श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/६-१० ]
सङ्गियोंकी आवश्यकता है। श्रीकृष्ण अनादिकालसे ही लीलारसका आस्वादन कर रहे हैं, इसलिये यह सहजमें ही समझा जा सकता है कि उनके लीलासङ्गी और लीला-परिकर अनादिकालसे ही उनके साथ हैं। श्रीकृष्ण पूर्ण, अन्य-निरपेक्ष और आत्माराम हैं, परन्तु उनके लीलाके परिकर श्रीकृष्णसे स्वतन्त्र नहीं हैं। वे उनके अंश अथवा शक्ति हैं। अनादिकालसे श्रीकृष्णने अंश अथवा शक्तिसे लीला-परिकर-रूपमें स्वयंको प्रकट किया हुआ है। श्रीकृष्ण दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन चार भावोंके परिकरोंके साथ चार भावोंके रसका आस्वादन करते हैं। वात्सल्य रसके आस्वादनके लिये पिता-माताका प्रयोजन है, इसलिये श्रीकृष्णकी शक्ति ही अनादिकालसे पिता-माता (नन्द और यशोदा) के रूपमें एक-एक स्वरूपमें विराजित हैं। स्वरूपतः नन्द-यशोदासे श्रीकृष्णका जन्म नहीं हुआ है। तो भी प्रेमके प्रभावसे श्रीकृष्ण ये मानते हैं कि नन्द-यशोदा ही उनके पिता-माता हैं और वे श्रीकृष्णका अपना पुत्र मानते हैं। इसलिये श्रीकृष्णको नन्दसुत अथवा यशोदासुत कहा जाता है॥६-९॥
ब्रह्म, परमात्मा और भगवत् विचार :- प्रकाशविशेषे तेंह धरे तिन नाम। ब्रह्म, परमात्मा आर स्वयं भगवान्॥१०॥
अनुवाद—(श्रीकृष्ण अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभुके) ये प्रकाश-विशेष ब्रह्म, परमात्मा और स्वयं-भगवान्, इन तीन नामोंसे जाने जाते हैं॥१०॥
**अनुभाष्य—**श्रील जीवगोस्वामी श्रीभगवत्सन्दर्भ (संख्या-३) में लिखते हैं— “तथा चैवं वैशिष्ट्ये प्राप्ते पूर्णाविर्भावत्वेनाखण्ड-तत्त्वरूपोऽसौ भगवान्। ब्रह्म तु स्फुटमप्रकटित-वैशिष्ट्याकारत्वेन तस्यैवासम्यगाविर्भावः। ‘संभर्त्तेति तथा भर्त्ता भकारोऽर्थद्वयान्वितः। नेता गमयिता स्रष्टा गकारार्थस्तथा मुने॥ वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि। स च भूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः॥ ज्ञानशक्ति-बलैश्वर्य-वीर्यतेजांस्य-शेषतः। भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः॥’ संभर्त्ता स्वभक्तानां पोषकः। भर्त्ता धारकः स्थापकः। नेता स्वभक्तिफलस्य प्रेम्णः प्रापकः। गमयिता स्वलोक-प्रापकः। स्रष्टा स्वभक्तेषु तत्तद्गुणस्योद्गमयिता।” (संख्या-४)में— “स्वयमहेतुः स्वरूपशक्त्यैकविलासस्यत्वेन तत्रोदासीनमपि प्रकृतिजीवप्रवर्त्तकावस्थ-परमात्मापरपर्याय-स्वांशलक्षण-पुरुषद्वारा यदस्य सर्गस्थित्यादिहेतुर्भवति तद्भगवद्रूपं विद्धि। ××येन हेतुकर्ता आत्मांशभूत-जीव-प्रवेशनद्वारा सञ्जीवितानि सन्ति, देहादीनि तदुपलक्षणानि प्रधानादि-सर्वाण्येव तत्त्वानि येनैव प्रेरितायैव चरन्ति स्व-स्व-कार्ये प्रवर्त्तन्ते, तत्परमात्मरूपं विद्धि। जीवस्य आत्मत्वं तदपेक्षया तस्य परमत्वं इत्यतः परमात्मशब्देन तत्सहयोगी स एव व्यज्यते। यदेव तत्तत्त्वं स्वप्नादौ अन्वयेन स्थितं, यच्च तद्वहिः शुद्धायां जीवाख्यशक्तौ तथा स्थितं, चकारात् ततः परत्रापि व्यतिरेकेण स्थितं स्वयमवशिष्टं तद्ब्रह्मरूपं विद्धि।”
अर्थात् “सभी शक्तियोंसे समन्वित पूर्ण आविर्भावके कारण भगवान् अखण्ड-तत्त्वरूप हैं। और ब्रह्ममें उस प्रकार विशेष आकार (रूप-गुण-लीला) प्रकाशित नहीं होनेके कारण ब्रह्म भगवान्का आंशिक आविर्भाव मात्र हैं। हे मुनिवर! भगवत्-शब्दके प्रथम अक्षर ‘भ’ के दो अर्थ हैं—संभर्त्ता और भर्त्ता। ‘ग’ के अर्थ नेता, गमयिता और स्रष्टा हैं। प्राणीगण भूतात्मा (परमात्मा) में वास करते हैं और वे अविनाशीपुरुष (परमात्मा) भी सभी प्राणियोंके भीतर वास करते हैं—यह ‘व’ अक्षरका अर्थ है। हेय मायिक गुणोंसे रहित तथा सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेजको धारण करनेवाले भगवान् कहलाते हैं। ‘संभर्त्ता’ शब्दका अर्थ
दूसरा अध्याय | ४९