भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ २/१७-१९ अमृतप्रवाह भाष्य-दिगम्बर (निर्वस्त्र), श्रमशील, उर्द्धरेता मुनिगण, शान्त और निर्मल संन्यासी; ये सभी ब्रह्मधामको प्राप्त करते हैं॥१७॥ अनुभाष्य-यह जानकर कि श्रीकृष्ण अतिशीघ्र अन्तर्धान हो जायेंगे, उद्धवजी उनके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करते हुए कहने लगे कि भक्तोंके लिये उनके चरणोंकी प्राप्ति अत्यन्त सहज है, परन्तु अनेक कष्ट उठाकर तपस्या करनेवाले संन्यासियोंको परिश्रमसे प्राप्त उस साधनके फलस्वरूप केवलमात्र ब्रह्मलोककी ही प्राप्ति होती है। वातवसनाः (दिगम्बराः वसनहीनाः) श्रमणाः (शरीरकर्षणकारिणः भिक्षवः) उर्द्धमन्थिनः (उर्द्धरेतसः) शान्ताः (ब्रह्मनिष्ठैकधियः) अमलाः (विषयमलवर्जिताः संन्यासिनः) ते ब्रह्माख्यं (निर्विशेषरूपं) धाम यान्ति (प्राप्नुवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-दिगम्बर अर्थात् निर्वस्त्र रहने वाले, शरीरको कष्ट देकर तपस्या करनेवाले भिक्षु, उर्द्धरेता, ब्रह्ममें निष्ठ ऐकान्तिक बुद्धिवाले और विषयभोगरूपी मलरहित संन्यासी; वे सब निर्विशेष ब्रह्मधामको प्राप्त करते हैं॥१७॥ (२) परमात्म-विचार :- आत्मान्तर्यामी याँरे योगशास्त्रे कय। सेह गोविन्देर अंश विभूति ये हय॥१८॥ अनुवाद-जिनको योगशास्त्रमें आत्मा-अन्तर्यामी कहा गया है, वे श्रीगोविन्दकी अंश विभूति हैं॥१८॥ अनुभाष्य-भगवान् चित्-विलासमय विग्रह हैं। वे तुरीय विग्रह (परब्रह्म) होनेके कारण देवीधाम (माया जगत्) के किसी भी कार्यमें स्वयं आसक्त ना होकर पुरुषावतारके द्वारा 'प्रधान' और जीवके नियन्ता हैं। तीन प्रकारके पुरुषावतारोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव चौबीस मायिक-तत्त्वोंसे बने स्थूल-सूक्ष्म शरीरके बन्धनसे मुक्त होते हैं। प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी रूपमें क्षीरोदकशायी महाविष्णु, ब्रह्माण्डके समष्टि-जीवोंके अन्तर्यामी रूपमें गर्भोदकशायी महाविष्णु और समस्त ब्रह्माण्डोंके स्रष्टा कारणोदशायी अन्तर्यामी महाविष्णु, ये तीनों पुरुषावतार देवीधामके सृष्टिकर्त्तारूपमें आंशिक कार्योंके ही नियन्ता हैं। चौबीस मायिकतत्त्वोंका अतिक्रम करके परमात्मासे योगका विधान योगशास्त्रोंमें वर्णित है। इसलिये अन्तर्यामी पुरुष परमात्मा, श्रीगोविन्दकी अंश-विभूति मात्र हैं॥१८॥ अनन्त स्फटिके यैछे एक सूर्य भासे। तैछे जीवे गोविन्देर अंश प्रकाशे॥१९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जैसे अनन्त स्फटिक खण्डोंमें एक ही सूर्य प्रकाशवान् होकर पृथक्-पृथक् रूपमें दिखायी देते हैं, उसी प्रकार असंख्य जीवोंमें श्रीगोविन्दके अंश परमात्मा प्रकाश पाते हैं॥१९॥ अनुभाष्य-एक ही सूर्य जिस प्रकार अपने स्थानमें अवस्थित होकर अनन्त स्फटिक खण्डोंमें अनन्तमूर्तिके रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार एकमात्र श्रीगोविन्द गोलोक-वृन्दावनमें नित्य प्रकट रहकर अनन्त जीवोंके हृदयमें जीवोंके सेव्यपुरुष अन्तर्यामी परमात्माके रूपमें ५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत