श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/११ ] इसलिये श्रीकृष्णेतर वस्तु [जीवात्मा] माया अथवा अज्ञानके द्वारा श्रीकृष्णसे अर्थात् अद्वयज्ञानसे स्वतन्त्र होकर मायाके वशीभूत होनेकी योग्यता प्राप्तकर मायाके वशीभूत अथवा द्वैतज्ञानके अधीन होती है। श्रीकृष्णके समस्त प्रकाश और विलास विग्रहोंमें द्वितीयज्ञान (उनके नाम-रूप-गुण-लीला और उनमें भेद) नहीं है, इसलिये विष्णुतत्त्व होनेके कारण वे मायाधीश हैं। योगीलोग अद्वयज्ञान-विग्रह परमात्माके साथ शुद्धात्माके अविमिश्र (आत्माकी परमात्मासे स्वतन्त्र सत्ता रखते हुए) केवलयोगको ही द्वितीयज्ञानरहित अवस्था जानते हैं। ज्ञानीलोग स्वगत-सजातीय-विजातीयभेदहीन निर्विशेष ज्ञानको ही अद्वयज्ञान ब्रह्म जानते हैं। (भाष्यकारकृत भागवतके इस श्लोकका गौड़ीय-भाष्य द्रष्टव्य है।) ॥ ११ ॥ अमृताणुकणिका—'ज्ञान'—जो केवलमात्र चित्, जिसमें अचित् (जड़) किञ्चित् मात्र भी नहीं है, वही ज्ञान-वस्तु, सच्चिदानन्द वस्तु है। 'अद्वय'-द्वितीय-शून्य, भेद-शून्य। भेद तीन प्रकारके हैं—सजातीय भेद, विजातीय भेद और स्वगत भेद। एक जातिमें एकसे अधिक वस्तु रहनेपर सजातीय अर्थात् समान-जातीय भेद सम्भव है। जैसे मनुष्य अनेक हैं, वे सभी मनुष्य जातिके हैं, परन्तु उनके नाम और रूपादि पृथक् होते हैं। इसलिये समान जाति होनेपर भी उनमें सजातीय भेद है। इसी प्रकार एकसे अधिक चित् वस्तु होनेपर सजातीय भेदकी सम्भावना है। किन्तु वस्तुतः एकसे अधिक चित् वस्तु रहनेपर भी यदि अन्यान्य सभी चित् वस्तुएँ एक मूल चित् वस्तुकी अंश हों, तो उनमें सजातीय भेद नहीं होगा, क्योंकि यदि एकसे अधिक स्वयंसिद्ध चित् वस्तुएँ होतीं, तभी ज्ञानका सजातीय भेद सम्भव था। सजातीयभेदशून्य ज्ञान वह वस्तु है, जिसके तुल्य स्वयंसिद्ध अन्य कोई भी चित् वस्तु नहीं है; अन्य चित् वस्तुएँ होनेपर भी उनमेंसे कोई भी स्वयं सिद्ध नहीं है, प्रत्येककी निज सत्ता उस अद्वयज्ञानकी अपेक्षा रखती है। भिन्न जातीय वस्तु ही विजातीय भेद है—जैसे पशु और मनुष्यमें विजातीय भेद है। ज्ञान अथवा चित् वस्तुमें विजातीय वस्तु क्या है? ज्ञान चित्-जातीय वस्तु है और जो चित् नहीं है, प्राकृत अथवा जड़ है, वही ज्ञानके विपरीत वस्तु है। यह विजातीय वस्तु यदि स्वयंसिद्ध नहीं हो और अपनी सत्ताके लिये ज्ञानकी अपेक्षा रखे, तब इस विजातीय वस्तुका भी ज्ञानके साथ विजातीय भेद नहीं होगा, क्योंकि यह विजातीय वस्तु स्वयं सिद्ध नहीं हैं। यदि यह विजातीय वस्तु स्वयं सिद्ध हो और ज्ञानकी कोई अपेक्षा नहीं रखती हो, तब उसका ज्ञानसे विजातीय भेद होगा। ज्ञान वस्तुमें कभी भी स्वगतभेद नहीं होता है। स्वगत शब्दका अर्थ है—अपने मध्य। जिस वस्तुमें एकसे अधिक उपादान हैं, उपादान भेदसे उसमें ही स्वगतभेद होता है। जैसे दीवारमें ईंट, सीमेंट, रेत, बालू आदि होते हैं, ये सब उपादान परस्पर विभिन्न हैं, इसलिये दीवारमें स्वगत भेद है। परस्पर मिलानेपर उनके परिमाणके अनुसार दीवारके विभिन्न अंशोंमें शक्तिकी क्रिया भी विभिन्न रूपोंमें अभिव्यक्त होगी। शक्ति क्रियाकी इस प्रकारकी विभिन्न अभिव्यक्ति भी स्वगत भेद है अर्थात् विभिन्न परिमाणमें सीमेंट, रेत, बालूके मिश्रणसे शक्तिकी क्रिया अलग-अलग स्थानोंमें विभिन्न परिमाणसे दिखायी देगी। ज्ञान वस्तुमें इस प्रकार स्वगत भेद नहीं रहता है, क्योंकि ज्ञान चित् स्वरूप है और चित्के अतिरिक्त उसमें कोई मिश्रण नहीं है। दूसरा अध्याय | ५१