँ? मैं अपने एक अंश परमात्मारूपसे सम्पूर्ण जगत्में प्रविष्ट होकर अवस्थित हूँ॥२०॥ अनुभाष्य—भगवान् अर्जुनको विभिन्न प्रकारसे अपनी विभूतियोंके सम्बन्धमें बतलाकर अब संक्षेपमें उसका अर्थ प्रकाश कर रहे हैं—

दूसरा अध्याय | ५५