श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/१३-१७ ] अनुवाद—जिस प्रकार इन भौतिक चक्षुओंसे देखनेपर सूर्य एक विशिष्ट-स्वरूपरहित प्रकाशमान वस्तु ही प्रतीत होता है, उसी प्रकार ज्ञानमार्गका आश्रय लेकर श्रीकृष्णके विशिष्ट स्वरूपको नहीं जाना जा सकता॥१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस लक्षणके द्वारा किसी वस्तुका परिचय प्राप्त होता है, उसको विशेष कहा जाता है। उस लक्षणसे रहित होना ही निर्विशेष है॥१३॥ ब्रह्मसंहिता (५/४०)— यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि- कोटीष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम्। तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतम् गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥१४॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंमें समस्त पृथ्वी आदि ऐश्वर्योंके द्वारा पृथक्कृत, निष्कल, अनन्त, असीम ब्रह्म जिनकी प्रभासे उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥१४॥ अनुभाष्य—श्रीब्रह्माजीके द्वारा श्रीगोविन्दके तत्त्व और माहात्म्यका स्तवरूपमें गान ब्रह्मसंहिता नामक ग्रन्थके पञ्चम अध्यायमें लिखा है— जगदण्डकोटि-कोटिषु (असंख्यब्रह्माण्डेषु) अशेष-वसुधादि-विभूतिभिन्नम् (अनन्तब्रह्माण्डादिभिराकाराभि- विभूतिभिर्भिन्नं लब्धपार्थक्यं) [यत्] निष्कलं (निरंशम् अखण्डं परिपूर्णं) अनन्तं (खण्डज्ञानातीतं) अशेषभूतं (सीमारहितं) तद्ब्रह्म प्रभवतः (प्रभाव-विशिष्टस्य) यस्य (गोविन्दस्य) प्रभा (अङ्गकान्तिः) तम् आदिपुरुषं गोविन्दं अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—असंख्य ब्रह्माण्ड और उन अनन्त ब्रह्माण्डोंमें पृथ्वी आदि विभिन्नाकार विभूतियोंसे पृथक् अखण्ड-परिपूर्ण-सीमारहित विशिष्ट प्रभाववाले ब्रह्म जिन श्रीगोविन्दकी अङ्गकान्तिमात्र हैं, उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥१४॥ कोटि कोटि ब्रह्माण्डे ये ब्रह्मेर विभूति। सेइ ब्रह्म गोविन्देर हय अङ्गकान्ति॥१५॥ सेइ गोविन्द भजि आमि, तँहो मोर पति। ताँहार प्रसादे मोर हय सृष्टिशक्ति॥१६॥ अनुवाद—करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड जिन ब्रह्मकी विभूति (ऐश्वर्य) हैं, वे ब्रह्म श्रीगोविन्दके अङ्गकी कान्ति हैं। मैं (ब्रह्मा) उन श्रीगोविन्दका भजन करता हूँ, वही मेरे स्वामी हैं और उन्हींसे मैं जगत्की सृष्टि करनेकी शक्ति ग्रहण करता हूँ॥१५-१६॥ श्रीमद्भागवत (११/६/४७)— वातवसना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः। ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमला॥१७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७॥ दूसरा अध्याय | ५३