भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ २/११-१३ उपादान भेद नहीं रहनेपर जिस किसी भी अंशमें कोई भी शक्ति अभिव्यक्त हो सकती है। बद्धजीवकी देह जड़ (अचित्) है, किन्तु जीव स्वरूपतः चित् वस्तु है। इसलिये बद्धजीवमें देह और देहीका स्वगत भेद है। किन्तु ज्ञान वस्तुमें इस प्रकार कोई भी देह-देहीका भेद नहीं होता। बद्धजीवकी जड़ देहमें भी पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-ये पाँच उपादान हैं। नेत्र, कर्ण आदि इन्द्रियोंमें इन पाँच वस्तुओंके तारतम्यके अनुसार इन इन्द्रियोंके योगसे प्रकाशित शक्तिका भी तारतम्य होता हैं। जैसे चक्षुके द्वारा केवल देखा जा सकता है, किन्तु सुना नहीं जा सकता। कानके द्वारा केवल सुना जा सकता है, किन्तु देखा नहीं जा सकता। यह सब भी स्वगत-भेदका फल है। चिदेकरूप ज्ञान-वस्तुमें विभिन्न उपादान नहीं होनेपर यह जातीय पार्थक्य नहीं हो सकता। ज्ञान-वस्तुका प्रत्येक अंश अन्य प्रत्येक अंशका कार्य कर सकता है, इसलिये ब्रह्मसंहितामें कहा गया है-“अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति” अर्थात् “जिस श्रीविग्रहके सारे अङ्ग अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय अन्य समस्त इन्द्रियोंके कार्य कर सकती है”। जिस ज्ञानमें इस प्रकार स्वयंसिद्ध सजातीय, स्वयंसिद्ध विजातीय और स्वगत भेद नहीं है, उसको ही अद्वयज्ञान कहा जाता है। तत्त्ववेत्ता पण्डित इसी अद्वयज्ञान-वस्तुको तत्त्व अथवा परमार्थभूत वस्तु कहते हैं। श्रीकृष्ण ही यह अद्वयज्ञान-वस्तु हैं-“अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु कृष्णेर स्वरूप।” (आदि २/६५) ॥११॥ (१) ब्रह्म-विचार :- ताँहार अङ्गेर शुद्ध किरण-मण्डल। उपनिषद् कहे ताँरे ब्रह्म-सुनिर्मल ॥१२॥ अनुवाद-उन अद्वयज्ञान तत्त्वके अङ्गोंकी ज्योतिको उपनिषद् सुनिर्मल ब्रह्म कहते हैं ॥१२॥ अनुभाष्य-मुण्डकोपनिषद्के द्वितीयमुण्डक, द्वितीयखण्डके मन्त्र ९-११में कहा गया है- “हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्नि। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति। ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।” अर्थात् “आत्माके तत्त्वको जाननेवाले लोग जिन्हें परब्रह्मके रूपमें जानते हैं, वे स्वर्ण-ज्योतिसे आलोकित आनन्दमय चिन्मयधाममें और जीवोंके हृदयोंमें वास करनेवाले हैं। वे निर्गुण, अखण्ड, सर्वथा दोषरहित और सभी ज्योतिर्मय वस्तुओंके भी ज्योतिस्वरूप हैं। उनको चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, विद्युतादि भी प्रकाशित नहीं कर सकते, तो अग्निका कहना ही क्या? उनका अनुसरण करके ही सूर्य आदि सभी उनसे प्रकाशको प्राप्त करते हैं, उनके प्रकाशसे ही यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है। सामने, पीछे, दायें, बायें, ऊपर और नीचे यह जो विश्व विस्तृत हुआ है, वह समस्त ही उसी अमृतस्वरूप शाश्वत ब्रह्मात्मक है। अतएव ब्रह्म ही श्रेष्ठतम तत्त्व है।” ॥१२॥ चर्मचक्षे देखे यैछे सूर्य निर्विशेष। ज्ञानमार्गे लइते नारे ताँहार विशेष ॥१३॥ ५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत