भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

[ २/१०-११ है—अपने भक्तोंके पालनकर्त्ता। 'भर्त्ता' का अर्थ है धारक या स्थापक। 'नेता' शब्दका अर्थ है अपनी भक्तिके फल प्रेमको प्रदान करनेवाले। 'गमयिता' का अर्थ है अपना धाम प्रदान करनेवाले। 'स्रष्टा' शब्दका अर्थ—अपने भक्तोंमें उपरोक्त वर्णित गुणोंके सृष्टिकर्त्ता। जो स्वयं कारणरहित हैं, एकमात्र स्वरूपशक्तिके द्वारा लीलाविलासमें रत हैं, संसारसे सम्पूर्ण उदासीन होनेपर भी प्रकृति और जीवके प्रवर्तकरूपमें अपने स्वांश पुरुषके द्वारा संसारके जन्म, स्थिति आदिके मूल कारण हैं, उन्हीं तत्त्वको ही भगवत्-तत्त्व जानना होगा। जो जगत्के कारणरूप कर्त्ता हैं, जगत्में अपने अंश अर्थात् चित्कण जीवोंको प्रवेश करवाकर जगत्को सञ्जीवित करते हैं और देहादि-उपलक्षण एवं प्रधानादि तत्त्व जिनके द्वारा प्रेरित होकर अपनी-अपनी स्थितिमें रहकर कार्यमें प्रवृत्त होते हैं, उन्हें परमात्मा जानना होगा। जीव भी स्वरूपतः आत्मा है, परन्तु जीवसे अधिक श्रेष्ठ होनेके कारण वे परम-आत्मा कहलाते हैं। वे जीवके नित्य सहयोगीके रूपमें प्रकाशित होते हैं। जो तत्त्व स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति (गाढ़निद्रा)—इन तीनों अवस्थाओंमें अन्वयरूपमें स्थित रहता है और जो अपनेसे भिन्न स्वरूप शुद्ध जीव-नामक शक्तिमें भी अन्वयरूपसे अवस्थान करता है और समाधि अवस्थामें जो विशेषणरहित-निर्विशेष अर्थात् चिन्मय-सत्तामात्रसे प्रकाशित होता है, उसको ही ब्रह्म जानना होगा॥"१०॥ श्रीमद्भागवत (१/२/११)— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥११॥ अनुवाद—जो अद्वयज्ञान अर्थात् एक अद्वितीय वास्तव वस्तु है, उसीको तत्त्वज्ञानीजन परमार्थ कहते हैं। वही तत्त्ववस्तु ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीनों नामोंसे जानी जाती है॥११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं॥११॥ अनुभाष्य—शौनकादि ऋषियोंने शुकदेवजीके शिष्य सूत गोस्वामीजीसे छह प्रश्न किये थे। 'शास्त्रका सारतत्त्व क्या है?' इस द्वितीय प्रश्नके उत्तरमें सूत गोस्वामीजीने यह श्लोक कहा— तत्त्वविदः (तत्त्वज्ञाः) तत् [एव] तत्त्वम् अद्वयं ज्ञानं (चिदेकरूपं) वदन्ति। यत् [अद्वयज्ञानं क्वचित्] ब्रह्म इति, [क्वचित्] परमात्मा इति, [क्वचित्] भगवान् इति च शब्द्यते (अभिधीयते; अयमर्थः—केवलज्ञानवृत्त्या अद्वयज्ञानरूपं ब्रह्म, सच्चिद्वृत्त्या अद्वयज्ञानरूपः परमात्मा, सच्चिदानन्दवृत्त्या तदद्वयज्ञानरूपो भगवान्)। श्लोक-भावानुवाद—तत्त्वको भली-भाँति जाननेवाले उस तत्त्वको अद्वयज्ञान (अद्वितीय चित्-रूप) कहते हैं। (उस अद्वय ज्ञानको शास्त्र कहीं) ब्रह्म, (कहीं) परमात्मा, (और कहीं) भगवान् नामसे कहते हैं। [इसका अर्थ है कि उस अद्वयज्ञानकी केवल ज्ञान-वृत्तिसे ब्रह्मरूपमें, सत्-चित्-वृत्तिसे परमात्मारूपमें और सच्चिदानन्द-वृत्तिसे भगवान्रूपमें प्रतीति होती है।] भगवद्भक्त व्रजेन्द्रनन्दनको ही अद्वयज्ञानविग्रहके रूपमें जानते हैं। वे श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण और लीलाको श्रीकृष्णसे भिन्न नहीं मानते हैं, यही अद्वयज्ञानका तात्पर्य है। अद्वयज्ञानके अभावमें ही अभक्त लोग विष्णुविग्रहमें प्राकृत बुद्धि रखकर श्रीकृष्णको उनके अप्राकृत नाम, रूप, गुण और लीलासे पृथक् मानते हैं। श्रीकृष्णेतर अविष्णु-वस्तुमें अद्वयज्ञानका अभाव है। ५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत